मौजूदा दौर में भारत-दक्षिण कोरिया संबंध
- डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध आज के वैश्विक दौर में नई अहमियत प्राप्त कर रहे हैं। दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति और क्षेत्रीय शांति के समर्थक हैं। एशिया के बदलते शक्ति संतुलन, चीन की बढ़ती आक्रामकता, आपूर्ति श्रृंखला संकट, यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व तनाव और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने भारत तथा दक्षिण कोरिया को एक-दूसरे के और करीब आने का अवसर दिया है। दोनों देशों के बीच वर्षों से मित्रतापूर्ण संबंध रहे हैं लेकिन अब समय की मांग है कि इन्हें नई ऊर्जा, नई दिशा और व्यावहारिक सहयोग के साथ आगे बढ़ाया जाए।
भारत और दक्षिण कोरिया के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं बल्कि इनके सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आधार भी मजबूत हैं। प्राचीन समय से दोनों देशों के बीच सभ्यतागत संपर्क की चर्चा मिलती है। कोरिया में अयोध्या की राजकुमारी सुरिरत्ना, जिन्हें वहां रानी ह्यो ह्वांग-ओक के रूप में जाना जाता है, का उल्लेख दोनों देशों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ता है। यह संबंध आज भी लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव का आधार है। इसी कारण दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यटन और जनसंपर्क की संभावनाएँ बहुत अधिक हैं।
राजनयिक स्तर पर भारत और दक्षिण कोरिया ने वर्ष 1973 में औपचारिक संबंध स्थापित किए थे। उसके बाद से दोनों देशों के रिश्तों में लगातार प्रगति हुई है। वर्ष 2010 में संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया गया और बाद में इसे विशेष रणनीतिक साझेदारी में बदल दिया गया। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों देश एक-दूसरे को दीर्घकालिक सहयोगी के रूप में देखते हैं। उच्च स्तरीय यात्राएँ, विदेश मंत्री स्तर की बैठकें, व्यापारिक संवाद और रक्षा वार्ताएँ इन संबंधों को लगातार मजबूत कर रही हैं।
आर्थिक क्षेत्र में दक्षिण कोरिया भारत के लिए महत्त्वपूर्ण साझेदार है। दक्षिण कोरिया तकनीकी रूप से उन्नत, औद्योगिक रूप से मजबूत और निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था वाला देश है, जबकि भारत विशाल बाजार, युवा जनसंख्या और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहा है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच व्यापार और निवेश की व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं। द्विपक्षीय व्यापार हाल के वर्षों में बढ़ा है और लगभग 27 अरब डॉलर तक पहुँच चुका है। हालांकि यह क्षमता की तुलना में अभी भी कम है। भारत का दक्षिण कोरिया के साथ व्यापार घाटा भी चिंता का विषय बना हुआ है।
दक्षिण कोरिया की प्रमुख कंपनियाँ भारत में लंबे समय से निवेश कर रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, मोबाइल निर्माण, स्टील, शिप बिल्डिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में कोरियाई कंपनियों की मजबूत उपस्थिति है। भारत में विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण कोरिया का निवेश अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है। “मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया”, “स्टार्टअप इंडिया” और “ग्रीन एनर्जी” जैसे अभियानों में कोरियाई तकनीक तथा पूंजी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इन सबके बीच कुछ चुनौतियाँ भी हैं। वर्ष 2010 में व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता यानी सीईपीए लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य व्यापार को गति देना था लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आए। गैर-टैरिफ बाधाएँ, गुणवत्ता मानकों से जुड़े नियम, जटिल नियामक प्रक्रियाएँ, लॉजिस्टिक समस्याएँ और बाजार पहुँच की कठिनाइयाँ व्यापार वृद्धि में रुकावट बनती रही हैं। भारत को अपने निर्यात में विविधता लानी होगी, जबकि दक्षिण कोरिया को भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए अधिक अवसर उपलब्ध कराने होंगे।
आज वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बड़े बदलाव हो रहे हैं। कंपनियाँ केवल चीन पर निर्भरता कम करना चाहती हैं और नए उत्पादन केंद्र खोज रही हैं। यह स्थिति भारत और दक्षिण कोरिया दोनों के लिए अवसर लेकर आई है। दक्षिण कोरियाई कंपनियाँ यदि भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादन केंद्र स्थापित करती हैं तो उन्हें विशाल बाजार, सस्ती श्रमशक्ति और रणनीतिक स्थिति का लाभ मिलेगा। वहीं, भारत को तकनीक, रोजगार और निर्यात क्षमता में वृद्धि प्राप्त होगी। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, बैटरी निर्माण, ऑटोमोबाइल, रक्षा उत्पादन और जहाज निर्माण ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सहयोग तेजी से बढ़ सकता है।
रणनीतिक दृष्टि से भी दोनों देशों का सहयोग अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्वतंत्र, खुला और समावेशी व्यवस्था का समर्थन करता है। दक्षिण कोरिया भी क्षेत्रीय स्थिरता और समुद्री सुरक्षा का समर्थक है। चीन की आक्रामक नीतियाँ, समुद्री मार्गों पर दबाव और क्षेत्रीय तनाव ने कई देशों को नए साझेदार खोजने पर मजबूर किया है। भारत और दक्षिण कोरिया इस संदर्भ में स्वाभाविक सहयोगी बन सकते हैं।
हालाँकि दक्षिण कोरिया की सुरक्षा प्राथमिकताएँ थोड़ी अलग हैं। उसका प्रमुख ध्यान उत्तर कोरिया के परमाणु खतरे और अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन पर केंद्रित रहा है। दूसरी ओर भारत की चिंताएँ चीन, हिंद महासागर, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ी हैं। फिर भी दोनों देशों के हित कई क्षेत्रों में समान हैं। रक्षा उद्योग सहयोग, साइबर सुरक्षा, समुद्री निगरानी, आतंकवाद विरोधी प्रयास और नई सैन्य तकनीकों में संयुक्त कार्य किया जा सकता है।
रक्षा क्षेत्र में दक्षिण कोरिया ने विश्व स्तर पर मजबूत पहचान बनाई है। उसके पास आधुनिक रक्षा उत्पादन क्षमता है। भारत यदि संयुक्त उत्पादन, तकनीकी हस्तांतरण और अनुसंधान सहयोग पर जोर दे तो दोनों देशों को लाभ हो सकता है। भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति और दक्षिण कोरिया की तकनीकी क्षमता मिलकर नई संभावनाएँ पैदा कर सकती हैं।
तकनीक आज अंतरराष्ट्रीय संबंधों का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बन चुकी है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G, 6G, सेमीकंडक्टर, रोबोटिक्स, हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और डिजिटल नवाचार भविष्य की अर्थव्यवस्था तय करेंगे। दक्षिण कोरिया इन क्षेत्रों में अग्रणी देशों में शामिल है, जबकि भारत डिजिटल प्रतिभा, सॉफ्टवेयर क्षमता और स्टार्टअप इकोसिस्टम के कारण तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि दोनों देश “डिजिटल ब्रिज” बनाकर साथ काम करें तो एशिया में तकनीकी नेतृत्व का नया मॉडल सामने आ सकता है।
शिक्षा और मानव संसाधन सहयोग भी संबंधों को मजबूत कर सकता है। भारतीय छात्र दक्षिण कोरिया में उच्च शिक्षा, अनुसंधान और तकनीकी प्रशिक्षण के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। वहीं, कोरियाई छात्र भारत की संस्कृति, इतिहास, योग, आयुर्वेद, सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन शिक्षा से लाभ उठा सकते हैं। विश्वविद्यालयों के बीच साझेदारी, छात्रवृत्तियाँ और संयुक्त शोध कार्यक्रम भविष्य में मजबूत आधार बन सकते हैं।
सांस्कृतिक स्तर पर दोनों देशों के बीच लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है। भारत में कोरियाई संगीत, फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों की लोकप्रियता बढ़ी है। वहीं, दक्षिण कोरिया में भारतीय योग, भोजन, नृत्य और आध्यात्मिक परंपराओं के प्रति रुचि देखी जा रही है। यह सांस्कृतिक जुड़ाव केवल मनोरंजन नहीं बल्कि लोगों के बीच विश्वास और समझ को बढ़ाने का माध्यम है। पर्यटन, सांस्कृतिक उत्सव, भाषा शिक्षा और मीडिया सहयोग से यह रिश्ता और गहरा हो सकता है।
भविष्य की दृष्टि से भारत और दक्षिण कोरिया को केवल औपचारिक बैठकों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। व्यापार लक्ष्य स्पष्ट हों, निवेश प्रक्रियाएँ सरल हों, नई तकनीकों पर संयुक्त मिशन बनें, रक्षा उद्योग सहयोग बढ़े और युवाओं के बीच सीधा संपर्क मजबूत किया जाए। साल 2030 तक व्यापार को 50 अरब डॉलर से अधिक ले जाने का लक्ष्य व्यावहारिक रूप से संभव है, यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति और नीतिगत स्पष्टता दिखाई जाए।
भारत के लिए दक्षिण कोरिया केवल व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि तकनीकी और रणनीतिक सहयोगी है। वहीं, दक्षिण कोरिया के लिए भारत एक विशाल बाजार, विश्वसनीय लोकतांत्रिक मित्र और भविष्य की आर्थिक शक्ति है। बदलती विश्व व्यवस्था में ऐसे साझेदारों का महत्व और बढ़ जाता है।
लिहाजा, भारत-दक्षिण कोरिया संबंध आज के दौर में नई संभावनाओं के मोड़ पर खड़े हैं। यदि दोनों देश व्यावहारिक सहयोग, पारस्परिक विश्वास और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ आगे बढ़ते हैं तो यह साझेदारी केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि एशिया और विश्व में स्थिरता, समृद्धि और संतुलन की नई मिसाल बन सकती है।
(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

