होलीः जाति, पंथ, उम्र से परे जीवंत महाउल्लास
-हृदयनारायण दीक्षित
रंग पर्व होली को नमस्कार। कृत्रिम मेधा, असली मेधा व ऑनलाइन बुद्धिमत्ता को नमस्कार। सत्व, रज और तम की त्रिगुणी को नमस्कार। ब्रह्मा, विष्णु और महेश त्रिदेवों को नमस्कार। धर्म, अर्थ और काम की पुरुषार्थ त्रयी को नमस्कार। गीता, ब्रह्मसूत्र व उपनिषद की प्रस्थान त्रयी को नमस्कार। शब्द, अपशब्द व संसदीय मर्यादाहीनता को नमस्कार। प्रकृति चिरन्तन और आनंदरस से परिपूर्ण। इसके अन्तःपुर में आनंदरस का महास्रोत है। भारतीय चिन्तन में इसी स्रोत का नाम है-उत्स। आनंद का यह स्रोत मधुमय है। उत्सव इसी आनंद रस का अतिरेक आपूरण है।
यूरोप और अमेरिकी समाजों के उत्सव बाजार तय करता है और भारत के उत्सव तय करता है देश-काल। प्रकृति सदाबहार नायिका है। नदियां हंसती-नृत्य करती बहती हैं, मनुष्य आनंदित होता है। सो नदियों के तट पर उत्सव नृत्य और संकीर्तन। प्रकृति जहां-जहां जब-जब आनंदित करती है तब-तब वहां-वहां उत्सव। लेकिन काल सबका नियंता है। अथर्ववेद के ऋषि भृगु ने गाया है कि काल में ही सुख-दुख और आनंद है। काल में ही ऋक् यजुष और सामगान हैं। भारतीय उत्सवों में प्रकृति और काल-मुहूर्त की जुगुलबन्दी है। बसंत ऐसी ही मनभावन उपस्थिति है। बसंत में प्रकृति और काल की गलमिलौवल है।
प्रकृति मनमौजी है, तमाम रूपों में सजती है, खिलती है। बड़ी मस्त-मस्त और बिन्दास है यह। लेकिन यह नायिका परम स्वतंत्र नहीं है। प्रकृति में नियमबद्धता है। वैदिक ऋषियों ने सृष्टि के इस संविधान को ऋत कहा, ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमंत, पतझड़ और बसंत इसी ऋत के ऋतु-रूप हैं। बसंत परिपूर्ण प्राकृतिक तरूणाई है। प्रकृति की अंग-अंग उमंग का नाम है बसंत। यों सभी उत्सव मनुष्य का सामाजिक उल्लास हैं लेकिन बसंत समूची प्रकृति का चरम परम उल्लास धर्म है। हम सब प्रकृति के अंश हैं, प्रकृति के गुणों के प्रभाव में है। प्रकृति गीत गाये, नाचे, महकें और मनुष्य चुप रहे ऐसा हो ही नहीं सकता। प्रकृति के रूप मनुष्य ही नहीं अन्य प्राणियों को भी संवेदित करते हैं। वर्षा ऋतु में मोर नाचते हैं, मेढ़क गीत गाते हैं। शरद् ऋतु जानकर खंजन पक्षी पुलक में होते हैं पर बसंत के संवेदन की बात ही दूसरी है।
बसंती पवन भारतीय काव्य का उत्प्रेरण रही है। आखिरकार क्या हो जाता है? वायु देव को बसंत में। वे जिसे छूकर आगे बढ़ते हैं, वही मदमस्त हो जाता है। वे कलियों की चोली उड़ा ले जाते हैं, तरूणों को सहलाते हैं, तरूणियों को तब तक गुदगुदाते हैं, जब तक वे खिलखिलाकर पूरी खिल नहीं जाती। तरूण तो तरूण हैं। मनतरंग में झूमना उनकी स्वाभाविकता है। लेकिन बूढ़े-बुजुर्ग भी बासंती पवन में मदमस्त हो जाते हैं। नदी, तालाब और खेत-ऊसर भी बसंत की मौज में होते हैं। हमारे गांव से बहने वाली सई नदी भी आनंद मगन हो जाती है। उसके तट पर खड़े बनबबूल के पेड़ों पर गीत उगते हैं। पक्षी प्रेमगीत गाते हैं, गायें उछलती हैं। न शीत की जकड़न और न गर्मी की उमस और बेचैनी। बसंत का प्रभाव सब पर एक जैसा। बूढ़े मनुष्य ही नहीं बूढ़े वृक्ष भी फूलों से लद जाते हैं। फागुन सबको लहालोट करता है। मनतरंग के देव ‘काम’ भीतर से कुलाचें मारते हैं। बसंत इसीलिए ऋतुराज है।
पृथ्वी सगंधा है। फूलों से सुगंध उड़ती है, मरूद्गण इस सुगंध को दशों दिशाओं तक पहुंचाते हैं। धरती-आकाश गंध आपूरित होते हैं। तिक्त नीम अशोक हो जाती है और बेहया की पौध हो जाती है मौलश्री। तब गुलाब रातरानी जैसी सुगंध देने लगता है और रातरानी कमलगंध में हहराती प्रीति। प्रकृति के सभी रूप रसवन्त हो जाते हैं। नदियां नर्तन करती हैं, झीलें गीत गाती हैं, वनस्पतियां झूम उठती हैं। शरद् और ग्रीष्म गलबहियां डालकर मिलते हैं। पक्षी मस्त-मस्त गीत गाते हैं। वे ऋत बंधन में रहते हैं। लेकिन बसंत और होली में शास्त्रीयता का कोई बंधन नहीं। यह बसंत दो दिन के लिए नहीं आता। पूरे तीन-चार माह तक विहंसता है, समूची प्रकृति को रस आपूरित करता है। प्रकृति का हरेक अंश उत्सव मनाता है। हरेक वृक्ष, हरेक फूल, कीट, पतिंग, पशु, पक्षी और मनुष्य मधु उत्सव में होता है। होली इन्हीं मधु उत्सवों का महोत्सव है।
होली आनंद का अतिरेक है और अतिरेक कभी शास्त्रीय नहीं होता। होली का लोक अपने छन्द स्वयं गढ़ता है। लोक में अतिरिक्त ऊर्जा है, उफनाती ऊर्जा आनंद का अतिरेक है यहां। ऊर्जा का अतिरेक ही उत्सव बनता है। मनुष्य की तरह समाज का भी मूल-उत्स होता है। समाज का मूल-उत्स संस्कृति है। समाज का आनंदमगन समवेत ही उत्सव हैं। होली भारत का मधुरस है, मधुछन्द है, सामगान है, लोकनृत्य है और लोक संस्कृति की चरम अभिव्यक्ति है। होली भारत के मन का उल्लास है। चहुदिश, दिक्काल, लाल गुलाल, सबके गाल। होली का उल्लास प्रायोजित नहीं होता। भारतीय उत्सव प्रकृति का प्रसाद है। होली महाप्रसाद है।
होली मधु अनुभूति का मधु प्रसाद है। प्रकृति का यह मधु प्रसाद अखण्ड है। सूर्य उगते हैं, अस्त होते हैं। मास आते हैं, विदा होते हैं। सम्वत्सर, युग और मन्वन्तर आते हैं पर मधु उत्सवों का मधु प्रसाद कोष रीता नहीं होता। बसंत ऐसा ही मधुकोष लेकर हर साल आता है। होली के अवसर पर बांटता है। होली का यह मधु पूरे साल चलता है। होली भारत का मन मधुमय करती है। इसीलिए यह लोक-महोत्सव है। भारत की भू-सांस्कृतिक आस्था का नर्तन, दर्शन दिग्दर्शन है। यहां लोक अभिव्यक्ति है, राष्ट्रीय एकत्व है और सांस्कृतिक समरसता है। लोक आनंद की अनुभूति है। तमाम असम्भवों का संगम है। होली सबकी प्रीति है, राष्ट्र की रीति है। भारत की उमंग और भारत के मन की रंग तरंग है। देश के उत्तर, दक्षिण और पूरब, पश्चिम होली सबकी प्यारी है। होली विश्ववारा भारतीय संस्कृति का मनआनंद है। होली गीत गाता नृत्य मगन उन्मुक्त अध्यात्म है। धरती, आकाश, वन और सम्पूर्ण उपवन का गीत-संगीत है। होली जाति, पंथ, उम्र से परे जीवन्त महामुक्ति और महाउल्लास है।
कुछ विद्वानों ने होली को मिस्र या यूनान से आयातित बताया है। होली जैसा उत्सव बेशक मिस्र में था, यूनान में भी था। जैमिनि ने होलाका पर्व का उल्लेख (400-200 ईसा पूर्व) किया और लिखा कि होलाका सभी आर्यों का उत्सव था। आचार्य हेमाद्रि (1260-70 ई0) ने पुराण उद्धरणों से होली की प्राचीनता दर्शाई है। वात्स्यायन के कामसूत्र (1.4.42) में यह एक बसंतोल्लास क्रीड़ा पर्व है।
प्राचीनता और आधुनिकता अलग-अलग नहीं होती। वे पृथक दो इकाइयाँ नहीं हैं। प्रकृति सृष्टि का प्रवाह अविच्छिन्न है। जिसे हम प्राचीनता कहते हैं, वह और भी प्राचीन परम्परा का विकास है। इसी तरह आधुनिकता भी है। 100 बरस पहले जिसे आधुनिकता कहते थे, वह भी प्राचीन होती जा रही है। परम्परा एक सतत् प्रवाह है। परम्परा और उत्सव व्यक्तिगत नहीं होते। उन्हें काल विभाजन के अनुसार नहीं बांटा जा सकता।
सामूहिकता हरेक कालखण्ड में आनंददायी रही है। सामूहिक आनंद और उत्सव पर्यायवाची हैं। प्राचीन भारत का समाज सामूहिकता में आनंदित है इसलिए हर दिन मधुउत्सव है, प्रतिपल मंगल गीत हैं, प्रतिपल मधुवर्षा है। सामूहिकता शोक और दुख को फटकने भी नहीं देती लेकिन विदेशी सत्ता के प्रभाव में हम भारत के लोग सामूहिकता खोते गये। व्यक्तिगत के भीतर और भी व्यक्तिगत होते गये। सो होली जैसे अंतरराष्ट्रीय उत्सव भी व्यक्तिगत हो रहे हैं। अब बाजार तय करता है हमारे उत्सव की रूपरेखा। सो भारतीय समाज में विषाद है। उत्सव धर्म विषाद को प्रसाद में बदलते हैं। आइए, उत्सवधर्मी हों हम सब। आओ रंग चढ़ा लें देशी कि रंग परदेशी उतर जाए।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

