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विकसित भारत का सपना कितना खरा, रोडमैप की कसौटी पर परखना चाहता है मजदूर संघ

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विकसित भारत का सपना कितना खरा, रोडमैप की कसौटी पर परखना चाहता है मजदूर संघ


-राजेश शांडिल्य

हाल ही में देश के सबसे बड़े श्रमिक संगठन भारतीय मजदूर संघ (बीएमएस) का ओडिशा में राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। परंपरागत रुप से इस अधिवेशन में कई महत्वपूर्ण फैसले लिये गये। इसी के साथ बीएमएस की तैयारी है कि अगले राष्ट्रीय अधिवेशन में केवल मजदूरों के पारंपरिक मुद्दों को हल करने में संगठन कितना आगे बढ़ा, सफलता और भविष्य की तैयारी तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि साल 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य में श्रमिकों की भागीदारी, गिग इकोनॉमी, ठेका रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और संसाधनों के असमान वितरण जैसे सवाल भी केंद्र में रहने वाला है। इस अधिवेशन से पहले मजदूरों की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर संगठन व्यापक रणनीति तैयार कर रहा है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का जो लक्ष्य निर्धारित किया है, उसमें श्रमिक वर्ग की निर्णायक भूमिका कैसे हो, इसके लिए भारतीय मजदूर संघ ने कमर कस ली है। भारतीय मजदूर संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष पवन कुमार के अनुसार बीएमएस का मानना है कि केंद्र और राज्य सरकारों के पास मजदूरों की सुरक्षा, रोजगार की स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा को लेकर क्या ठोस रोडमैप है, इसको समय रहते स्पष्ट करना चाहिये।

संगठन का यह भी मानना है कि देश में तेजी से बढ़ रही गिग इकोनॉमी सबसे बड़ा और उभरता हुआ श्रम मुद्दा बन चुकी है। ऑनलाइन डिलीवरी, कैब सेवा और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े लाखों श्रमिक आज भी औपचारिक श्रम ढांचे से बाहर हैं। सबसे पहले सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इन श्रमिकों का वास्तविक एग्रीगेटर या नियोक्ता कौन है। इसके अलावा सभी गिग वर्करों का अनिवार्य पंजीकरण हो, ताकि उनका रिकॉर्ड उपलब्ध रहे और उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके। सबसे महत्वपूर्ण मांग इनके लिए व्यापक सोशल सिक्योरिटी सिस्टम लागू करने की है। हालांकि नए श्रम कानूनों में गिग और प्लेटफॉर्म वर्करों के लिए कुछ प्रावधानों पर सरकार द्वारा विचार किया गया है लेकिन बीएमएस का मानना है कि जब तक ये व्यवस्थाएं जमीन पर प्रभावी रूप से लागू नहीं होतीं, तब तक श्रमिकों को वास्तविक लाभ नहीं मिलेगा।

गिग इकोनॉमी से जुड़े जोखिमों को लेकर भी संगठन चिंतित है। हाल के वर्षों में 10 से 15 मिनट में डिलीवरी की प्रतिस्पर्धा ने डिलीवरी कर्मियों पर अत्यधिक दबाव बढ़ाया। इसके चलते सड़क हादसों से जान के जोखिम की घटनाएं भी सामने आईं। बीएमएस ने सबसे पहले इस पर संज्ञान लिया और मामला श्रम मंत्रालय तक पहुंचने के बाद कई कंपनियों ने अपनी आक्रामक 15 मिनट डिलीवरी की ब्रांडिंग करने से कदम पीछे खींचे। बीएमएस का मानना है कि कारोबार की गति और श्रमिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

दूसरा बड़ा मुद्दा अनुबंध या ठेका कर्मचारियों का है। संगठन का कहना है कि देश में बड़े पैमाने पर स्थायी नौकरियों की जगह अनुबंध आधारित रोजगार ने ले ली है। यह प्रवृत्ति केवल उद्योगों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकार और स्वास्थ्य सेवाओं और सार्वजनिक उपक्रमों तक फैल चुकी है। बीएमएस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के अनुसार कई बड़े प्रतिष्ठानों में तो स्थायी कर्मचारियों की तुलना में ठेका कर्मचारियों की संख्या कई गुना अधिक हो चुकी है। बीएमएस इसे सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से चिंताजनक मानता है तथा सरकारों से ठेका कर्मियों के नियमितीकरण और बेहतर सेवा शर्तों पर गंभीर विचार की मांग कर रहा है।

संगठन का कहना है कि किसी भी श्रमिक को जॉब सिक्योरिटी, वेज सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी, ये तीनों अधिकार मिलने चाहिए। इससे न केवल श्रमिक का जीवन सुरक्षित होगा बल्कि उत्पादकता बढ़ेगी और राष्ट्र की आर्थिक शक्ति भी मजबूत होगी। बीएमएस आर्थिक असमानता के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाने की तैयारी में है। संगठन का दावा है कि देश के एक प्रतिशत लोगों के पास लगभग 40 प्रतिशत संसाधनों का नियंत्रण है, जबकि बड़ी आबादी सीमित संसाधनों में जीवन यापन कर रही है। ऐसे में विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा, जब आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और श्रमिक वर्ग को विकास प्रक्रिया का समान भागीदार बनाया जाए। आगामी अधिवेशन में बीएमएस इन सभी मुद्दों को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में लाने की रणनीति के साथ सरकार से ठोस जवाब और समयबद्ध कार्रवाई की उम्मीद कर रहा।

(लेखक, विश्व संवाद केंद्र के संपादक हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश