क्या कागजों पर सिमट रही हैं ग्राम सभाएं?
-ओ.पी. पाल
भारतीय लोकतंत्र का जमीनी आधार और भारत की आत्मा गांवों में बसती है, उन गांवों की लोकतांत्रिक आत्मा 'ग्राम सभा' में निहित है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा देकर सत्ता के विकेंद्रीकरण की जो नींव रखी थी, उसकी सबसे महत्वपूर्ण और प्रत्यक्ष इकाई ग्राम सभा ही है। ग्राम सभा केवल स्थानीय शासन की एक संस्था नहीं है बल्कि यह देश के हर ग्रामीण नागरिक को सीधे नीति-निर्माण, बजट निर्धारण और विकास कार्यों की निगरानी का अधिकार देने वाला सशक्त मंच है। परंतु समय के साथ इस बुनियादी लोकतांत्रिक संस्था की कार्यप्रणाली में कई विसंगतियां और चुनौतियां सामने आई हैं। इनमें सबसे बड़ी और चिंताजनक चुनौती यही है कि आज के इस तकनीकी युग के बावजूद ग्राम सभा की बैठकों में आम नागरिकों की भागीदारी घट रही है। मसलन, केंद्र सरकार और नीति आयोग की जारी ताजा रिपोर्ट ने जमीनी लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत करने की चुनौती खड़ी कर दी है। हालांकि यह अध्ययन भारत की ग्रामीण विकास नीतियों को 'संख्या-केंद्रित' से 'परिणाम-केंद्रित' बनाने का सटीक मार्गदर्शक दस्तावेज साबित हो सकता है।
दरअसल, देश में जमीनी लोकतंत्र की इसी गंभीर समस्या का बारीकी से अध्ययन करने और इसका समाधान खोजने के लिए केंद्रीय पंचायती राज मंत्रालय के तत्वावधान में व्यापक राष्ट्रीय अध्ययन कराया गया। राष्ट्रीय ग्रामीण विकास और पंचायती राज संस्थान, हैदराबाद द्वारा तैयार की गई यह द्वि-खंडीय रिपोर्ट देश में नागरिक-केंद्रित शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में ऐतिहासिक और साक्ष्य आधारित दस्तावेज़ है। खास बात है कि इस अध्ययन का दायरा और सांख्यिकी के हिसाब से भारत के ग्रामीण नीति-निर्माण के इतिहास में सबसे व्यापक और विशाल क्षेत्र आधारित आकलनों में से एक है। देश की ग्राम सभाओं को लेकर यह राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट भारत के ग्रामीण स्वशासन के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। जैसा कि रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि नागरिक-केंद्रित शासन देने के लिए जीवंत ग्राम सभाएँ अनिवार्य हैं। जब तक देश के गांवों का अंतिम व्यक्ति ग्राम सभा की बैठक में शामिल होकर अपने गांव के भविष्य का फैसला करने में सक्षम और उत्सुक नहीं होगा, तब तक लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का सपना अधूरा रहेगा।
पंचायती राज मंत्रालय और नीति आयोग का यह संयुक्त प्रयास साक्ष्य-आधारित नीतियों के माध्यम से देश की जमीनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को एक नई ऊर्जा, समावेशन और शक्ति प्रदान करने का मार्ग प्रशस्त करता है। इस दिशा में मोदी सरकार देश के हर नागरिक को सशक्त बनाने और नीतियों के केंद्र में 'नागरिक' को रखने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने ग्राम सभा को जमीनी लोकतंत्र की सबसे सच्ची अभिव्यक्ति करार देकर ग्रामीण ढांचागत और संस्थागत व्यवस्था की नींव को मजबूती देने की पहल की है।
देश का सबसे बड़ा सर्वे: 26 राज्यों और 7,800 लोगों से संवाद
इस रिपोर्ट की विश्वसनीयता और इसकी साक्ष्य आधारित प्रकृति को समझने के लिए इसके सांख्यिकीय दायरे को समझना आवश्यक है। इस रिपोर्ट में संस्थान के सह-अध्यापक डॉ. अंजन कुमार भांजा द्वारा प्रस्तुत किए गए निष्कर्षों पर गौर किया जाए तो यह देश के सबसे बड़े क्षेत्र-आधारित अध्ययनों में से एक है। इस शोध के दायरे में देश के 26 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 213 जिलों को शामिल किया गया। टीम ने लगभग 400 ग्राम पंचायतों (जिनमें पेसा 'PESA' क्षेत्र और महिला-हितैषी पंचायतें भी शामिल हैं) का दौरा कर 7,800 उत्तरदाताओं से सीधा संवाद किया, जिसके बाद यह साक्ष्य आधारित द्वि-खंडीय रिपोर्ट तैयार की गई। इसमें 10 राज्यों की उन 'बेस्ट प्रैक्टिसेज' (सर्वोत्तम प्रयोगों) को भी शामिल किया गया है, जिन्होंने अपने यहाँ भागीदारी बढ़ाने में सफलता पाई है। है। इस अध्ययन रिपोर्ट को 30 जून 2026 को नई दिल्ली में नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम और पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज द्वारा जारी किया, जिसमें जमीनी लोकतंत्र की कमजोर होती नींव और उसकी चुनौतियों को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।
आंकड़ों की नजर में अध्ययन रिपोर्ट
अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार भागीदारी में सबसे बड़ी बाधाएं ग्राम सभाओं में लोगों का न आना केवल उदासीनता नहीं बल्कि इसके पीछे गहरे सामाजिक-आर्थिक और व्यावहारिक कारण हैं। इसमें आजीविका और समय के संकट के कारण 55.5 प्रतिशत भागीदारी न होने का सबसे बड़ा कारण है, इसमें ग्रामीण आबादी का बड़ा हिस्सा दैनिक मजदूरी या कृषि पर निर्भर है। जबकि व्यस्त कार्य दिनचर्या (41.74 प्रतिशत) और कृषि कार्यों की व्यस्तता (30.26 प्रतिशत) के कारण लोग अपनी दिहाड़ी छोड़कर बैठकों में नहीं आ पाते। इसके अलावा कम प्रतिनिधित्व वाले समूह को लेकर खुलासा हुआ है कि प्रवासी परिवार (17.61 प्रतिशत), युवा (16.73 प्रतिशत), बुजुर्ग (15.80 प्रतिशत) और महिलाएं (13.40 प्रतिशत) ग्राम सभा की प्रक्रियाओं में सबसे कम शामिल हो पाते हैं। यही नहीं इसके अलावा 45.46 प्रतिशत चर्चा के विषयों का प्रासंगिक न होना और 42.0 प्रतिशत हर बार एक जैसी उबाऊ और दोहराव वाली चर्चाएं भी इस व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। जबकि 33.4 प्रतिशत प्रशासन और व्यवस्था के प्रति अविश्वास, 32.7 प्रतिशत राजनीतिक हस्तक्षेप और 27.9 प्रतिशत स्थानीय गुटबाजी के साथ 16.2 प्रतिशत शिकायतों के निवारण की कमजोर व्यवस्था भी बड़ा कारण माना गया है।
हाशिए पर मौजूद समुदाय
पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज ने ग्रामीण भारत में आए बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि पिछले एक दशक में गांवों तक बुनियादी सुविधाओं की सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित हुई है। अब बारी जमीनी लोकतंत्र को और गहरा करने की है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि यह अध्ययन महिलाओं, युवाओं और हाशिए पर रहने वाले समुदायों की भागीदारी बढ़ाने के लिए रणनीतिक कदम उठाने में मील का पत्थर साबित होगा। मंत्रालय जल्द ही राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ मिलकर इस रिपोर्ट की सिफारिशों को जमीन पर लागू करेगा, ताकि देश की ग्राम सभाएं अधिक समावेशी और परिणामोन्मुख बन सकें। इस अध्ययन रिपोर्ट से एक बड़ा संदेश यह भी मिलता है कि ग्राम सभाओं को सफल बनाने का पैमाना केवल 'बैठक में जुटी भीड़' या 'हाजिरी रजिस्टर' नहीं होना चाहिए। वास्तविक सफलता इस बात में है कि चर्चाएं कितनी प्रासंगिक हैं, निर्णय कितने पारदर्शी हैं और शिकायतों का निवारण कितनी तेजी से होता है। जब तक ग्रामीण नागरिकों को ग्राम सभा के निर्णयों का जमीन पर वास्तविक असर नहीं दिखेगा, तब तक उनका भरोसा जीतना नामुमकिन है।
विशेष और विषय-आधारित ग्राम सभाएं
अध्ययन में सुझाव दिए गये हैं कि महिलाओं के मुद्दों के लिए 'महिला ग्राम सभा' और बच्चों व युवाओं के लिए 'बाल सभा' जैसे मंचों का नियमित आयोजन होना चाहिए, जिनकी सिफारिशों को मुख्य ग्राम सभा के एजेंडे में अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। ग्राम सभा को विकास कार्यों के सोशल ऑडिट का वास्तविक अधिकार मिलना चाहिए। जब लोगों को दिखेगा कि उनके द्वारा किए गए ऑडिट से भ्रष्टाचार पर रोक लग रही है और काम की गुणवत्ता सुधर रही है तो उनकी भागीदारी स्वतः बढ़ेगी। पंचायत प्रतिनिधियों (विशेषकर महिला सरपंचों और वार्ड सदस्यों) के साथ-साथ आम नागरिकों के लिए भी क्षमता निर्माण और प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए ताकि वे ग्राम सभा की प्रक्रियाओं को बेहतर समझ सकें।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

