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कुटीर उद्योग बना अवैध शराब का धंधा

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कुटीर उद्योग बना अवैध शराब का धंधा


प्रमोद भार्गव

मध्य प्रदेश में अवैध शराब के निर्माण ने कुटीर उद्योग का रूप ले लिया है। इस शराब का निर्माण बड़े पैमाने पर सीधे-सीधे आसवनी भट्टियों में हो रहा है। यह शराब ड्रमों में लाकर रसायानों से बनाई जा रही है। सागर जिले के बंडा तहसील के ग्राम ततरबारा में अवैध शराब निर्माण की जो फैक्ट्री बताई जा रही है, उसमें बाकायदा अलग-अलग ब्रांड की शराब तैयार करके बोतलों में पैकिंग की जाती थी। यानी शराब निर्माण के सभी उपकरण इस फैक्ट्री में मौजूद थे। इस निर्माण से जुड़े नेटवर्क के तार मुरैना से भी जुड़े बताए जा रहे है। आमतौर से देशी तरीके से बनाई जा रही शराब भी जहरीली शराब में तब बदल जाती है, जब उसमें घटिया सामग्री का असंतुलित घालमेल बैठा दिया जाता है। ऐसा ज्यादा कमाई के चक्कर में किया जाता है, जो दीन-हीनों की मौत का कारण बन जाती है। एक समय जब देशी शराब महुआ, गुड़ और अनाजों से प्राकृतिक तरीके से बनाई जाती थी, तब यह खास घातक नहीं होती थी, किंतु जब से इस शराब का निर्माण रसायनों से होने लगा है, तब से मध्य प्रदेश में ही नहीं देशभर में इस शराब के पीने से निरंतर मौतों की घटनाएं सामने आ रही हैं। धार्मिक नगरियों वाला मध्य प्रदेश ऐसी शराब का गढ़ बन गया है। मध्य प्रदेश की गलत आबकारी नीति भी इस शराब के निर्माण को बढ़ावा देने का काम कर रही है।

शराब के लगातार कहर ढहाने के बाद भी नीति-नियंता इसलिए बेफिक्र रहते हैं, क्योंकि एक तो ऐसी शराब पीने से गरीब और वंचित लोगों की मौतें होती हैं, दूसरे, अब देशी-विदेशी शराब ठेकों में अला राजनेता, आबकारी एवं पुलिस विभाग के नौकरशाह भागीदार हो गए है। इस जहरीली शराब कांड में जिन 30 शराब विक्रेताओं को आरोपी बनाया गया है, उनमें सत्तारूढ़ दल से जुड़े दो सरपंच और एक शराब ठेकेदार शामिल हैं। कुछ आरोपितों को सीधे-सीधे एक पूर्व मंत्री से जुड़ा बताया जा रहा है। साफ है, प्रदेशभर में शराब निर्माण और विक्रय की ठेकेदारी ऐसे लोगों के हाथ में है, जो बाहुबली होने के साथ ऊंची पहुंच रखने वाले है। इसलिए जो भी कार्यवाही होगी वह तत्काल तो मीडिया में असरकारी दिखेगी लेकिन फिर दर्ज एफआईआर शून्य में बदलती चली जाएंगी।

प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने तीन साल पहले शराबबंदी की मुहिम चलाई थी, लेकिन तब के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की चतुराई के चलते वह नक्कारखाने की तूती साबित हुई। शराब की दुकानें और शराब बिक्री के लिए जो नई आबकारी नीति सामने आई थी, उसमें उमा भारती की मुहिम और धमकी का कोई असर दिखाई नहीं दिया था। इस अबकारी नीति के सामने आने के समय से ही अनेक अनुत्तरित सवाल आज भी खड़े हुए हैं। नीति में स्पष्ट नहीं है कि जो शुष्क दिन है, मसलन गांधी जयंती, 15 अगस्त, 26 जनवरी, होली और चुनाव प्रक्रिया के दौरान घरों में शराब का बार खोलने की जो छूट चली आ रही है, वह यथावत जारी रहेगी या नहीं? होम-बार की आड़ में उज्जैन, ओरछा, ओमकारेश्वर जैसे पवित्र नगरों में भी शराबखोरी चलती रहेगी। हालांकि सरकार ने प्रत्यक्ष तौर पर कोई भी नई दुकान खोलने का निर्णय इस नीति में नहीं लिया है, परंतु पिछले दरवाजे से शराब बेचने की पगडंडियां खुली छोड़ दी गई है। देशी शराब की दुकान पर विदेशी और विदेशी शराब की दुकान पर देशी शराब बेची जाती रहेगी। फैसले से स्पष्ट होता है कि सरकार ने तकनीकी रूप से कानूनी झोल की सुविधा बरकरार रखकर यथासिथति बनाए रखी है।

नई आबकारी नीति से सबसे ज्यादा फजीहत उमा भारती की हुई थी। ओरछा की जिस शराब की दुकान पर भारती ने गोबर फेंककर आक्रोष प्रकट किया था, वहां से भी दुकान बदली नहीं गई। अंत में भारती ने राजनीतिक चतुराई बरतते हुए रामराजा मंदिर मार्ग पर खुली दुकान का सारा दोश प्रशासन पर मढ़कर अपनी मुहिम को विराम दे दिया था। यह दुकान पहले नगर में अंदर की तरफ डेढ़ किमी दूर थी, किंतु तब कमाई कम होती थी, ठेकेदार को लाभ दिलाने के लिए जिला आबकारी विभाग ने यह दुकान मंदिर के प्रवेष द्वार पर खुलवा दी। इस दुकान के खोले जाने का विरोध ओरछा के नागरिकों, विद्यार्थी परिशद्, बजरंग दल के नेताओं ने संयुक्त रूप से किया था। लेकिन बात नहीं बनी। प्रदेश सरकार इस दुकान के आगे नतमस्तक हो गई थी। इस पराजय के बाद से उमा भारती ने शराबबंदी की मुहिम से पूरी तरह तौबा कर आंखें मूंद लीं।

शराबबंदी को लेकर अक्सर यह प्रश्न खड़ा किया जाता है कि इससे होने वाले राजस्व की भरपाई कैसे होगी और शराब तस्करी को कैसे रोकेंगे? ये चुनौतियां अपनी जगह बाजिव हो सकती हैं लेकिन शराब के दुष्प्रभावों पर जो अध्ययन किए गए हैं, उनसे पता चलता है कि उससे कहीं ज्यादा खर्च, इससे उपजने वाली बीमारियों और नशा-मुक्ति अभियानों पर हो जाता है। इसके अलावा पारिवारिक और सामाजिक समस्याएं भी नए-नए रूपों में सुरसामुख बनी रहती हैं। घरेलू हिंसा से लेकर कई अपराधों और जानलेवा सड़क दुर्घटनाओं की वजह भी शराब बनती है। यही कारण है कि शराब के विरुद्ध खासकर ग्रामीण परिवेश की महिलाएं मुखर आंदोलन चलातीं, समाचार माध्यमों में दिखाई देती हैं। इसलिए महात्मा गांधी ने शराब के सेवन को एक बड़ी सामाजिक बुराई माना था। उन्होंने स्वतंत्र भारत में संपूर्ण शराबबंदी लागू करने की पैरवी की थी। ‘यंग इंडिया’ में गांधी ने लिखा था, ‘अगर मैं केवल एक घंटे के लिए भारत का सर्वशक्तिमान शासक बन जाऊं तो पहला काम यह करूंगा कि शराब की सभी दुकानें, बिना कोई मुआवजा दिए तुरंत बंद करा दूंगा।’ बावजूद गांधी के इस देश में सभी राजनीतिक दल चुनाव में शराब बांटकर मतदाता को लुभाने का काम करते हैं। वर्तमान में तो पूरे प्रदेश में शराब के साथ-साथ स्मैक, चरस की बिक्री धड़ल्ले से चल रही है।

सर्वोच्च न्यायालय ने शराब पर अंकुश लगाने की दृष्टि से राष्ट्रीय राजमार्गों पर शराब की दुकानें खोलने पर रोक लगा दी थी। किंतु सभी दलों के राजनीतिक नेतृत्व ने चतुराई बरतते हुए नगर और महानगरों से जो नए बाइपास बने हैं, उन्हें राष्ट्रीय राजमार्ग घोषित करने की अधिसूचना जारी कर दी और पुराने राष्ट्रीय राजमार्गों का इस श्रेणी से विलोपीकरण कर दिया। मध्य प्रदेश में भी यही किया गया। साफ है, शराब की नीतियां शराब कारोबारियों के हित दृष्टिगत रखते हुए बनाई जा रही हैं। यह हित इसलिए साधे जा रहे हैं क्योंकि ठेकेदारों के साथ राजनेता और अधिकारी भी इस गठबंधन के हिस्सेदार हो गए हैं। यदि ये शामिल नहीं है तो साफ है शराब माफिया सरकार पर भारी हैं। अतएव जहरीली शराब का यह गोरखधंधा भविष्य में भी रुकने वाला नहीं है। सवाल है कि उमा भारती शराबबंदी के लिए सड़क पर उतरेंगी, ऐसा लगता तो नहीं है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश