गाँव की हर चीज चाहिए लेकिन गाँव नहीं
- डॉ. प्रियंका सौरभ
गाँव की हर चीज़ चाहिए लेकिन गाँव नहीं। यह एक साधारण वाक्य नहीं बल्कि आधुनिक भारतीय समाज की बदलती मानसिकता का सटीक चित्रण है। हम गाँव के शुद्ध दूध की बात करते हैं, देसी घी की प्रशंसा करते हैं, जैविक अनाज खरीदने के लिए अधिक कीमत चुकाने को तैयार रहते हैं, गाँव के फलों और सब्जियों को स्वास्थ्य का आधार मानते हैं, गाँव की संस्कृति, लोकगीत, लोकनृत्य और पारंपरिक जीवन को अपनी पहचान बताते हैं लेकिन जब स्वयं गाँव में रहने की बात आती है तो अधिकांश लोग उससे दूरी बनाना चाहते हैं। यह विरोधाभास केवल जीवन शैली का नहीं बल्कि विकास की हमारी अवधारणा का भी प्रश्न है।
भारत को सदियों से गाँवों का देश कहा जाता रहा है। आज भी देश की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। हमारी अर्थव्यवस्था की नींव कृषि पर टिकी है और कृषि गाँवों के बिना संभव नहीं। फिर भी विडंबना यह है कि गाँव का उत्पाद सम्मान पाता है लेकिन गाँव स्वयं उपेक्षा का शिकार है। हम गाँव से सबकुछ लेना चाहते हैं पर गाँव को वह सम्मान, सुविधाएँ और अवसर देने में पीछे रह जाते हैं जिनका वह अधिकारी है।
आज शहरों में ऑर्गेनिक का बड़ा बाज़ार है। गाँव का गेहूँ, बाजरा, सरसों का तेल, देसी दालें और ताज़ी सब्जियाँ ऊँचे दामों पर बिकती हैं। लोग गाँव के शहद, देसी गुड़ और मोटे अनाज को स्वास्थ्यवर्धक मानते हैं। लेकिन इन उत्पादों को पैदा करने वाले किसान का जीवन अक्सर संघर्षों से भरा रहता है। जिस किसान की मेहनत शहर के लोगों की थाली सजाती है, उसी किसान के बच्चे बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए शहरों की ओर पलायन करने को विवश हैं।
ग्रामीण जीवन की सबसे बड़ी पूँजी उसके सामाजिक संबंध रहे हैं। सुख-दुःख में पूरा गाँव एक परिवार की तरह खड़ा होता था। विवाह, त्योहार, फसल कटाई या किसी संकट की घड़ी- हर अवसर सामूहिकता का प्रतीक होता था। आज शहरी जीवन में लोग इसी अपनत्व की तलाश करते हैं। बड़े-बड़े अपार्टमेंटों में रहने वाले लोग अपने पड़ोसी तक को नहीं जानते। दूसरी ओर गाँव की चौपाल, पीपल की छाँव और सामूहिक संवाद अब धीरे-धीरे स्मृतियों में बदलते जा रहे हैं। हम उस आत्मीयता की प्रशंसा तो करते हैं लेकिन उसे बचाने के लिए कुछ नहीं करते।
शिक्षा और रोजगार की तलाश ने गाँवों से युवाओं का पलायन तेज़ किया है। यह पलायन केवल आर्थिक नहीं, सांस्कृतिक भी है। पढ़ा-लिखा युवा शहर में बसना अपनी सफलता मानने लगा है। गाँव लौटना उसे पिछड़ेपन का प्रतीक लगता है। परिणामस्वरूप गाँवों में बुज़ुर्ग, महिलाएँ और बच्चे अधिक रह गए हैं जबकि युवाओं की ऊर्जा शहरों में खप रही है। यदि गाँवों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक स्वास्थ्य सेवाएँ, उद्योग और सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध हों तो बड़ी संख्या में लोग अपने गाँव में ही रहना पसंद करेंगे।
यह भी सच है कि गाँवों में अनेक चुनौतियाँ हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, इंटरनेट, पेयजल, स्वच्छता और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी आज भी कई क्षेत्रों में दिखाई देती है। सामाजिक कुरीतियाँ, जातिगत भेदभाव और रूढ़िवादिता जैसी समस्याएँ भी मौजूद हैं। इन कमियों को स्वीकार करना आवश्यक है, लेकिन समाधान गाँव से भागने में नहीं बल्कि गाँव को बेहतर बनाने में है।
आज जब पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है, तब गाँव का महत्व और बढ़ जाता है। स्वच्छ हवा, खुले मैदान, पेड़-पौधे, जल स्रोत और प्रकृति के साथ संतुलित जीवन गाँव की पहचान हैं। शहरों में कृत्रिम पार्क बनाकर लोग प्रकृति का अनुभव करना चाहते हैं, जबकि गाँव में प्रकृति जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। यदि हमने गाँवों को बचाए बिना केवल शहरों का विस्तार किया, तो आने वाली पीढ़ियों को प्राकृतिक जीवन केवल पुस्तकों और चित्रों में देखने को मिलेगा।
कोविड-19 महामारी ने भी हमें गाँव का महत्व समझाया। जब शहरों की आर्थिक गतिविधियाँ ठप हो गईं, तब लाखों लोग अपने गाँव लौटे। गाँव ने उन्हें आश्रय दिया, भोजन दिया और जीवन को फिर से संभालने का अवसर दिया। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि गाँव केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं बल्कि संकट के समय समाज की सबसे मजबूत सुरक्षा-व्यवस्था भी है।
