आईआईटी की दहलीज पर बेटियों की रिकॉर्ड दस्तक
-प्रतिभा कुशवाहा
हाल ही में जेईई एडवांस्ड-2026 परीक्षा में लड़कियों की शानदार सफलता की जो खबरें आईं हैं, उसने एसटीईएम (स्टेम) यानी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में महिलाओं के भविष्य की तस्वीर साफ होने लगी है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित के क्षेत्र में आधी आबादी के लिए यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। देश में इंजीनियरिंग यानी आईआईटी में शिक्षा एक पुरूष प्रधान क्षेत्र बना हुआ है। हमारे घरों में जो बच्चियों की शिक्षा को लेकर मुखर हैं, वे भी अपने बेटों को इंजीनियर और बेटियों को डाक्टर बनाना पहली प्राथमिकता में रखते हैं। फिर भी यह सफलता हमारे घरों की बदलती सोच और आर्थिक व्यवस्था के कुछ सुराग तो दे ही रहा है।
चार जून को प्रकाशित हुए अखबारों में प्रमुख रूप से इस खबर को प्रकाशित किया कि इस बार जेईई एडवांस्ड-2026 परीक्षा में पहली बार लगभग 10,000 लड़कियों ने पास की है। इस परीक्षा में कुल 56,880 अभ्यर्थी सफल हुए जिनमें से 10,107 सफल लड़कियां शामिल हैं। इन आकड़ों में लगभग चार अभ्यर्थियों में से एक अभ्यर्थी लड़की है। यह ऐतिहासिक सफलता केवल परीक्षा परिणामों का आंकड़ा मात्र नहीं है, वरन हमारे समाज में शिक्षा, अवसर और लैंगिक समानता के क्षेत्र में हो रहे सकारात्मक परिवर्तन का संकेत भी है। यह सफलता महिलाओं को विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्रों में एक ‘पुश’ के तौर पर देखा जा रहा है।
आज एआई, डेटा साइंस, रोबोटिक्स और नई तकनीकों ने पूरे समाज, संस्कृति और अर्थिकीय को अपने आगोश में ले रखा है, इससे आधी आबादी का दूर रहना एक बहुत बड़े सामाजिक असंतुलन के रूप में सामने आ सकता है। ऐसे में जेईई एडवांस्ड-2026 के परिणाम भविष्य में देश की नई तस्वीर का निर्माण कर सकते हैं। हालांकि अभी भी शीर्ष रैंकों और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाने की आवश्यकता है। मात्र इस तरह की और भी सफलताओं से विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित नहीं की जा सकती है। महिलाओं के जीवन में इतने पड़ाव आते हैं कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्रों में पढ़ने-लिखने के बाद भी अपना योगदान देने से वे वंचित रह जाती हैं। आर्थिक तौर पर यह पढ़ाई महंगी होती है, देश इन क्षेत्रों में महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कई तरह की आर्थिक सहायता भी देता है। अगर कार्यक्षेत्र तक महिलाएं आगे नहीं आ सकेगी, तो नुकसान हमारे समाज और देश का ही ज्यादा होगा।
जनवरी, 2026 को राज्यसभा में केंद्रीय मंत्री डाॅ. जितेंद्र सिंह ने एक प्रश्न के उत्तर में बताया था कि अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण 2021-22 के अनुसार देश में उच्च शिक्षा स्तर स्टेम विषयों में महिलाओं की कुल हिस्सेदारी 43 फीसदी है। इसी तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की अनुसंधान और विकास सांख्यिकी रिपोर्ट-2023 के अनुसार देश में अनुसंधान और विकास गतिविधियों में स्टेम पेशेवरों के रूप में कुल महिला कार्यबल की हिस्सेदारी 18.6 फीसदी है। इनमें से 45.8 फीसदी सरकारी संस्थानों में, 27.6 फीसदी उच्च शिक्षा क्षेत्र में और 26.5 फीसदी औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत हैं। इन आंकड़ों से भी पता चल रहा है कि जितनी महिलाएं स्टेम विषयों को लेकर अपना करियर बनाने का पथ चुन रही हैं, उतनी महिलाओं कार्यक्षेत्र तक नहीं पहुंच पा रही हैं।
यूनेस्को का अपनी रिपोर्ट में मानना है कि भारत में एसटीईएम ग्रेजुएट में महिलाओं की भागीदारी 43 फीसदी है, जबकि इन क्षेत्रों में उनकी नौकरियों में भागीदारी मात्र 14 फीसदी है। तो प्रश्न उठता है कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित पढ़ी हुई महिलाएं गुम कहां हो जाती हैं? क्या समाज और संस्कृति की गहरी जड़ें जमा चुकी परंपराएं और मान्यतागत भेदभाव कहीं न कहीं इन क्षेत्रों में महिलाओं के रोजगार में बाधा बन जाते हैं। पारंपरिक जेंडर भूमिकाएं इस क्षेत्र में करियर बना रही महिलाओं को बहुत हद तक हतोत्साहित करते हैं, क्योंकि यह क्षेत्र महिलाओं से अधिक समय और प्रतिबद्धता की मांग करता है। कई परिवार चाहते हैं कि उनकी बहु और बेटी इस क्षेत्र में पढ़े तो, पर रिसर्च की जगह वह टीचिंग जैसा स्थिर और स्मूथ करियर ऑप्शन चुनें। जेंडर सेंसटिविटी इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी कार्यस्थल पर महिलाओं को यह क्षेत्र छोड़ने पर मजबूर कर देती हैं। यही स्टीरियोटाइप सोच इंजीनियरिंग और फिजिक्स को पुरुष प्रधान क्षेत्र बना देती है।
सिस्टम में इतने लूपहोल होने के बावजूद यदि इन क्षेत्रों में महिलाओं की सफलता की बात की जाए, तो 2013 का मंगल मिशन और 2019 का चंद्रयान-2 मिशन अपनी एक अलग ही ऐतिहासिक उपलब्धि से हमें गौरवान्वित करता है। चंद्रयान-2 मिशन की कमान संभालने वाली दो महिला वैज्ञानिक ऋतु करीधल और एम. वनिता को कौन भूल सकता है। इसरो की वैज्ञानिक ऋतु करीधल चंद्रयान-2 मिशन की डायरेक्टर थीं और एम. वनीता इस मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर। इनकी अथक मेहनत का फल है कि आज देश अंतरिक्ष क्षेत्र में इतनी बड़ी उपलब्धि को सेलिब्रेट कर सका। इससे पहले 2013 में मंगल मिशन की सफलता का जश्न देश मना चुका है। इस मिशन में आठ महिला वैज्ञानिकों ने अपनी खास भूमिका निभाई थी। इस विषय को आधार बनाकर एक फिल्म ‘मिशन मंगल’ भी बन चुकी है।
चंद्रयान-2 मिशन में इन दो महिला वैज्ञानिक के अलावा और भी महिला वैज्ञानिकों का साथ मिला। इस प्रोजेक्ट में 30 फीसदी महिला वैज्ञानिकों की अथक परिश्रम शामिल है। चंद्रयान-2 मिशन में मौमिता दत्ता, नंदिनी हरिनाथ, एन. वलारमथी, मीनल संपथ, कीर्ति फौजदार और टेसी थॉमस जैसी दूसरी महिला वैज्ञानिक शामिल हैं। इस उपलब्धि को बांटते हुए इसरो के चेयरमैन के. सिवन ने उस समय मीडिया से कहा था कि हम पुरुष और महिला वैज्ञानिकों में अंतर नहीं समझते हैं। जो भी सक्षम होता है, उसे बेहतरीन काम सौंपा जाता है। यहीं सवाल उठता है तो फिर महिलाओं की इस सक्षमता को ‘ब्रेक’ कौन लगा जाता है?
(लेखिका, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

