स्वातंत्र्य-यज्ञ जारी है !
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त) पर विशेष
गिरीश्वर मिश्र
स्वतंत्रता निश्चय ही सभ्य मानव समाज का सर्वोत्तम आविष्कार है जो मनुष्य को अपने चुने हुए लक्ष्यों को पाने के लिए सामर्थ्य संपन्न बनाती है । आज विकास, प्रगति और उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए स्वतंत्रता को सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है। स्वतंत्रता समर्थ बनाती है यही सोचकर पराधीनताओं की बेड़ियों को तोड़ने के लिए विश्व में अनेक संग्राम होते आ रहे हैं। अभी भी म्यांमार जैसे कई देशों में तानाशाही के ख़िलाफ़ बेचैनी है और उसके आतंक का प्रतिरोध जारी है। वस्तुतः प्राणिमात्र उस नैसर्गिक परिस्थिति में ही जीना चाहता है जिसमें मुक्त होकर अपनी शर्तों पर जिया जा सके। परतंत्र होने पर गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में सपने में भी सुख नसीब नहीं होता: पराधीन सपनेहु सुख नाहीं। पराधीनताओं के बीच रहते हमें स्वयं अपने मार्ग को चुनने की छूट नहीं होती है इसलिए वह अवांछनीय है। यह जरूर है कि स्वतंत्रता सिर्फ़ भोग नहीं है क्योंकि भोग के रूप में वह दूसरों के शोषण का जरिया हो जाएगी। स्वतंत्रता देश-योग है, देश से जुड़ने की वृत्ति है।
भारत को उपनिवेश बनाने के बाद अंग्रेज़ों ने भारतीय समाज के जीने और सोचने के विकल्पों को सिलसिलेवार समाप्त करने की कोशिश की। उन्होंने अपने निहित स्वार्थ के दृढ़संकल्प के साथ न केवल भारत का आर्थिक दोहन किया बल्कि हमारे लिए विकल्प भी तय किये और अपनी सोच हमारे ऊपर लादते गए। उन्होंने हजारों वर्षों की ज्ञान-विज्ञान और संस्कृति के क्षेत्र की अमूल्य विरासत को झुठलाते हुए भारत को एक असभ्य देश घोषित कर दिया और बिन मांगे यहाँ के समाज को सभ्य बनाने की जिम्मेदारी अपने सिर उठा ली। वे हमारा पुरुषार्थ नए सिरे से परिभाषित करते हुए बताते गए कि हम भारतीय क्या (या कौन) हैं? हम क्या करें? और कैसे करें ? हमारा गंतव्य क्या हो? इत्यादि। हमारे देश के लिए लक्ष्य, उनको पाने के लिए साधन और उसके अनुकूल जरूरी सोच सब कुछ वे तय कर रहे थे और उसके लिए राह बना रहे थे। अंग्रेज़ अन्यत्र भी विश्व में जहाँ गए मूल निवासियों की सभ्यता को नष्ट ही किया। भारत में भी वे एक पूरे पैकेज के साथ एक पूरी सभ्यता को खत्म करने के अभियान पर थे जो कई अर्थों में उनसे समृद्धतर थी। कहना न होगा कि यह समृद्धि विदेशियों के लिए पहले भी आकर्षण का कारण बन चुकी थी। अंग्रेज़ों ने अपना उपक्रम शिक्षा और संस्कृति में बदलाव के सुनियोजित कार्यक्रम के द्वारा बहुत प्रभावी ढंग से लागू किया और उनको सफलता भी मिली। अंग्रेज़ों ने शिक्षा का जो स्वरूप, विषय वस्तु और पद्धति निर्धारित की वह उनकी अपनी थी और यह स्वाभाविक ही था कि उसमें भारतीय ज्ञान परम्परा को जगह न मिले।
अंग्रेज़ों ने औपनिवेशिक साम्राज्य को पुष्ट करने के लिए भारतीय ज्ञान के विपुल भंडार के प्रति विद्वेष और संशय का भाव इस तरह प्रचारित और प्रसारित किया कि उसे लेकर आम भारतीय के मन में संशय का भाव घर कर गया। औपनिवेश मनोभाव को आत्मसात करने के बाद कालांतर में भारतीय चिंतन पर से लोगों का भरोसा उठता चला गया और वह त्याज्य होती गई। उसका परिणाम सामने है कि भारत अपने मौलिक अर्थ में आज के अनेक भारतीयों के लिए अपरिचित-सा होता जा रहा है। बहुत से पढ़े-लिखे लोगों को किसी एकल भारतीय दृष्टि के बारे में संदेह हो चला है। भारत, भारतीयता और भारत–भाव अब विवाद का प्रश्न बन गए हैं; वह ‘कंटेस्टेड’ हो चला है। भाषा, वेश-भूषा और भाव सभी की दृष्टि से आधुनिक भारतीय अपने को अंग्रेज़ों के तुल्य रखना चाहता है। ऐसे में भारतीय भाषाएँ और यहाँ की अपनी ज्ञान-परम्परा भारत की आधुनिक शिक्षा की औपचारिक प्रणाली के लिए आज भी अनुपयुक्त ही जा रही है। उसको अपनाने में भय लगता है वह इस तरह बाहर धकेल दी गई कि उसके प्रति भारतीय जन-समाज का भरोसा अभी तक जम नहीं पाया। वह उसे प्रासंगिक नहीं मानती। वह उसके लिए पूजनीय है या हो सकती है पर उसका सही स्थान संग्रहालय तो हो सकता है पर दैनिक जीवन कदापि नहीं। पर वास्तविकता यही है कि औपनिवेशिक सोच की बेड़ियों से मुक्त होकर ही वास्तविक स्वराज मिल सकेगा।
अंग्रेज़ों के सभ्यताद्वेषी अभिप्राय को महात्मा गांधी ने बहुत पहले भलीभाँति ताड़ लिया था। उनका ‘हिन्द स्वराज’ पश्चिम की सभ्यता का एक सजग पाठ है और भारतवासियों के लिए विवेकपूर्ण आत्मनिर्णय का आह्वान भी है। वह अपने आपको अपने ढंग से पहचानने के लिए भी प्रेरित करता है ताकि हम अपने परिस्थति के अनुकूल अपने लय हितकर निर्णय ले सकें। पराधीन होने पर किसी को भी यह निर्णय लेना कठिन होता है कि कौन-सा विकल्प चुनें और किस राह चलें। एक लंबे संघर्ष के बाद गांधीजी और उनके नेतृत्व में पूरे भारत ने 1930 में पूर्ण स्वराज की माँग की। इस संघर्ष में भारत के विभिन्न क्षेत्रों और विचारधाराओं के लोगों ने भाग लिया और क़ुर्बानियाँ दीं। अंत में मजबूर होकर अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ा और 15 अगस्त 1947 के दिन भारत अंग्रेज़ों के चंगुल से आजाद हुआ।
हालांकि यह आसान न था। यह एक पीड़ादायी सुख का क्षण था। भारतवासियों को इस स्वतंत्रता की क़ीमत अखंड भारत के विभाजन और भीषण रक्तपात से चुकानी पड़ी थी। पाकिस्तान बनने में लाखों भारतीयों को विस्थापन की मार झेलनी पड़ी और धन-जन की अकूत हानि हुई। इस ऐतिहासिक घटना को हुए अब 80 बरस होने को हैं, पर इसके जख्म अभी भी पूरी तरह से नहीं भरे हैं। इस बीच राजनीतिक हलचलें तेज रहीं और हालात बदलते रहे। अब अखंड भारत के नक्शे पर बांग्लादेश के उदय के साथ दो की जगह तीन देश दर्ज हो चुके हैं। नई सीमाओं के बनने के साथ पूरे भूखंड की सामाजिक–आर्थिक गतिविधियां भी लगातार बदलती रही हैं। तीन देशों के बीच और उनके आंतरिक हालात में उथल-पुथल मची रहती है और उनके रिश्ते भी नाजुक हो जाते हैं।
स्वतंत्र भारत की अब तक की यात्रा पूरी तरह निर्विघ्न नहीं रही है पर यहाँ की अनेक उपलब्धियाँ गौरवपूर्ण रही है। खाद्यान्न की उपलब्धता, सामरिक तैयारी, कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, यातायात, डिजटल लेन-देन व्यवस्था आदि अनेक क्षेत्रों में भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। अति गरीबी की स्थिति कम हुई है। पर जनसंख्या में वृद्धि को देखते हुए संसाधन कम पड़ रहे हैं और संसाधनों के उपयोग करने में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। बड़ी संख्या में झूठे सच्चे मुकदमे आपसी मतभेद , धोखाधड़ी और अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति को भी दर्शाते हैं। राजनीति के क्षेत्र में नैतिक आचरण की दृष्टि से दुर्बलता बढ़ रही है। राजनेता अपनी सुविधा सुनिश्चित करने में यह भूल जाते हैं कि नेतृत्व करना गहरे दायित्व बोध की अपेक्षा करता है। यह चिंताजनक है कि आर्थिक स्थिति में सुधार के साथ महत्वाकांक्षाएँ भी बढ़ी है और कदाचार के मामले भी। युवा देश होने के कारण, जिसकी अधिकांश जनसंख्या पैंतीस साल की उम्र के नीचे है, यह जरूरी है कि युवा वर्ग को अच्छी शिक्षा और रोज़गार का अवसर मिले। इसके लिए शैक्षिक संस्कृति में सुधार हो और शिक्षा के लिए जरूरी संसाधन मुहैया कराए जाएँ। जेन जी और जेन अल्फा के प्रदर्शन और आक्रोश के संदेश को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
आज व्यक्तिवाद और भौतिक सुख जुटाने की दौड़ में सबको अकेले अपने भर की चिंता है। निजी स्वतंत्रताओं का जश्न मनाया जा रहा है। देश के बारे में सोचने का काम यानी जोड़ने-जुड़ने का प्रयास पिछड़ रहा है जबकि परस्पर संबद्धता ही जीवन का रहस्य है। विछिन्नता तो मृत्यु है। आज हम खंड-खंड होते जा रहे हैं क्योंकि हम केवल अपने स्वार्थ में ही निवेश कर रहे हैं। इस अर्थ में स्वतंत्रता कभी भी निरपेक्ष नहीं हो सकती। स्वच्छंदता मुक्तिदायी न होकर विनाशकारी ही होगी। भोजन करने की स्वतंत्रता हो परंतु असावधान होकर अगर कोई बिना समझे-बूझे खाता जाय तो न खाने का स्वाद मिलेगा और न स्वास्थ्य ही सुरक्षित बचेगा। हम यह भूल रहे हैं कि जिस स्वतंत्रता का हम उपभोग कर रहे हैं, उसके लिए हम देश और समाज के ऋणी हैं। इस ऋण की स्वीकृति हो तो जीवन के विभिन्न स्तरों पर आपसी संबद्धता और परस्परपूरकता का अनुभव होगा। आज स्वतंत्रता के ऋण का प्रतिदान न कर स्वार्थ के यज्ञ में आहुति देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। स्वतंत्रता के विधि-निषेध हम भूलते जा रहे हैं। स्वतंत्रता मुक्ति का आह्वान तो है पर उसका स्वाद तभी मिल सकेगा जब उसके लिए हम तैयार हों।
स्वतंत्रता के अनुभव और उसे जीवंत बनाये रखने के लिए हमें आचरण में उसके विधि निषेधों को भी अपनाना होगा। उसके बिना स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। स्वतंत्रता का फलितार्थ उससे जुड़ी जिम्मेदारियों को निभाने के साथ ही मिल पाता है। स्वतंत्रता की जिम्मेदारी है कि हम दूसरों की, सबकी स्वतंत्रता को बचाए रखें। दूसरे की भलाई करना ही अपनी भलाई है। देशात्म भाव और सर्व की चिंता करते हुए, यानी लोक-संग्रह में ही स्वतंत्रता है। सबकी स्वतंत्रता में ही असली स्वतंत्रता होती है। स्वतंत्रता की जंग तब तक जारी रहेगी जब तक कोई दूसरों की स्वतंत्रता को छीनने का काम करता रहेगा। इसलिए स्वतंत्रता कोई एक क्षण या स्थिति नहीं है। इसके लिए सतत जागते रहने का अभ्यास ज़रूरी है। वास्तव में स्वतंत्रता भोग नहीं कर्म-योग के लिए सतत प्रतिदान का आवाहन है।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

