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योग से जीवन को दिशा दें

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योग से जीवन को दिशा दें


-गिरीश्वर मिश्र

आज की डिजिटल और दौड़-धूप वाली ज़िन्दगी में हम ख़ुद को भी वस्तुओं की भीड़ में खड़े पाते हैं। उस भीड़ में हम खोते जा रहे हैं और कभी-कभी खुद को भी पहचानना कठिन हो रहा है। घटनाओं का द्रुतगामी आवेग ऐसा हो रहा है कि हमारे जीवन का क्षण-क्षण कुछ नया पुराना जोड़ता जा रहा है और हम सब परिवर्तन के तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब कभी अपने स्वभाव को समझने चलते हैं तो अपने को बड़ी जटिल संरचना से मुखातिब पाते हैं, जिसमें मन और शरीर दोनों हैं जो सोचने और करने के दायित्व को निभाने का काम करते हैं। यह संरचना जटिल होते हुए भी सहज है क्योंकि उसके सारे अवयव एक संगति और लय में काम करते हैं। और तो और वे परस्पर निर्भर होने के कारण एक-दूसरे के पूरक भी हैं।

बात यहीं नहीं ख़त्म होती क्योंकि यह संरचना क्रियाशील है। यह एक जैविक उपकरण की तरह कार्य करता है जो सतत रचता रहता है। इसीलिए शरीर को प्रमुख या आद्य साधन माना गया है। कवि कालिदास के शब्दों में “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” कहकर स्मरण किया जाता है। गोस्वामी तुलसीदास उसे साधन-धाम कहते हैं जो मोक्ष यानी सारे कष्टों से छुटकारा दिलवाता है। इतिहास साक्षी है कि मनुष्य के कर्तृत्व की कोई सीमा नहीं है पर उसके लिए मन और शरीर की जुगलबंदी अच्छी तरह से होनी चाहिए।

वस्तुतः मन-शरीर मिल कर जो कुछ भी हमें सृजन करने का मौक़ा देते हैं वह अपूर्व यानी नया होता है। मन में उठे विचारों से जो यात्रा शुरू होती है वह शब्दों और कर्मों से होकर विभिन्न उत्पादों के रूप में भैतिक जगत में मूर्त आकार पाती है। इस रची जाती दुनिया के साथ हमारा नित्य साबका पड़ता है और फिर हम भी बदलते हैं और हमारी दुनिया भी बदलती है। यह क्रम सदा चलता रहता है। सच कहें तो इस तरह की गतिशीलता या गतिमय होना जीवन की निशानी होती है। कहने को वह एक स्थिति भी है और प्रगति तथा विकास की यात्रा को दिशा भी देती है। वह पथ भी है और पाथेय भी।

जब कहा गया धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् यानी धर्म, अर्थ, और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थ के लिए आरोग्य उत्तम मूल यानी मुख्य आधार है तो इसी तरफ़ संकेत किया गया था कि मन और शरीर की जगलबंदी की लय बनी रहे। आरोग्य यानी निरोगी रहना विकारों से मुक्त रहना है। यही हमारा स्वभाव है और उसे बनाए रखना हर प्राणी का कर्तव्य है। प्रकृति ने इसी तरह से प्रोग्राम किया है पर आज इस लय को बनाये रखना मुश्किल हो रहा है क्योंकि स्वाभाविक प्रोग्राम पर चलने के रास्ते में बहुत से विकार आड़े आ रहे हैं। विकार बाधक होते हैं और आगे बढ़ने में रोड़ा तो अटकाते ही हैं, साथ ही हमारी शक्ति और ऊर्जा का अपव्यय भी होते हैं। जब हमारा ध्यान अपने लक्ष्य से भटक जाता है, तो हम काम नहीं कर पाते।

आज के तेज़ी से डिजिटल हो रहे युग में बच्चे-बूढ़े सभी आमतौर पर ध्यान के भटकाव की शिकायत करते मिलते हैं। उनका चित्त स्थिर नहीं रह पाता है और इसके फलस्वरूप कोई काम ठीक से नहीं हो पाता और स्मृति भी कमजोर पड़ने लगती है। दूसरी ओर यह सबका अनुभव है कि ध्यानावस्थित या दत्तचित्त होकर ही कोई कार्य सिद्ध किया जा सकता है। ‘ध्यान देना’ और कुछ नहीं, अपनी चेतना के सतत प्रवाह को एक दिशा में ले जाना है। हम ध्यान को किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना में केंद्रित या फ़ोकस करते है। इसके लिए स्वयं अपने ऊपर काम करना होगा। अपना उद्धार करने के लिए ख़ुद खड़ा होना होगा– उद्धरेदात्मनात्मानम्। इसके लिए अपने को वस्तु से हटकर साक्षी की भूमिका अपनानी पड़ती है।

सामान्य अनुभव तो यही है कि बाहर की दुनिया की चकाचौंध हमें खूब आकर्षित करती है पर उस तरफ़ आगे बढ़ने से किसी एक विचार या वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने में बाधा पड़ती है। बाहरी दुनिया जिसे हम ठोस सच्चाई या ऑब्जेक्टिव ट्रुथ मानते हैं उसे परम सत्य समझने से हमारा मन उस सत्य के साथ उलझता चला गया। उसके आकर्षण में बंधकर आदमी ख़ुद को उसी में देखने-तलाशने का अभ्यास करने में जुट जाता है। उसके साथ जुड़ाव से उपजने वाली आसक्ति हमारी अपनी समझ और मौलिक पहचान को आशंकित करने लगती है और हम संशयग्रस्त हो जाते हैं।

बाहरी आकर्षण की पराकाष्ठा तब होती है जब द्रष्टा दृश्य में विलीन होने के लिए छटपटाने लगता है। चाहने वाले की तीव्र चाह चाही गई वस्तु के साथ एकमेक होने को आतुर हो उठती है। व्यापक पहचान घनीभूत होती है और वस्तु में समा जाती है। पर कोई वस्तु अंततः वस्तु ही होती है पर उससे आसक्ति उसे जो प्रबल रूप देती है उसके सामने सब झूठा पड़ जाता है। तीव्र भ्रम सत्य से प्रबल होकर कुछ भी करा सकता है (खबर आई थी कि कुछ दिनों पूर्व जापान में एक महिला ने डिजिटल/एआई/रोबो की आभासी कृति से शादी रचाई थी!)। कुल मिलाकर अन्तर्जगत और बाह्य जगत के साथ तालमेल बैठाना यानी ठीक तरह और ठीक जगह जोड़ना जुड़ना आज की सबसे बड़ी चुनौती हो रही है। आज पूरे विश्व में मनोरोगियों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि दर्ज हो रही है। ऐसे में योग-शास्त्र और उसकी साधना बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है।

योग का अर्थ है जुड़ना, पर हर तरह का जुड़ना आकस्मिक या जानबूझकर मिलने का संयोग हो सकता है। योग-शास्त्र के अनुसार योग एक विशेष प्रकार से सायास जुड़ने का नाम है। योग विद्या के आलोक में अन्तर और बाह्य जगत के साथ हमारा रिश्ता नया ओजस्वी अर्थ प्राप्त कर लेता है। यम और नियम नैतिक जीवन जीने की प्रक्रिया बताते हैं तो आसन शरीर का रखरखाव और उसकी क्षमता को संबर्धित करने का काम कराते हैं। प्राणायाम हमारे श्वांस और प्राणिक ऊर्जा को व्यवस्था करते हैं। प्रत्याहार बाह्य दुनिया के साथ विवेकपूर्ण सामन्ध को नियमित करता है। ध्यान, धारणा और समाधि अंतरंग योग हैं जो चेतना के परिष्कार को संभव बनाते हैं। इसीलिए महर्षि अरविंद कहते हैं कि “पूरा जीवन ही योग है।” वह योग को समग्र जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सबसे जुड़कर ही अच्छी तरह से जीना संभव हो पाता है। उसके लिए आवश्यक तैयारी भी अनेक स्तरों पर करनी होती है।

योग के जिस स्वरूप को महर्षि पतंजलि ने व्यवस्थित रूप में ‘योग-सूत्र’ प्रस्तुत किया था वह इसी तैयारी का मॉडल या नक्शा है। उसे अष्टांग योग कह कर वह यही कहना चाहते थे कि जैसे सभी अंगों से मिल कर शरीर बनता है उसी तरह योग भी अनेक पक्षों से मिल कर बना है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि सबको मिला कर ही योग की रचना पूर्ण होती है। किसी एक अंग (जैसे-आसन या प्राणायाम) मात्र को ही योग कहना अतिव्याप्त करने वाली बात है। इसलिए वह समझ और तदनुसार आचरण असंगत और दिग्भ्रमित करने वाला होगा। खेद है कि आज इसी तरह का भ्रम फैला हुआ है।

हमें यह याद रखना होगा कि योग स्वयं अपने को नियमित करने की ऐसी पद्धति है जो हमें अपना वास्तविक स्वरूप वापस दिलाती है। योग की यात्रा के साथ हम अपने दृश्य को दृश्य के रूप में और ख़ुद को द्रष्टा के रूप में ग्रहण करना शुरू करते हैं। दृश्य के मजबूत बंधनों से छुटकारा पाना आसान नहीं है। हमारा चंचल मन तो हमेशा दृश्य की ओर ही खिंचा रहता है। उसे दृश्य से वापस लेने या प्रत्याहार के लिए हमारे द्वारा सजग चेष्टा जरूरी होती है। गीता की मानें तो उसके लिए गहन अभ्यास और दृश्य विषय के प्रति आकर्षण कम करना होगा। उसके साथ बर्ताव तो करना होगा, पर आँख मूँदकर नहीं बल्कि विवेक के साथ। उसके साथ हमें अनासक्त भाव से व्यवहार करना होगा। आँख,कान, नाक आदि स्वभाव वश देखने, सुनने और सूंघने का काम तो करेंगे पर क्या और कितना देखें, सुनें और सूंघें यह इन ज्ञानेन्द्रियों पर या बाहर उपस्थित विषयों पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह यांत्रिक ढंग से (मैकेनिकली) नहीं चलना चाहिए। आज जिस तरह बाजार हमारी जरूरतों को बता रहा है और हमें निर्देशित कर रहा है, वह सबके अनुभव का विषय है।

भौतिक दुनिया के हमारे ज्ञान और आविष्कार की बदौलत आज हमारा दृश्य जगत तीव्र गति से अत्यंत गतिशील और निरंतर बदलने वाला होता जा रहा है। उसे देख और उससे जुड़ने के बाद जो रोमांच होता है वह हमें अस्थायी दृश्य में सत्य के आभास देने के साथ उसे और दृढ़ता से बाँधने वाला होता जा रहा है। आगे आने बदले दृश्यों की श्रृंखला की कल्पना हमें उसकी अनित्यता, अस्थायित्व या मिथ्यापन को ढँक लेती है। योग-शास्त्र में अविद्या (अज्ञान जो अस्थायी को स्थायी अनित्य को नित्य मानने को बाध्य करता है), अस्मिता (अपनी पहचान बनाने की तीव्र लालसा), राग, द्वेष और अभिनिवेश (अनंत जीवन की इच्छा) को पाँच क्लेशों के रूप में गिनाया गया है। ये सभी सतत अशांति को पैदा करते हैं पर हमारी मजबूरी यह है कि दृश्य से बंध कर हम उनको क्लेश भी नहीं समझते क्योंकि ऊपर से वे बड़े प्रिय लगते हैं। दृश्यों की विकराल विकट छाया हम पर इस तरह हावी होती जाती है कि हम उसी में खो जाते हैं। योग इस महारोग का उपचार है जो हमें हमारी अपनी समझ वापस लौटाता है। वह हमें पुनः अपने स्वरूप में, यानी द्रष्टा की भूमिका में, स्थापित करता है।

(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश