जीवन का उत्सव है होली
-डॉ. आशीष वशिष्ठ
रंगों का त्योहार होली भारत और दुनिया भर में भारतीय समुदायों के बीच सबसे जीवंत और आनंदमय उत्सवों में से एक है। परंपरागत रूप से वसंत ऋतु के आगमन और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक होली, हंसी, एकता और रंगों का उत्सव है। हालांकि इसकी जड़ें उत्तर भारत में गहरी हैं लेकिन अब यह त्योहार पूरे भारत में दक्षिण भारत सहित और विश्व स्तर पर जहां भी भारतीय संस्कृति फल-फूल रही है, वहां मनाया जाता है।
होली का महत्व पौराणिक कथाओं में गहराई से जुड़ा हुआ है और विभिन्न कथाएं इसकी समृद्ध परंपरा का हिस्सा हैं। ऐसी ही एक कथा प्रह्लाद और होलिका की कहानी है, जो अत्याचार और छल पर भक्ति और धर्म की विजय का प्रतीक है। एक अन्य कथा राधा-कृष्ण के दिव्य प्रेम का गुणगान करती है, जिनके रंगों से भरे खेल इस त्योहार का पर्याय बन गए हैं।
होली की तरह इसकी परम्पराएं भी अत्यंत प्राचीन हैं और इसका स्वरूप और उद्देश्य समय के साथ बदलता रहा है। प्राचीन काल में यह विवाहित महिलाओं द्वारा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए मनाया जाता था और पूर्ण चंद्र की पूजा करने की परम्परा थी। वैदिक काल में इस पर्व को नवात्रैष्टि यज्ञ कहा जाता था। उस समय खेत के अधपके अन्न को यज्ञ में दान कर प्रसाद लेने का विधान था। अन्न को होला कहते हैं, इसी से इसका नाम होलिकोत्सव पड़ा। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुदी प्रतिपदा के दिन से नववर्ष का भी आरम्भ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरम्भ होता है। अत: यह पर्व नवसंवत् का आरम्भ तथा वसंतागमन का प्रतीक भी है। इसी दिन प्रथम पुरुष मनु का जन्म हुआ था, इस कारण इसे मन्वादितिथि कहते हैं।
होली नवजीवन, समृद्धि और पुरानी बातों को भुलाने का प्रतीक है- चाहे वह बीते मौसम को त्यागना हो, पुरानी शिकायतों को दूर करना हो या नकारात्मकता को। भारतीय पौराणिक कथाओं में निहित होलिका और प्रह्लाद की कहानी अहंकार और बुराई पर आस्था और अच्छाई की विजय का प्रतीक है। होली की पूर्व संध्या पर किया जाने वाला होलिका दहन का अनुष्ठान अतीत को जलाकर नई शुरुआत का स्वागत करता है। यह रंगोत्सव हमारे पूर्वजों की दूरदर्शिता है जो अनेक विषमताओं के बीच भी समाज में एकत्व का संचार करता है।
होली के उत्सव में रंगों का विशेष महत्व है क्योंकि यह उत्सव को गहराई और अर्थ प्रदान करता है। प्रत्येक रंग का अपना विशेष प्रतीक होता है जो जीवन, प्रकृति और संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है। रंगों को एक-दूसरे पर उछालना बाधाओं को तोड़ने, बुराई पर अच्छाई की विजय और लोगों के बीच एकता, समानता और आनंद को बढ़ावा देने का प्रतीक है।
होली पहले मोदुगा (ब्यूटिया मोनोस्पर्मा), गेंदा, गुड़हल, टेसू, हल्दी, नीम, चुकंदर और नील जैसे फूलों से प्राप्त प्राकृतिक रंगों से खेली जाती थी। हालांकि, आधुनिकीकरण के कारण इन प्राकृतिक रंगों की जगह कृत्रिम रासायनिक रंगों ने ले ली। हानिकारक विषाक्त पदार्थ, भारी धातुएं और औद्योगिक रंग जो त्वचा की एलर्जी, श्वसन संबंधी समस्याएं और दीर्घकालिक स्वास्थ्य जोखिम पैदा करते हैं। जल निकायों और मिट्टी का प्रदूषण, जो त्योहार के बाद भी लंबे समय तक पर्यावरण को प्रभावित करता है। होली की खुशी स्वास्थ्य और स्थिरता की कीमत पर नहीं मिलनी चाहिए। सौभाग्य से प्राकृतिक रंगों का पुनरुद्धार हो रहा है। अब अधिक लोग पौधों से बने और पर्यावरण के अनुकूल होली के पाउडर को अपना रहे हैं और प्राकृतिक रंगों की सुंदरता को फिर से तलाश रहे हैं।
उत्सव के बीच मीठे पकवानों की खुशबू हवा में घुल जाती है, जिससे त्योहार में एक अलग ही रंग भर जाता है। पारंपरिक मिठाइयां और नमकीन बड़े प्यार और देखभाल से तैयार किए जाते हैं, जो होली की उदारता और आतिथ्य सत्कार की भावना का प्रतीक हैं। सबसे लोकप्रिय पकवानों में खोया और मेवों से भरी गुजिया और ठंडाई शामिल हैं। ठंडई मसालों से भरपूर और भांग से सुगंधित ताज़ा पेय है। ये स्वादिष्ट पकवान दोस्तों और पड़ोसियों के साथ बांटे जाते हैं, जिससे समुदाय और भाईचारे की भावना को बढ़ावा मिलता है।
इन मिठाइयों और व्यंजनों का स्वाद तो लाजवाब है ही, इनका गहरा सांस्कृतिक महत्व भी है, जो जीवन की मिठास और समृद्धि की खुशी का प्रतीक हैं। ये बचपन और पारिवारिक समारोहों की यादें ताजा कर देते हैं, जहां हंसी और प्यार उम्र और पृष्ठभूमि की सीमाओं को पार करते हुए खुलकर बहते थे। होली के रंग जब आनंद और उल्लास फैलाते हैं तो वे भारतीय संस्कृति की जीवंतता और विविधता के लिए सशक्त प्रतीक बन जाते हैं। रंगों की इस बहुरंगी छटा के माध्यम से होली उन परंपराओं, भाषाओं और रीति-रिवाजों की विविधता को दर्शाती है जो भारतीय समाज का ताना-बाना बुनती हैं। यह जीवन का उत्सव है, उस अटूट दृढ़ता और नवीनीकरण की भावना का प्रमाण है जो हम सभी को एकजुट करती है।
होली अपने प्रतीकात्मक महत्व और रीति-रिवाजों से परे समावेशिता और क्षमा की भावना का प्रतीक है, जो लोगों को मतभेदों को भुलाकर उस साझा मानवता को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करती है जो हम सभी को एक साथ बांधती है। यह प्रेम और करुणा की शक्ति की याद दिलाती है जो कठिनाइयों पर विजय पाने और मित्रता और समझ के बंधन को मजबूत करने में सहायक होती है।
होली के उपलक्ष्य में अनेक सांस्कृतिक एवं लोक चेतना से जुड़े कार्यक्रम होते हैं। महानगरीय संस्कृति में होली मिलन के आयोजनों ने होली को एक नया उल्लास एवं उमंग का रूप दिया है। इन आयोजनों में बहुत शालीन तरीके से गाने-बजाने के सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। चंदन का तिलक और ठंडाई के साथ सामूहिक भोज इस त्यौहार को गरिमामय छवि प्रदान करते हैं। देर रात तक चंग की धुंकार, घूमर, डांडिया नृत्य और विभिन्न क्षेत्रों की गायन मंडलियां अपने प्रदर्शन से रात बढ़ने के साथ-साथ मस्ती और खुशी को बढ़ाते हैं।
देश की सीमाओं से परे होली ने बहु संस्कृतिवाद और वैश्विक एकजुटता के प्रतीक के रूप में भी लोकप्रियता हासिल की है। अमेरिका, कनाडा और यूनाइटेड किंगडम जैसे महत्वपूर्ण भारतीय प्रवासी समुदायों वाले देशों में होली का उत्सव सांस्कृतिक कैलेंडर का अभिन्न अंग बन गया है, जो सभी राष्ट्रीयताओं और पृष्ठभूमियों के लोगों को आकर्षित करता है। ये उत्सव अंतर-सांस्कृतिक आदान-प्रदान और संवाद के अवसर प्रदान करते हैं, जिससे भारतीय संस्कृति और परंपराओं की समझ और सराहना को बढ़ावा मिलता है।
होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है बल्कि जीवन का ही उत्सव है- यह मानवीय भावना के लचीलेपन और प्रेम, क्षमा और नवीनीकरण की स्थायी शक्ति का प्रमाण है। होली के पावन पर्व पर हमें इस बात के लिए दृढ़ संकल्पित होना होगा कि अपने मन, वाणी और व्यवहार में अंतर्निहित आसुरी प्रवृत्तियों का परिष्कार करें एवं उसके स्थान पर पवित्रता की देवी को प्रतिष्ठित करें। हमें ऐसी सद्इच्छा करनी चाहिए होली की अग्नि में हमारी समस्त पीड़ायें दु:ख, चिंताएं, द्वेष-भाव, मतभेद और मनभेद आदि भस्म हो जाएं तथा हम सबके जीवन में प्रेम, प्रसन्नता, समानता, स्वतंत्रता, समरसता, हर्षोल्लास तथा आनंद के रंग भर जाएं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