आज आवश्यकता केवल ग्रामीण विकास योजनाएँ बनाने की नहीं बल्कि विकास की सोच बदलने की है। गाँव को शहर बनाने की नहीं बल्कि गाँव को उसकी विशेषताओं के साथ आधुनिक सुविधाओं से जोड़ने की आवश्यकता है। अच्छी सड़कें, गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, डिजिटल कनेक्टिविटी, आधुनिक अस्पताल, कृषि आधारित उद्योग, कौशल विकास और स्थानीय रोजगार- ये सब गाँव के विकास की वास्तविक आधारशिला हैं। यदि अवसर गाँव में होंगे तो पलायन स्वतः कम होगा।
हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था में भी गाँव के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना होगा। बच्चों को यह समझाना होगा कि खेती केवल एक पेशा नहीं, बल्कि राष्ट्र की खाद्य सुरक्षा का आधार है। किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षक भी है। गाँव केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति का मूल स्रोत है।
मीडिया और मनोरंजन जगत की भी इसमें बड़ी भूमिका है। अक्सर गाँव को या तो अत्यधिक पिछड़ा दिखाया जाता है या केवल रोमांटिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। वास्तविक गाँव इन दोनों छवियों से अलग है। वहाँ संघर्ष भी है, संभावनाएँ भी हैं; परंपरा भी है और परिवर्तन की आकांक्षा भी। संतुलित चित्रण ही समाज में सही दृष्टिकोण विकसित कर सकता है।
सरकार, समाज और निजी क्षेत्र को मिलकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होगा। कृषि के साथ पशुपालन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, कुटीर उद्योग, ग्रामीण पर्यटन और हस्तशिल्प को बढ़ावा देकर गाँवों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। डिजिटल तकनीक और ई-कॉमर्स के माध्यम से गाँव के उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं तक पहुँच सकते हैं। इससे किसानों और ग्रामीण उद्यमियों की आय भी बढ़ेगी और गाँव में रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
गाँव की पहचान केवल खेतों से नहीं बल्कि उसके संस्कारों से भी है। बड़ों का सम्मान, सामूहिकता, सहयोग, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और सादगी- ये मूल्य आज भी गाँव की सबसे बड़ी ताकत हैं। आधुनिकता का अर्थ इन मूल्यों को छोड़ देना नहीं बल्कि इन्हें समय के अनुरूप आगे बढ़ाना है। यदि विकास की दौड़ में हम इन मूल्यों को खो देंगे तो आर्थिक समृद्धि भी हमें मानसिक संतोष नहीं दे पाएगी।
समाज को यह स्वीकार करना होगा कि शहर और गाँव एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि पूरक हैं। शहर उद्योग, शिक्षा और सेवाओं के केंद्र हैं, जबकि गाँव कृषि, संस्कृति और प्राकृतिक संसाधनों के आधार हैं। दोनों का संतुलित विकास ही राष्ट्र को सशक्त बना सकता है। केवल शहरों को विकसित करके और गाँवों की उपेक्षा करके समावेशी विकास का सपना पूरा नहीं हो सकता।
आज समय आ गया है कि हम अपने भीतर झाँककर स्वयं से प्रश्न करें- क्या हम वास्तव में गाँव से प्रेम करते हैं या केवल गाँव की उपज और उसकी सुविधाओं से? यदि हमें गाँव का अन्न चाहिए, दूध चाहिए, हवा चाहिए, संस्कृति चाहिए, लोकगीत चाहिए, त्योहार चाहिए और अपनापन चाहिए तो हमें गाँव भी चाहिए। गाँव को केवल संसाधनों का स्रोत मानने की मानसिकता बदलनी होगी। गाँव जीवित रहेंगे तभी हमारी संस्कृति, हमारी कृषि और हमारी पहचान भी जीवित रहेगी।
वास्तविक विकास तब होगा जब कोई युवा गाँव छोड़ने को मजबूर न हो बल्कि गाँव में रहकर सम्मानपूर्वक जीवन जीने के अवसर पाए। जब किसान का बेटा खेती करने में गर्व महसूस करे, जब गाँव की बेटी को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ अपने ही क्षेत्र में उपलब्ध हों, जब गाँव की चौपाल पर आधुनिक तकनीक और पारंपरिक ज्ञान साथ-साथ बैठें, तब भारत वास्तव में आत्मनिर्भर और समृद्ध कहलाएगा।
आइए, केवल गाँव की चीज़ों से प्रेम न करें बल्कि गाँव से भी प्रेम करें। क्योंकि गाँव बचेगा तो खेत बचेंगे, खेत बचेंगे तो अन्न बचेगा, अन्न बचेगा तो जीवन बचेगा और जीवन बचेगा तो हमारी सभ्यता भी सुरक्षित रहेगी। सच यही है- गाँव की हर चीज़ नहीं, गाँव भी चाहिए।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

