आम की जगह खास की चिंता करती पत्रकारिता
हिन्दी पत्रकारिता दिवस (30 मई) पर विशेष
-डॉ. प्रभात ओझा
जिस समाचार पत्र के प्रारम्भ होने के तथ्य को याद करते हुए हम हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाते हैं, उसका स्मरण रस्मी हो चला है। प्रथा और परिपाटी का संवहन अच्छी बात है, बशर्ते कि हम उसे सार्थक बनायें। पिछले दो-तीन दशक से इसके विपरीत ही हुआ है। हर 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर हम तरह -तरह के आयोजन करते हैं, लेख लिखते हैं। अगले दिन यानी 31 मई को आयोजन की रिपोर्ट तक अखबारों में नहीं दिखती। जवाब में कह सकते हैं कि अखबारों में पेज कम हुए हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेज घटनाओं से लेकर स्थानीय हलचल की प्राथमिकता तय करने में संगोष्ठियों का नंबर बहुत बाद में आता है।
फिर यह भी मजबूत दलील कि जिनके लिए गोष्ठियां आयोजित हुईं, उनतक तक यह पहुंच ही जाती हैं। आमजन का इससे कोई वास्ता नहीं होता। पहली और प्राथमिक समझ यहीं से तय होनी चाहिए। यहां हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाने का सबब यानी युगल किशोर शुक्ल सम्पादित पत्र ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ ही ‘सर्चलाइट’ का काम कर सकता है। ‘सर्चलाइट’ शब्द का इस्तेमाल साहित्य के लिए मुंशी प्रेमचंद ने किया था। हम साहित्य के सिर्फ एक हिस्से पत्रकारिता की बात करते हैं और प्रेमचंद का ‘सर्चलाइट’ बहुत पहले कहे युगल किशोर शुक्ल के ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ में दिखाई पड़ता है। यह ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ का ध्येय वाक्य था। सिर्फ आयोजन नहीं, यहां तक कहा जाय कि हिन्दी सहित सम्पूर्ण पत्रकारिता में इस ध्येय वाक्य को सामने रखने से उसका उद्देश्य पूरा होता नजर आता है। यह ध्येय वाक्य पत्रकारिता के लिए आईना की तरह है।
उदन्त मार्त्तण्ड के ध्येय वाक्य में आया ‘हेत’ दरअसल ‘हेतु’ के ही रूप में अपनाया गया तत्कालीन कलकतिया हिन्दी शब्द है। पत्रकारिता के संदर्भ में भाषा नहीं, उसका मकसद ही अर्थ रखा करता है। अन्यथा जिस कलकत्ता (अब कोलकाता) से हिन्दी का यह पहला अखबार निकला, उसके पहले वहीं से अंग्रेजी सहित अन्य समाचार पत्र प्रकाशित हुए अथवा हो रहे थे। इतिहास गवाह है कि राजनीतिक और व्यावसायिक केंद्र होने के कारण इसी शहर से भारत का पहला अखबार हिक्कीज गजट (1780) निकला। यानी उदन्त मार्त्तण्ड (1826) से 46 साल पहले। जेम्स ऑगस्टस हिक्की के इस साप्ताहिक अखबार का पूरा नाम बड़ा रोचक है और उसके ‘मास्टहेड’ पर चार पंक्तियों में छपता रहा। अखबार का नाम ‘हिकीज बंगाल गजट ऑर द ओरिजिनल कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर’ था। आमतौर पर कह दिया जाता है कि तमाम तरह की कठिनाइयां, जैसे डॉक से भेजने पर रोक और मुकदमों के कारण इसे बंद करना पड़ा था। यह भी जरूर तथ्य मिलते हैं कि हिकी ने ईस्ट इंडिया कंपनी और गवर्नर जनरल हेस्टिंग्स पर कुछ ऐसे आरोप लगाये, तो पुष्ट नहीं किये जा सके। फिर यह कैसे भुला दें कि भ्रष्टाचार के आरोप में हेस्टिंग्स और मुख्य न्यायाधीश एलिजा इम्पी पर ब्रिटिश संसद में महाभियोग का मुकदमा चला। अलग बात है कि तब के भारत जैसे देश में शीर्ष अंग्रेज अधिकारियों पर आरोप वाले मुकदमे का जो परिणाम होना था, वही हुआ।
इसी तरह बांग्ला का बंगाल गजट, दो अंक तक उर्दू और फिर फारसी में छपे जामे-जहांनुमा और फारसी का ही मिरात- उल- अखबार भी कलकत्ता से ही छपे। कलकत्ता के साथ उसी दौर में तब के बंबई और मद्रास से भी बहुत से अखबार निकले। इनके कुछ ही समय बाद निकला उदन्त मार्त्तण्ड ऐसा अखबार था, जिसने पहली बार हिंदुस्तानियों के हित का ध्यान रखने की स्पष्ट घोषणा की।
हिंदुस्तानियों के हित का ध्यान रखने को सिर्फ भारत नहीं, पूरी दुनिया के आम हितों के लिए प्रतीक के तौर पर समझा जाना चाहिए। कुछ तथ्य ऐसे हैं जिनसे लगता है कि मीडिया अपने इस प्रमुख ध्येय से भटक रहा है। जहां इस मकसद पर डटा है, वहां कोपभाजन भी बन रहा है। तभी तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप सीएनएन, न्यूयार्क टाइम्स और वॉल स्ट्रीट जर्नल पर फेक न्यूज देने के आरोप लगाते हैं। उनका कहना है कि ये अखबार ईरान की हार को भी जीत बताने की कोशिश में लगा है। राष्ट्रपति इन अखबारों के साथ डेमोक्रेटिक पार्टी नेताओं को भी ‘पूरी तरह भटका हुए’ और ‘पागल’ तक कहने से परहेज नहीं करते। हमारे देश में भी आम तौर पर मीडिया गिरावट की ही ओर है।
स्वतंत्रता आंदोलन की तरह किसी ‘मिशन’ का नहीं होना कारण बताया जा सकता है। फिर भी जनहित अपने आप में एक मिशन है। इसके लिए सम्पादक नाम की सत्ता का मजबूत होना जरूरी है। समाचार पत्र चलाने के लिए धन की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता, पर अभी कुछ वर्ष पहले तक कुछ तो था कि पाठकों का एक समूह सिर्फ सम्पादकीय पढ़ने के लिए किसी विशेष अखबार को खरीदा करता था। आखिर मीडिया घरानों को अखबार चलाने के लिए धन पहले भी तो मिला ही करता था।
ठीक है कि विचार स्वातंत्र्य के नाम पर इलेक्ट्रॉनिक और तरह-तरह के मीडिया प्लेटफार्म भी सामने आए हैं। फिर भी सवाल ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ का ही है। हर समय की पत्रकारिता इसी कसौटी पर कसी जाएगी। उस पर मीडिया के खरा उतरने का मानक यही होगा कि वह खास लोगों की जगह आम जन की चिंता करे। इधर अथवा उधर का ठप्पा लगने की जगह बेहतर यही हो कि उस पर जनता की तरफ होने का मुहर लगे।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

