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डॉ हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल : ऐतिहासिक जुड़ाव

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डॉ हेडगेवार, डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी और बंगाल : ऐतिहासिक जुड़ाव


-डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल

हाल ही में हुए बंगाल विधानसभा चुनाव न केवल भाजपा की एक और जीत थी बल्कि आंतरिक और बाहरी विरोधियों के लिए बड़ी हार भी थे। यह चुनाव न केवल पश्चिम बंगाल के लिए बल्कि पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए भी बहुत अहम था। बंगाल के लोग, खासकर हिंदू, उन राजनीतिक दलों के खिलाफ अपनी एकता के लिए तारीफ के हकदार हैं जिन्होंने राज्य की अखंडता से समझौता किया है। यह बदलाव जनसंघ के समय से ही रा.स्व. संघ और भाजपा की कोशिशों का नतीजा है। दशकों से किए गए बड़े काम को पहचानना ज़रूरी है।

पश्चिम बंगाल और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी के बीच का रिश्ता आज के राजनीतिक माहौल तक सीमित नहीं है। यह रिश्ता सीधे तौर पर संघ के बनने और जनसंघ की नींव रखे जाने से पहले के समय से जुड़ा है। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की वैचारिक सोच और बाद में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीतिक भूमिका, दोनों ही पश्चिम बंगाल से जुड़ी रही है।

1910 में जब युवा केशव बलिराम हेडगेवार मेडिकल की पढ़ाई के लिए कलकत्ता (अब कोलकाता) गए, तो बंगाल भारत में क्रांतिकारी आंदोलनों का मुख्य गढ़ था। डॉ. हेडगेवार देशभक्ति की भावना से भरे हुए थे इसलिए कलकत्ता जाने के बाद वे वहाँ के मशहूर क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति' के सीधे संपर्क में आए। कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान, उन्होंने न केवल मेडिकल की पढ़ाई की बल्कि उस समय के प्रमुख क्रांतिकारियों के साथ देश सेवा के काम में भी शामिल हुए। वे बिपिन चंद्र पाल, पुलिन बिहारी दास और रास बिहारी बोस जैसे नेताओं के विचारों से प्रभावित थे। उस दौरान, उन्होंने क्रांति की कई गुप्त गतिविधियों में सीधे और परोक्ष रूप से हिस्सा लिया।

कलकत्ता की धरती से डॉ. हेडगेवार को मिली संगठनात्मक प्रेरणा और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा लगाए गए जनसंघ के बीज इस इतिहास का पहला हिस्सा हैं। हालाँकि, बाद के समय में इन विचारों ने बंगाल की धरती पर अपनी पकड़ कैसे मजबूत की और लेफ्ट-तृणमूल की कड़ी चुनौतियों के बावजूद बीजेपी ने वहाँ जो राजनीतिक जीत हासिल की, वह आधुनिक भारत के इतिहास का एक बहुत महत्वपूर्ण चरण है।

कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति: खिलाफत आंदोलन के दौरान कांग्रेस की भूमिका और मुस्लिम तुष्टिकरण की शुरुआत ने डॉ. हेडगेवार को परेशान किया। उनका मानना ​​था कि समाज की अंदरूनी कमियों, जैसे जाति-भेदभाव और कमज़ोरी को दूर किए बिना राष्ट्र मज़बूती से खड़ा नहीं हो सकता।

संघ की स्थापना (1925): यह सोचते हुए कि आज़ादी पाना जितना ज़रूरी है, उसे बनाए रखने के लिए समाज में अनुशासन, चरित्र और संगठन भी उतने ही ज़रूरी हैं, वे क्रांतिकारी रास्तों और राजनीतिक आंदोलनों से आगे बढ़े और 25 सितंबर 1925 (विजयादशमी) को नागपुर में 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ' की स्थापना की। यह बंगाल में मिले अनुभवों और वैचारिक मंथन का नतीजा था।

संघ के बनने के कुछ दशकों बाद, बंगाल एक बार फिर इस विचारधारा से मज़बूती से जुड़ा और वह नाम था डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा वाइस-चांसलर और कट्टर राष्ट्रवादी नेता डॉ. मुखर्जी ने बंगाल के बंटवारे के समय हिंदुओं की रक्षा में अहम भूमिका निभाई। आज़ादी के बाद वे नेहरू की पहली कैबिनेट में उद्योग मंत्री थे, लेकिन नेहरू-लियाकत समझौते और अनुच्छेद 370 (जिसने कश्मीर को विशेष दर्जा दिया था) के विरोध में उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया। उस समय, उन्हें एक ऐसे राजनीतिक विकल्प की ज़रूरत थी जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की वकालत करे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी (माधव सदाशिव गोलवलकर) से बात की। संघ ने डॉ. मुखर्जी की मदद के लिए अपने कुछ प्रमुख स्वयंसेवकों, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी शामिल थे, को भेजा।

कश्मीर के पूरी तरह विलय के लिए डॉ. मुखर्जी के इस ऐलान 'एक देश में दो प्रधान, दो विधान और दो निशाण नहीं होंगे' ने भारतीय राजनीति को एक नई दिशा दी। कश्मीर में आंदोलन के दौरान उनकी रहस्यमयी मौत ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक ज़बरदस्त लहर पैदा कर दी। 1947 के बंटवारे के बाद, पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से लाखों हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल आए। उस बेहद मुश्किल समय में, RSS स्वयंसेवकों ने सीमा पर और कलकत्ता के कैंपों में राहत शिविर शुरू किए।

सांस्कृतिक जुड़ावः हालांकि वामपंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण बंगाल में खुलकर काम करना मुश्किल था, फिर भी संघ ने शिक्षा और सेवा के ज़रिए ग्रामीण इलाकों में संबंध बनाए। संघ ने शांति सें बंगाल को 'वास्तु पूजक' से 'भारत माता पूजक' बनाने का काम जारी रखा। बंगाल में पूजी जाने वाली 'शक्ति' (दुर्गा पूजा) और संघ की 'राष्ट्र शक्ति' के बीच संबंध को लोगों के मन में बिठाया गया।

21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की, जो आज की 'भारतीय जनता पार्टी' का पूर्ववर्ती संगठन है। जनसंघ के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष एक बंगाली व्यक्ति थे; इस इतिहास को भुलाया नहीं जा सकता। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के बाद भी बंगाल में जनसंघ का अस्तित्व बना रहा। हरिभाऊ गोडबोले और प्रो. हरिपाद भारती जैसे नेताओं ने मुश्किल हालात में भी अपनी विचारधारा को बनाए रखा। हालांकि, 1977 के बाद बंगाल में 34 साल तक वाम मोर्चा और बाद में तृणमूल कांग्रेस सत्ता में रही। इस दौरान संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं को बेहद हिंसक राजनीतिक दमन का सामना करना पड़ा। कई कार्यकर्ताओं ने अपनी जान गंवाई लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा नहीं छोड़ी।

2011 में ममता बनर्जी ने वामपंथियों को सत्ता से बाहर कर दिया। हालांकि, इसके बाद बंगाल में शुरू हुई 'तुष्टिकरण की राजनीति' और भाजपा-संघ के सांस्कृतिक कार्यक्रमों (जैसे रामनवमी जुलूस) पर लगाई गई पाबंदियों ने बंगाल के मूल 'भद्रलोक' (शिक्षित मध्यम वर्ग) और ग्रामीण लोगों को नाराज करना शुरू कर दिया।

जिस बंगाल ने 'वंदे मातरम' और 'जन-गण-मन' दिया, वहां यह भावना घर कर गई थी कि राष्ट्रीय पहचान को कमजोर किया जा रहा है। इसी आधार पर भाजपा ने बंगाल की जनता को देशभर में और एनडीए शासित राज्यों में अपने वैचारिक ढांचे और विकास कार्यों को दिखाकर अपने आप को मजबूती सें प्रस्थापित किया।

2014 के बाद, भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह - ने बंगाल पर विशेष ध्यान दिया। उन्होंने गर्व के साथ बंगाल की पहचान यानी रवींद्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानंद और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की विरासत को दोहराया। आज जब हम पश्चिम बंगाल में बीजेपी और संघ परिवार का विस्तार देखते हैं, तो यह केवल एक अस्थायी राजनीतिक लाभ नहीं है बल्कि इसके पीछे एक मजबूत ऐतिहासिक आधार है।

पश्चिम बंगाल ही वह धरती है जहाँ युवावस्था में डॉ. हेडगेवार की वैचारिक सोच विकसित हुई और यहीं से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के रूप में जनसंघ का जन्म हुआ। इसलिए, संघ और बीजेपी के इतिहास के तार बंगाल की मिट्टी से हमेशा के लिए जुड़े हुए हैं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश