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सुप्रीम कोर्ट के बाद अब हाई कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की बारी

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सुप्रीम कोर्ट के बाद अब हाई कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने की बारी


अभिषेक शुक्ल

१६ अक्टूबर से दशहरे का अवकाश शुरू हुआ है। कोर्ट अब २२ अक्टूबर को खुलेगा। बाहर से देखने पर आपको लगेगा कि कोर्ट में बहुत लम्बी छुट्टी हुई है

लेकिन एक जज के चैंबर में कभी अवकाश नहीं होता। यह अब भी नियमित रूप से प्रतिदिन खुलता है। जज साहब ने कुछ फैसले सुरक्षित कर रखे हैं। उनका कोर्ट के बाद और छुट्टियों का समय उन फैसलों को लिखने में जाता है।

अगर आप पहली बार कोर्ट आएंगे तो आपको लगेगा कि जज एक दिन में केवल ५ घंटे काम करते हैं लेकिन जब आप कोर्ट में समय बिताएंगे तब आपको पता चलेगा कि एक जज को एक दिन में औसतन १५० से ज्यादा केस सुनने होते हैं। ऐसे में जज कोर्ट में आने से पहले फाइलों को अपने चैंबर में पढ़ते हैं, जिससे कोर्ट का समय बच सके।

एक जज न्यूनतम १२-१५ घंटे प्रतिदिन काम करते हैं, इसके बावजूद कोर्ट में वर्षों से लंबित मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिसकी एक बड़ी वजह जजों की संख्या में भारी कमी है। भारत में प्रति १० लाख की आबादी पर लगभग १६ न्यायाधीश हैं, जबकि भारत के विधि आयोग ने १९८७ में प्रति १० लाख की आबादी पर ५० न्यायाधीशों की नियुक्ति का सुझाव दिया था।

भारतीय संविधान के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति संसद के पास है, जबकि उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने की शक्ति राष्ट्रपति के पास है। संसद ने सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, २०२६ पारित करके सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या ३४ से बढ़ाकर ३८ कर दी है।

विधायिका (संसद) ने अपने दायित्व का निर्वहन करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या को बढ़ाया है। अब कार्यपालिका (राष्ट्रपति) को चाहिए कि वह विधायिका (संसद) का अनुसरण करते हुए सभी उच्च न्यायालयों में भी उसी अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि करे।

कार्यपालिका (राष्ट्रपति) का दूसरा महत्त्वपूर्ण दायित्व उच्च न्यायपालिका में समयबद्ध नियुक्तियां सुनिश्चित करना है। भारत सरकार के न्याय विभाग द्वारा ०१ मई २०२६ को जारी आंकड़ों के अनुसार, सभी उच्च न्यायालयों की स्वीकृत पद संख्या ११२२ के सापेक्ष केवल ७९७ न्यायाधीश कार्यरत हैं और ३२५ (लगभग ३०%) रिक्तियां हैं। इसका तात्पर्य यह है कि वर्तमान में सभी उच्च न्यायालय अपनी केवल ७०% क्षमता के साथ कार्य कर रहे हैं।

विकसित भारत के लिए एक ऐसी न्यायपालिका की जरूरत है जो अपनी पूरी १००% क्षमता से कार्य करे और रिक्तियां इसकी कार्यक्षमता को प्रभावित न कर सकें। विकसित भारत के लिए संवैधानिक संस्थाओं की नींव का मजबूत होना आवश्यक है।

यदि भारत के विधि आयोग के सुझावों को लागू करके न्यायाधीशों की संख्या में तीन गुना से ज्यादा इजाफा किया जाता है और किसी न्यायाधीश का पद रिक्त होने से ६ माह पूर्व उस पद के लिए चयन प्रक्रिया शुरू हो जाती है तो भारत में जज और जनसंख्या के मध्य अनुपात में सुधार होगा, जिससे न्यायिक प्रक्रिया सुगम और अधिक प्रभावशाली होगी।

संक्षेप में कहा जाए तो, भारतीय न्यायपालिका पर मुकदमों का भारी बोझ केवल जजों के व्यक्तिगत और अथक परिश्रम से कम नहीं किया जा सकता। इसके लिए ठोस व्यवस्थागत सुधारों की तत्काल आवश्यकता है। जब तक कार्यपालिका और विधायिका मिलकर जजों के रिक्त पदों को समय पर भरने और उनकी स्वीकृत संख्या को विधि आयोग के सुझावों के अनुरूप बढ़ाने के प्रति गंभीर नहीं होंगी, तब तक त्वरित और सुलभ न्याय की परिकल्पना अधूरी रहेगी।

(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अधिवक्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश