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लापता हुए मौसम की तलाश

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लापता हुए मौसम की तलाश


-प्रमोद भार्गव

मानसून के अचानक लापता होने से मौसम विभाग की पूर्व में की गई भविष्यवाणी गड़बड़ा गई है। अब उपग्रह से ली गई तस्वीरों से दक्षिण-पश्चिम मानसून के बादल दिखाई नहीं दे रहे हैं। वहीं, दक्षिण और मध्य भारत के कई भूभागों तक मानसून की दस्तक के बावजूद देश के बड़े भू-भाग पर बारिश में भारी गिरावट दर्ज की गई है। दरअसल प्रशांत महासागर में तेजी से बन रही अलनीनो की परिस्थितियां आने वाले 8-10 दिनों में वैश्विक जलवायु और मौसम चक्र को प्रभावित कर सकती हैं।

मौसम विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि यह इतिहास के 140 वर्ष में अब तक के सबसे खतरनाक और बड़े अलनीनो में से एक हो सकता है। स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयाॅर्क में मौसम और पर्यावरण विज्ञान के प्राध्यापक पाल राउंडी कहते हैं कि यह सबसे खतरनाक और सबसे ताकतवर अलनीनो हो सकता है। अलनीनो का यह मिजाज पहले से दुनिया में तप रही धरती की आग में घी डालने का काम करेगा। अनुमान लगाए जा रहे है कि सर्दियों तक अलनीनो का मिजाज बिगड़ा रहेगा। इस कारण आशंका है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सूखा पड़ेगा, बाढ़ आएगी या भीषण गर्मी झेलनी पड़ेगी। यहां तक कि इससे कई देशों में खाने-पीने के सामान और पानी का संकट पैदा होगा।

इस अलनीनो के असर का अनुमान भारतीय मौसम विभाग पहले ही लगा चुका है। इसलिए मौसम विज्ञानी एम रविचंद्रन का कहना है कि प्रशांत महासागर की परिस्थितियों को देखते हुए इसका सीधा असर मानसूनी बारिश पर पड़ेगा। इसके चलते कुछ इलाकों में सूखे की स्थिति पैदा हो सकती है। क्योंकि अभी तक 64 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई है। अतएव मौसम विभाग पहले ही घोषित कर चुका है कि इस बार 11 वर्षों में सबसे कम बारिश हो सकती है। इसका सीधा असर देश की कृषि व्यवस्था पर पड़ेगा।

1988 से भारतीय मौसम विभाग मानसून के पूर्वानुमान लगा रहा है। 1988 से 2025 तक 38 वर्ष के अनुमानों में विभाग की भविष्यवाणी 50 प्रतिशत के करीब सटीक रही हैं। इस बार विभाग के विज्ञानियों ने 26 मई को केरल में मानसून आ जाने का अनुमान लगाया था, जो नहीं आया। बाद में 4 जून से मानसून की आहट आने की बात कही गई लेकिन मानसून लापता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, मौसम में जो बादल पानी बरसाते हैं, उनकी सघनता धीरे-धीरे घट रही है। इससे आशय यह निकलता है कि देश में मानसून में बारिश का प्रतिशत लगातार घट रहा है। दरअसल जो बादल पानी बरसाते हैं, वे आसमान में छह से साढ़े छह हजार फीट की ऊंचाई पर होते हैं। 50 साल पहले ये बादल घने भी होते थे और मोटे भी होते थे। परंतु अब साल-दर-साल इनकी मोटाई और सघनता कम होती जा रही है। यह अध्ययन सही है।

दरअसल महाकवि कालिदास द्वारा रचित महाकाव्य ‘मेघदूत‘ दो खंडों में विभाजित प्रणय काव्य है। पूर्वमेघ और उत्तरमेघ, जो संस्कृत में लिखे गए हैं। इनमें सांसारिक प्रेम का अद्भुत वर्णन है। किंतु इनमें महाकवि ने अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति जिन प्रतीकों से दी है, वे मेघ यानी बादल और बारिश से जुड़े हैं। इनका आशय है कि धरती पर जितने घने वन होंगे, आसमान में उतने ही घने और काले बादल छाकर बरसेंगे। कालिदास वैज्ञानिक नहीं बल्कि संत कवि थे, लेकिन इस तथ्य का खंडन कोई वैज्ञानिक नहीं करता।

इस अध्ययन से देश के नीति-नियंताओं को चेतने की जरूरत है क्योंकि हमारी खेती-किसानी और 70 फीसदी आबादी की रोजी-रोटी मानसून की बरसात से ही चलती है और देश की समूची आबादी को अनाज, दालें और तिलहन उपलब्ध कराती है। देश के ज्यादातर व्यवसाय भी कृषि आधारित हैं। देश की 2025-26 की जीडीपी में कृषि का योगदान 16.2 प्रतिशत रहा है, जबकि 2023-24 में यह 18.2 फीसदी था। फिर भी किसान आर्थिक असुरक्षा की चपेट में है। प्रत्येक साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आये तो पपड़ाई धरती और अकाल की क्रूर परछाइयां देखने में आती हैं।

मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है। 90-96 फीसदी बारिश इस दायरे में आती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है। फिर भी बीते 37 साल में हुई बारिश के आंकड़े बताते हैं कि बादलों के बरसने की क्षमता घट रही है। ऐसा जंगलों के घटते जाने के कारण हो रहा है।

मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है तब कम दाव का क्षेत्र बनता है। इस कम दाव वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के इर्द-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलट कर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं। ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर उड़ीसा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक बरसती हैं।

अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती हैं तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में धरती पर गिरता है।

महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाइयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आंकड़े इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी।

आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता चला आ रहा है। विभाग के पास देशभर में भू-वेधशालाएं, गुब्बारा केन्द्र, रेडियो, पवन वेधशालाएं , तूफान संवेदी, तूफान सचेतक रडार और उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केंद्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले हजारों पानी से भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, विकिरणमापी एवं भूकंपमापी अनेक वेधशालाएं हैं। लक्षद्वीप, केरल व बेंगलुरू में मौसम केंद्रों के डेटा पर सतत निगरानी रखते हुए मौसम की भविष्यवाणियां की जाती हैं। अंतरिक्ष में छोड़े गए उपग्रहों से भी सीधे मौसम की जानकारियां सुपर कम्प्यूटरों में दर्ज होती रहती हैं।

बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी है। हवाएं जैसे-जैसे ऊंची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊंचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है। इस परत की ऊंचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहां इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेंटीग्रेड नीचे पाया गया है। यही परत धु्रव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेन्टीग्रेड नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है। यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपाॅज के संपर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं, उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूंदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूंदों में तब्दील होते हैं और वर्षा के रूप में धरती पर टपकना शुरू होते हैं।

दुनिया के किसी अन्य देशों में मौसम इतना विविध, दिलचस्प, हलचल भरा और प्रभावकारी नहीं है, जितना भारत में है। इसका मुख्य कारण भारतीय प्रायदीप की विलक्षण भौगोलिक स्थिति है। हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सबके ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है। इसीलिए पूरी दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने में अपनी बुद्धि खपाते हैं। फिर भी इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा, इसकी सटीक भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक चूकते रहे हैं।

ऐसा माना जाता है कि आयातित सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ’अलगोरिथम’ का डेटा भारतीय भूगोल के अनुसार नहीं है। अतएव उसके संकेत समझना कठिन होता है। सुपर कम्प्यूटर भले ही आयातित हों लेकिन इनमें मानसून के डेटा भारतीय मानसूनी भूगोल और अपनी भाषा में हो तो हम सटीक भविष्यवाणी करने में सफल हो जाएंगे। हमें अपने सुपर कम्प्यूटरों में देशी भाषा विकसित करनी होगी? क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में हैं, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में नहीं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश