समुद्र से आकाश तक : भारत की सामरिक शक्ति की नई कसौटी
- राकेश मिश्रा
राष्ट्रीय सुरक्षा की वास्तविक शक्ति केवल लड़ाकू विमानों, युद्धपोतों या आधुनिक हथियारों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। निर्णायक प्रश्न यह है कि संकट की घड़ी में उपलब्ध संसाधनों का कितनी तेजी, सटीकता और प्रभावी समन्वय के साथ उपयोग किया जा सकता है। आधुनिक सुरक्षा परिवेश में तकनीकी दक्षता, विश्वसनीय सूचना, प्रशिक्षित मानव संसाधन और विभिन्न संस्थाओं के बीच तालमेल ही किसी देश की सामरिक तैयारी को वास्तविक क्षमता में बदलते हैं।
अक्टूबर 2026 में ओडिशा के पारादीप तट पर आयोजित भारतीय तटरक्षक बल का समुद्री खोज एवं बचाव अभ्यास सारेक्स (SAREX - 26) और राजस्थान के जोधपुर में आयोजित भारतीय वायु सेना का बहुराष्ट्रीय हवाई अभ्यास तरंग शक्ति-2026 इसी व्यापक दृष्टिकोण को सामने रखते हैं। दोनों अभ्यासों का कार्यक्षेत्र अलग है लेकिन उनका मूल संदेश समान है- राष्ट्रीय सुरक्षा की सफलता केवल साधनों की उपलब्धता में नहीं बल्कि उनके समन्वित और समयबद्ध इस्तेमाल में निहित है।
समुद्री सुरक्षा : संकट के समय क्षमता की परीक्षा
भारतीय तटरक्षक बल द्वारा 8 अक्टूबर को पारादीप के समुद्री क्षेत्र में आयोजित सारेक्स का उद्देश्य समुद्र में संकटग्रस्त लोगों की खोज, बचाव और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की क्षमता को परखना था। राष्ट्रीय समुद्री खोज एवं बचाव बोर्ड के अंतर्गत आयोजित इस अभ्यास से पहले 7 अक्टूबर को रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इसमें 30 देशों की भागीदारी और 32 देशों के पर्यवेक्षकों की उपस्थिति ने समुद्री सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय महत्व को रेखांकित किया।
अभ्यास का केंद्र तकनीक-सक्षम खोज एवं बचाव तैयारी और समुद्री सुरक्षा था। इसके अंतर्गत समुद्र में यात्री विमान दुर्घटना तथा मालवाहक जहाज से टक्कर जैसी आपात स्थितियों का अनुकरण किया गया। लगभग 228 लोगों से जुड़ी संकट-परिकल्पना के माध्यम से खोज, बचाव, अग्निशमन, हवाई निकासी और विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की प्रक्रियाओं को परखा गया। भारतीय तटरक्षक बल के साथ नौसेना, वायु सेना और अन्य संबंधित एजेंसियों की भूमिका ने यह दिखाया कि समुद्री आपदा से निपटना किसी एक संस्था का काम नहीं बल्कि साझा जिम्मेदारी है।
भारत के लिए यह तैयारी विशेष महत्व रखती है। हिंद महासागर क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री संपर्क का प्रमुख मार्ग है। यहां किसी दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा या बड़े समुद्री संकट के समय शुरुआती सूचना, घटनास्थल की सही पहचान, बचाव संसाधनों की तैनाती और एजेंसियों के बीच स्पष्ट संचार निर्णायक साबित हो सकते हैं।
हालांकि, किसी अभ्यास की सफलता केवल उसके प्रदर्शन से तय नहीं होती। असली कसौटी यह है कि उससे मिली सीख वास्तविक परिस्थितियों में प्रतिक्रिया का समय घटाने, लोगों की जान बचाने और संसाधनों के बेहतर उपयोग में कितनी मदद करती है।
तरंग शक्ति : वायु शक्ति के साथ सहयोग की ताकत
जोधपुर में 26 सितंबर से 12 अक्टूबर, 2026 तक आयोजित तरंग शक्ति-2026 ने हवाई संचालन और अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग के एक अलग आयाम को सामने रखा। इस दूसरे संस्करण में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका और बांग्लादेश की वायु सेनाओं ने भाग लिया। इसके अतिरिक्त 32 देशों के पर्यवेक्षकों की उपस्थिति ने अभ्यास के व्यापक सामरिक महत्व को रेखांकित किया। लड़ाकू विमानों, परिवहन विमानों और हवा में ईंधन भरने वाले विमानों की भागीदारी ने वायु संचालन की विविध क्षमताओं को सामने रखा।
10 अक्टूबर को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अभ्यास के संदर्भ में कहा, “अलग-अलग देश, अलग-अलग विमान, अलग-अलग अनुभव लेकिन आकाश एक।” यह कथन बहुराष्ट्रीय सैन्य अभ्यासों की मूल भावना को व्यक्त करता है। अलग-अलग देशों की परिचालन प्रक्रियाओं, तकनीकी अनुभवों और प्रशिक्षण पद्धतियों से परिचित होने पर भाग लेने वाली सेनाओं की आपसी समझ और सहयोग की क्षमता बढ़ सकती है।
आधुनिक हवाई अभियानों में केवल विमान की गति या हथियारों की क्षमता पर्याप्त नहीं होती। पायलटों का प्रशिक्षण, लक्ष्य की पहचान, सुरक्षित संचार, हवाई ईंधन की उपलब्धता, सूचना का आदान-प्रदान और बदलती परिस्थितियों में निर्णय लेने की क्षमता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ऐसे अभ्यास इन पहलुओं को समझने और परखने का अवसर देते हैं।
फिर भी, बहुराष्ट्रीय अभ्यास को औपचारिक सैन्य गठबंधन या किसी साझा युद्ध प्रतिबद्धता के समान नहीं माना जाना चाहिए। भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का महत्व अपनी परिचालन क्षमता और साझेदार देशों के साथ समझ बढ़ाने में है जबकि रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना उसकी विदेश और सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण आधार है।
ऑपरेशन सिंदूर और आधुनिक युद्ध की बदलती आवश्यकताएँ
ऑपरेशन सिंदूर ने यह रेखांकित किया कि आधुनिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयारी, सटीक योजना, विश्वसनीय सूचना और विभिन्न क्षमताओं के बीच समन्वय कितना आवश्यक है। समकालीन सैन्य अभियानों में तकनीकी साधनों की उपलब्धता के साथ-साथ उनका प्रभावी इस्तेमाल, परिस्थितियों का सही आकलन और समय पर निर्णय भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सारेक्स और तरंग शक्ति-2026 को ऑपरेशन सिंदूर का प्रत्यक्ष परिणाम या उससे जुड़ी कोई औपचारिक कड़ी मानना उचित नहीं होगा। हालांकि, तीनों के व्यापक सामरिक संदर्भ में एक साझा सीख दिखाई देती है- प्रशिक्षण, तकनीकी दक्षता, परिचालन तैयारी और समन्वित कार्रवाई राष्ट्रीय सुरक्षा को अधिक प्रभावी बनाते हैं।
आज के सुरक्षा परिवेश में सूचना का विश्लेषण और कार्रवाई का निर्णय लेने के बीच का समय लगातार महत्वपूर्ण हो रहा है। समुद्र में संकटग्रस्त जहाज या विमान की पहचान हो अथवा हवाई अभियान के दौरान बदलती परिस्थितियों का आकलन, समय पर सही निर्णय ही उपलब्ध संसाधनों की उपयोगिता निर्धारित करता है।
भारत के लिए तीन रणनीतिक प्राथमिकताएँ
पहली -संस्थागत समन्वय को मजबूत करना। समुद्री सुरक्षा, हवाई रक्षा और आपदा प्रबंधन में विभिन्न एजेंसियों के बीच स्पष्ट जिम्मेदारियाँ, प्रभावी संचार और संसाधनों का साझा उपयोग आवश्यक है। संयुक्त अभ्यासों से प्राप्त अनुभवों को नियमित प्रशिक्षण और मानक संचालन प्रक्रियाओं में शामिल किया जाना चाहिए।
दूसरी -आत्मनिर्भरता के साथ तकनीकी विश्वसनीयता। स्वदेशी रक्षा उत्पादन भारत की दीर्घकालिक सामरिक क्षमता के लिए महत्वपूर्ण है। एलसीए तेजस और एलसीएच प्रचंड जैसे स्वदेशी प्लेटफॉर्म इस दिशा में उल्लेखनीय उदाहरण हैं। लेकिन आत्मनिर्भरता का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब उपकरणों की परिचालन उपलब्धता, कलपुर्जों की समयबद्ध आपूर्ति, रखरखाव, तकनीकी उन्नयन और प्रशिक्षित कर्मियों की व्यवस्था भी मजबूत हो।
तीसरी -अंतरराष्ट्रीय सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता में संतुलन। बहुराष्ट्रीय अभ्यासों से अनुभव और परिचालन समझ बढ़ती है। भारत को ऐसे सहयोग का लाभ उठाते हुए हिंद महासागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने राष्ट्रीय हितों, स्वतंत्र निर्णय क्षमता और सुरक्षा प्राथमिकताओं को केंद्र में रखना होगा।
प्रदर्शन से आगे : सीख को क्षमता में बदलने की जरूरत
किसी भी सैन्य अभ्यास का मूल्यांकन केवल विमानों की उड़ान, जहाजों की तैनाती या बचाव अभियानों के प्रदर्शन से नहीं होना चाहिए। उसके बाद की समीक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। किन प्रक्रियाओं में सुधार की आवश्यकता है, संचार में कहां कठिनाई आई, संसाधनों का उपयोग कितना प्रभावी रहा और किस स्तर पर प्रतिक्रिया का समय घटाया जा सकता है- इन प्रश्नों के व्यवस्थित उत्तर ही अभ्यास को वास्तविक क्षमता-वृद्धि का माध्यम बनाते हैं।
सारेक्स से समुद्री बचाव, संकट प्रबंधन और बहु-एजेंसी समन्वय की सीख मिलती है। वहीं, तरंग शक्ति-2026 हवाई संचालन, अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग और विभिन्न वायु सेनाओं के अनुभवों को समझने का अवसर प्रदान करता है। दोनों अभ्यासों का महत्व तभी स्थायी होगा, जब इनसे प्राप्त अनुभव प्रशिक्षण, तकनीकी सुधार और परिचालन प्रक्रियाओं में दिखाई दें।
भारत की सामरिक तैयारी का अगला चरण केवल आधुनिक संसाधनों की संख्या बढ़ाना नहीं बल्कि उन्हें विश्वसनीय, चुस्त और समन्वित व्यवस्था में बदलना है। इसके लिए तकनीकी क्षमता, मानव संसाधन, संस्थागत तालमेल और निरंतर मूल्यांकन को समान महत्व देना होगा।
समुद्र से आकाश तक भारत की वास्तविक सामरिक कसौटी यही है- उपलब्ध शक्ति को समय पर, सटीकता से और समन्वित ढंग से राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने वाली क्षमता में बदलना।
(लेखक, स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी

