वैश्विक पटल पर चमकती भारत की शिल्प विरासत
-ओ.पी. पाल
भारत की धरती केवल विविधताओं का देश नहीं बल्कि यह सदियों पुरानी कला, संस्कृति और शिल्प कौशल का जीवंत कोलाज भी है। कश्मीर के पहाड़ों में बुनी जाने वाली पश्मीना शॉल से लेकर दक्षिण के तटीय इलाकों में पहने जाने वाले मुंडू वस्त्रों तक, बनारस की गलियों की हथकरघा मशीनों से लेकर मध्य प्रदेश के चंदेरी सिल्क तक भारत का हर कोना अपनी विशिष्ट कलात्मक पहचान रखता है। लेकिन, इस बदलते युग में आधुनिक, गतिशील और डिजिटल हो रहे बाज़ार में इन पारंपरिक शिल्पों के सामने जगह बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती थी। इसी चुनौती को अवसर में बदलने और भारत के ग्रामीण व दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले लाखों कारीगरों को आधुनिक अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए 'इंडिया हैंडमेड' डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत की गई, जो आज भारत की समृद्ध हथकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं के लिए मजबूत 'डिजिटल इंडिया ब्रिज' बन चुका है बल्कि यह वैश्विक स्तर पर देश के आर्थिक सशक्तिकरण की एक नई पटकथा भी लिख रहा है।
साल 2023 में लॉन्च हुआ यह मंच भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय के तहत डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन द्वारा विकसित यह समर्पित ई-कॉमर्स पोर्टल है, जो हमारी पारंपरिक विरासत को संरक्षित कर रहा है। 'इंडिया हैंडमेड' न केवल भारत की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर रहा है, बल्कि करीब 65 लाख शिल्पी कारीगरों को व्यापक बाजार देकर 'आत्मनिर्भर भारत' और 'डिजिटल इंडिया' के विजन को भी मजबूत कर रहा है।
‘इंडिया हैंडमेड’ पोर्टल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 'आत्मनिर्भर भारत' और 'वोकल फॉर लोकल' के नारे को धरातल पर सच करता नजर आ रहा है। यह मंच केवल आर्थिक लेन-देन की जगह नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का भी मजबूत उपकरण है। जब दुनिया के किसी दूसरे कोने में बैठा व्यक्ति इस पोर्टल से कोई हस्तनिर्मित वस्तु खरीदता है तो वह केवल उत्पाद नहीं खरीद रहा होता बल्कि वह उस भारतीय कारीगर की उंगलियों के जादू, उसकी पीढ़ियों की विरासत और भारत की मिट्टी की कहानी को अपने घर ले जा रहा होता है। जैसे-जैसे हम डिजिटल युग में आगे बढ़ रहे हैं, इंडिया हैंडमेड यह सुनिश्चित कर रहा है कि हमारी प्राचीन कलाएं और तकनीकें पीछे न छूट जाएं।
यह मंच आधुनिकतम ई-कॉमर्स तकनीक और प्राचीनतम मानवीय कौशलों का अद्भुत और सफल संगम है। यह हमारे बुनकरों और शिल्पकारों को केवल जीवित रहने का साधन नहीं दे रहा बल्कि उन्हें सम्मान, वैश्विक पहचान और समृद्धि का नया आसमान दे रहा है। इंडिया हैंडमेड के माध्यम से भारत की यह अनमोल विरासत न केवल सुरक्षित है बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए निरंतर आजीविका, नवाचार और गौरव का शाश्वत स्रोत बनकर चमक रही है। प्रत्येक भारतीय और वैश्विक नागरिक के लिए इस मंच से जुड़ना भारत की आत्मा और उसकी कलात्मक धड़कन से जुड़ने जैसा है।
आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का अनूठा मॉडल
भारत का हथकरघा और हस्तशिल्प क्षेत्र, कृषि के बाद देश में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। वस्त्र मंत्रालय के वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 64.66 लाख हथकरघा और हस्तशिल्प कारीगर हैं। मसलन देश में 71 प्रतिशत हथकरघा बुनकरों में 64 प्रतिशत महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी इस क्षेत्र की सबसे खूबसूरत और मजबूत सामाजिक संरचना है। यानी जब एक ग्रामीण महिला बुनकर के बनाए उत्पाद को वैश्विक मंच मिलता है तो वह न केवल आर्थिक रूप से स्वतंत्र होती है बल्कि अपने पूरे परिवार और समुदाय की सामाजिक स्थिति को भी बदल देती है। यही एक सशक्तिकरण और समावेशी विकास का सबसे बड़ा माध्यम है। यह एक ऐसा ई-कॉमर्स पोर्टल है जो पूरी तरह से 'मेड इन इंडिया' और 'हैंडमेड' (हाथ से बने) उत्पादों के लिए समर्पित है। यहाँ मशीनी या कृत्रिम रूप से तैयार उत्पादों की कोई जगह नहीं है, जिससे हस्तनिर्मित कला की शुद्धता और प्रामाणिकता बनी रहती है। इंडिया हैंडमेड के माध्यम से अब कारीगर सीधे देश-विदेश के खरीदारों से जुड़ते हैं, जिससे उन्हें अपनी मेहनत का उचित और पारदर्शी मुआवजा मिलता है। एक छोटे से गांव में रहने वाले हुनरमंद शिल्पकार के पास पहले केवल स्थानीय मेलों या हाट-बाजारों तक ही पहुंच होती थी। लेकिन इस डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से उनके उत्पादों को एक क्लिक पर करोड़ों ग्राहकों के सामने प्रदर्शित किया जाता है, जिससे उनकी बाजार सीमाएं असीमित हो गई हैं।
क्षेत्रीय शिल्पों को अंतरराष्ट्रीय पहचान
इंडिया हैंडमेड की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह रोजमर्रा के उत्पादों के साथ-साथ भारत की विशिष्ट क्षेत्रीय पहचान वाले शिल्पों को एक वीआईपी स्थान देता है। इसके तहत दो प्रमुख सरकारी पहलों को इस मंच पर विशेष रूप से एकीकृत किया गया है, जिसमें जीआई-टैग और ओडीओपी शामिल है। जीआई-टैग किसी उत्पाद की उस विशिष्ट गुणवत्ता, प्रतिष्ठा और विशेषताओं को प्रमाणित करता है जो मुख्य रूप से उसके भौगोलिक उद्गम के कारण होती हैं।
इंडिया हैंडमेड पर खरीदार देश के कोने-कोने के प्रामाणिक जीआई उत्पादों को खरीद सकते हैं। इनमें उत्तराखंड की ऐपन कला, कश्मीर की सबसे नरम और बेशकीमती शुद्ध पश्मीना शॉल, केरल के पारंपरिक सूती वस्त्रों में शुमार मुंडू उत्पाद, यूपी के वाराणसी रेशमी बुनाई के लिए विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी (सिल्क उत्पाद), गोरखपुर व अन्य क्षेत्र के मिट्टी से बनी जीवंत मूर्तियां और घरेलू सजावट के सामान टेराकोटा उत्पाद, मध्य प्रदेश की चंदेरी सिल्क, पश्चिम बंगाल की बारीक सूती बुनाई और हाथ से तैयार तंगेल साड़ी और झारखंड/बिहार के प्राकृतिक सुनहरे रंग और अनूठे टेक्सचर जैसे उत्पाद भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘एक जिला एक उत्पाद’ का हिस्सा बन चुके हैं।
छोटे विक्रेताओं के लिए 'समावेशी नीतियां'
भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में कई ऐसे अत्यंत कुशल कारीगर हैं जो बहुत छोटे स्तर पर काम करते हैं और उनके पास जीएसटी पंजीकरण नहीं होता। डिजिटल व्यापार में उनके प्रवेश को आसान बनाने के लिए इंडिया हैंडमेड ने एक बेहद प्रगतिशील नियम लागू किया है। वहीं, विशेष नामांकन आईडी सुविधा के तहत छोटे कारीगर या बुनकर जीएसटी पंजीकृत से छूट दी गई है। वे एक साधारण नामांकन आईडी के साथ खुद को इस पोर्टल पर पंजीकृत कर सकते हैं। इसके तहत उन्हें अपने गृह राज्य के भीतर ऑनलाइन सामान बेचने की अनुमति मिलती है। यह कदम देश के सबसे निचले स्तर पर बैठे शिल्पकार को भी डिजिटल कॉमर्स की ताकत से जोड़ता है।
डिजिटल क्रांति की प्रेरक कहानियां
देश में इंडिया हैंडमेड जैसे इस मंच के माध्यम से कई शिल्प समूहों और सूक्ष्म उद्यमों की किस्मत बदली है, जो किसी प्रेरक कहानियों से कम नहीं हैं। एक नजर में देखा जाए तो जहां सैंटर्म्स जैसी पहल के तहत लकड़ी की सुंदर नक्काशीदार सजावट, सुगंधित मोमबत्तियां, कलात्मक टेराकोटा दीये, संगमरमर की मूर्तियां और शानदार हथकरघा साड़ियां जैसी हस्तनिर्मित शिल्पों की गर्माहट को हमारे रोजमर्रा के आधुनिक जीवन का हिस्सा बना रही है। इसी प्रकार बांस और बेंत को नया जीवन देने की दिशा में खासतौर से उत्तर-पूर्व और भारत के विभिन्न हिस्सों में बांस और बेंत के काम की एक समृद्ध परंपरा रही है।
'दस्तकार क्राफ्ट' इस मंच के जरिए 500 से अधिक स्थानीय कारीगरों के हुनर को सीधे वैश्विक बाजार में ले आया है। इसके अलावा विलेज क्राफ्ट को आगे बढ़ा रहे कुशल कारीगरों द्वारा बेहद प्यार और सावधानी से बनाए गए सूती तौलिए, पारंपरिक गमछे और आरामदायक बेडशीट इस बात का प्रमाण हैं कि हमारी विरासत केवल खास मौकों पर सजाने के लिए नहीं बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन को आराम और गुणवत्ता देने के लिए भी उतनी ही प्रासंगिक है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

