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सिंधु जल संधिः भारत का सख्त रवैया और पाकिस्तान की बढ़ती बेचैनी

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सिंधु जल संधिः भारत का सख्त रवैया और पाकिस्तान की बढ़ती बेचैनी


-मृत्युंजय दीक्षित

पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ जब से सिन्धु जल समझौता रद्द किया है, पाकिस्तान लगातार पूरी दुनिया के समक्ष पीड़ित देश होने का नाटक कर रहा है और हाथ-पांव मार रहा है कि किसी तरह दबाव में आकर भारत सिंधु जल समझौता बहाल कर दे। इसके साथ ही उसके पूर्व विदेश मंत्री और पीपीपी नेता विलावल भुटटो भारत को परमाणु युद्ध की धमकी देने लगे हैं। भारत के कड़े तेवरों के कारण सिंधु जल संधि को लेकर पाकिस्तान की बैचेनी अब चरम पर पहुंच चुकी है। इस्लामाबाद में एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयेाजित किया गया जिसमें पाकिस्तानी मंत्रियों और सांसदों ने भारत को धमकी देने का प्रयास किया। पाक उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा कि सिंधु जल संधि सिर्फ पानी बांटने का समझौता नहीं अपितु दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहयोग की मजबूत नीव है।

दूसरी ओर संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठकों में भारत एक माह में ही चार बार पाकिस्तान को आईना दिख चुका है। बिलावल ने धमकी देते हुए बयान दिया कि अगर पाकिस्तान के पानी को रोकने का प्रयास हुआ तो यह पाकिस्तान के अस्तित्व पर हमला माना जाएगा और यह परमाणु प्रतिक्रिया जैसी स्थिति पैदा कर सकता है। आज पाकिस्तान सिंधु जल के लिए तरस रहा है और उसका असर वहां की आम जनजीवन पर दिखलाई पड़ने लगा है। इतना होने पर भी पाकिस्तान अपनी नापाक हरकतों से बाज आने को तैयार नहीं है। वह लगातार भारत के विरुद्ध आतंकवादी गतिविधियों को चला रहा है और आतंकियों को संरक्षण दे रहा है। अतः रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने भी पाकिस्तान को स्पष्ट सन्देश दे दिया है कि अब वह सिंधु जल समझौता पूरी तरह से भूल जाए क्योंकि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता।

इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह हुआ है कि भारत और पाकिस्तान की तथाकथित 116 बुद्धिजीवी हस्तियों ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को पत्र लिखकर शांतिवार्ता पुनः शुरू करने की वकालत की है जिसे भारत सरकार ने स्पष्ट रूप से ठुकरा दिया है। एक बार फिर बता दिया है कि अब खून और पानी एक साथ नहीं बह सकता।

सेंटर फॉर पीस एंड प्रोगेस के अध्यक्ष ओपी शाह की तरफ से 116 प्रमुख हस्तियों ने हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें 60 भारत व 56 पाकिस्तान से है। अब इन हस्तियों में जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला का नाम भी जुड़ गया है। भारत की जिन 61 हस्तियों ने इस पत्र में हस्ताक्षर किए हैं उनमें अधिकतर वही लोग हैं जिन्होंने भारत पर हुए अब तक के किसी भी आतंकवादी हमले की ना तो निंदा की और न पीड़ितों के प्रति संवेदना व्यक्त की। कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की सदा से पाकिस्तान के प्रति ही संवेदनाएं रही हैं, उन्हें पाकिस्तान के प्रति प्रेम रहा है, उनके बयान पाकिस्तानी मीडिया में छाए रहते है।

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का पटाक्षेप होने के बाद से महबूबा मुफ़्ती सईद और फारुख अब्दुल्ला परिवार पाकिस्तान प्रेम में छटपटा रहा है। राजद सांसद मनोज झा जिनकी भारत में कोई राजनैतिक हैसियत नहीं है ऐसे ही पाकिस्तान प्रेमी 61 लोगों की सूची देखने के बाद इन सभी की मंशा स्पष्ट हो रही है कि ये लोग वास्तव में शांति के नकली नायक बनकर भारतीयों और दुनिया के तमाम लोगों का ध्यान खींचना चाह रहे हैं और अपनी उपस्थिति का एहसास बिल्कुल उसी तरह कराना चाह रहे हैं और जिस प्रकार अमेरिका-ईरान युद्ध के दौरान पाकिस्तानी सेना प्रमुख मुनीर और शाहबाज शरीफ मध्यस्थ बनकर शांति का ढिंढोरा पीट रहा था।

यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है शांति का ढिंढोरा पीटने वाले 1970 से लेकर पहलगाम तक जितने भी आंतकी हमले हुए उन्हें भूल चुके हैं। भारत ने पाकिस्तान को शांति वार्ता करने के कई अवसर दिए और बारंबार दिए। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तो बस लेकर पाकिस्तान गए थे, उसके बाद भारत को कारगिल का युद्ध लड़ना पड गया। पाकिस्तान भारत के खिलाफ न केवल आंतकवाद की समस्या पैदा कर रहा है अपितु भारत में शाति भंग करने व विकास कार्यों में बाधा पहुँचाने के लिए हर प्रकार की घृणित व विकृत साजिशों को लगातार अंजाम दे रहा है। बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ही साजिशें रच रही थी।

आज जिन लोगों ने भारत और पाकिस्तान के साथ शांतिवार्ता शुरू करने की जो वकालत की है वे लोग तब कहाँ चले गए थे जब बांग्लादेश में हिंदुओं का कत्लेआम हो रहा था, हिन्दू बहिन-बेटियों पर क्रूर और शर्मनाक अत्याचार किये जा रहे थे। इन लोगों ने अपना पत्र ऐसे समय में लिखा है जब पाकिस्तान पाक अधिकृत कश्मीर में अपना दमनचक्र चला रहा है। पूरा पीओजेके पाकिस्तान के वर्चस्व से स्वतन्त्र होना चाह रहा है। अतः इन हस्तियों को ऐसे समय में पीओजेके के आंदोलनकारियों के समर्थन में आना चाहिए था और पाकिस्तान से कहना चाहिए था वह पाक अधिकृत कश्मीर को पूरी तरह से स्वतंत्र करे और बलूचिस्तान को भी आजादी दे। किंतु इन लोगों ने ऐसा कोई मुद्दा अपने पत्र में नहीं उठाया है जिससे इन लोगों की मंशा पर संदेह उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है। सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि इन लोगों ने अपने पत्र के माघ्यम से पुलवामा में 40 जवानों की शहादत से लेकर पहलगाम हमले की निंदा तक नहीं की और उसे इतनी आसानी से भूल गए। वास्तविकता यह है कि आज जो लोग पत्र लिख रहे हैं इन्हें न भारत देश से कोई प्रेम है और न भारत की जनता से, ये राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थ के लिए नाटक कर रहे हैं।

भारत तो हमेशा से वार्ता की वकालत करता रहा है और आज भी कर रहा है। वह कई बार हर मंच पर स्पष्ट भी कर चुका है कि अब पाकिस्तान के साथ वार्ता केवल आतंकवाद पर होगी, बिना किसी मध्यस्थ के होगी और पाकिस्तान को पाक अधिकृत कश्मीर तत्काल प्रभाव से खाली करना ही होगा।

ताजा घटनाक्रम में, भारत के विरुद्ध षड्यंत्रों में शामिल रहने वाला चीन भी अब सिन्धु जल संधि के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के समर्थन में खड़ा होने का प्रयास कर रहा है। देश को अपने वर्त्तमान नेतृत्व, रणनीति कारकों और सेना पर विश्वास रखना चाहिए कि वे इन षड्यंत्रकारी पड़ोसी देशों के षड्यंत्र को कभी सफल नहीं होने देंगे तथा भारत को सशक्त और सबल राष्ट्र के रूप में और स्थापित करेंगे।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश