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पश्चिम एशिया में समकालीन भू-राजनीतिक बदलाव

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पश्चिम एशिया में समकालीन भू-राजनीतिक बदलाव


- डॉ. सत्यवान सौरभ

पश्चिम एशिया आज विश्व राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में से एक है। यह क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा संसाधनों का केंद्र होने के साथ-साथ एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ने वाला सामरिक भूभाग भी है। पिछले दो दशकों में इस क्षेत्र में हुए युद्धों, शासन परिवर्तनों, सांप्रदायिक संघर्षों, आतंकवाद के उभार तथा बाहरी शक्तियों के हस्तक्षेपों ने इसकी राजनीतिक संरचना को गहराई से प्रभावित किया है। इराक, सीरिया, लीबिया और यमन जैसे देशों के अनुभवों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सैन्य शक्ति के माध्यम से राजनीतिक स्थिरता स्थापित करने के प्रयास अक्सर अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाते। इसी बीच खाड़ी देशों, ईरान तथा वैश्विक शक्तियों के बीच संबंधों में आए बदलाव पश्चिम एशिया में एक नई क्षेत्रीय व्यवस्था के निर्माण की ओर संकेत करते हैं। ऐसे परिवर्तनों के बीच भारत के लिए भी अपनी विदेश नीति को नए सिरे से परिभाषित करना आवश्यक हो गया है क्योंकि इस क्षेत्र से उसके ऊर्जा, व्यापारिक और प्रवासी हित गहराई से जुड़े हुए हैं।

शीतयुद्ध की समाप्ति के बाद पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्रभाव लगभग निर्विवाद था। अमेरिका ने लोकतंत्र, सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी अभियानों के नाम पर इराक तथा अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप किए। किंतु इराक युद्ध के परिणामों ने यह दिखाया कि शासन परिवर्तन के बाद भी स्थायी शांति और संस्थागत स्थिरता सुनिश्चित नहीं की जा सकती। सद्दाम हुसैन के पतन के बाद इराक में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, राजनीतिक अस्थिरता उत्पन्न हुई और अंततः इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) जैसे आतंकी संगठन का उदय हुआ। इसी प्रकार लीबिया में नाटो समर्थित हस्तक्षेप ने तत्कालीन शासन को तो समाप्त कर दिया, किंतु देश वर्षों तक गृहयुद्ध और अराजकता में फँसा रहा। सीरिया में विभिन्न वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियों की सैन्य भागीदारी ने संघर्ष को और जटिल बना दिया। इन घटनाओं ने सिद्ध कर दिया कि सैन्य हस्तक्षेप राजनीतिक समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो सकते।

पश्चिम एशिया में बदलती भू-राजनीति का एक प्रमुख पहलू अमेरिका के प्रभाव में अपेक्षाकृत कमी और नई शक्तियों के उदय के रूप में सामने आया है। अमेरिका अब अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं को हिंद-प्रशांत क्षेत्र और चीन के उदय की ओर स्थानांतरित कर रहा है। परिणामस्वरूप पश्चिम एशिया में एक प्रकार का शक्ति शून्य उत्पन्न हुआ है, जिसे क्षेत्रीय और अन्य वैश्विक शक्तियाँ भरने का प्रयास कर रही हैं। चीन ने आर्थिक निवेश, व्यापारिक संबंधों और बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से अपनी उपस्थिति मजबूत की है। विशेष रूप से सऊदी अरब और ईरान के बीच संबंधों की बहाली में चीन की मध्यस्थता ने यह संकेत दिया कि कूटनीतिक और आर्थिक साधन अब क्षेत्रीय स्थिरता के लिए सैन्य शक्ति से अधिक प्रभावी हो सकते हैं। रूस ने भी सीरिया में हस्तक्षेप के माध्यम से अपनी रणनीतिक वापसी दर्ज कराई और यह प्रदर्शित किया कि सीमित सैन्य उपस्थिति तथा सक्रिय कूटनीति के संयोजन से क्षेत्रीय प्रभाव स्थापित किया जा सकता है।

इसी दौरान खाड़ी देशों की विदेश नीति में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले हैं। सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देशों ने आर्थिक विकास, निवेश और तकनीकी आधुनिकीकरण को प्राथमिकता देना शुरू किया है। सऊदी अरब का ‘विजन 2030’ कार्यक्रम इस परिवर्तन का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य तेल पर निर्भरता कम कर अर्थव्यवस्था का विविधीकरण करना है। इसके लिए क्षेत्रीय स्थिरता आवश्यक है। यही कारण है कि खाड़ी देशों ने ईरान के साथ तनाव कम करने तथा संवाद बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। दूसरी ओर ईरान, जो लंबे समय तक अमेरिकी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय अलगाव का सामना करता रहा, अब क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का एक अनिवार्य घटक बनकर उभरा है। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में उसका प्रभाव इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पश्चिम एशिया की किसी भी सुरक्षा व्यवस्था को ईरान को शामिल किए बिना सफल नहीं बनाया जा सकता।

वर्तमान परिस्थितियाँ इस बात को रेखांकित करती हैं कि पश्चिम एशिया को एक समावेशी क्षेत्रीय सुरक्षा ढाँचे की आवश्यकता है। अब तक क्षेत्रीय सुरक्षा मुख्यतः बाहरी शक्तियों के सैन्य गठबंधनों और शक्ति संतुलन की राजनीति पर आधारित रही है किंतु इससे स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी। इराक, यमन, सीरिया और फिलिस्तीन के उदाहरण बताते हैं कि संघर्षों के मूल कारण राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक हैं, जिनका समाधान केवल सैन्य साधनों से संभव नहीं है। एक समावेशी सुरक्षा ढाँचा ऐसा होना चाहिए जिसमें खाड़ी सहयोग परिषद् (जीसीसी) के देश ईरान, इराक, तुर्किये, मिस्र तथा अन्य प्रमुख क्षेत्रीय ताकत समान रूप से भागीदारी करें। इसका उद्देश्य सामूहिक सुरक्षा, समुद्री मार्गों की रक्षा, आतंकवाद विरोधी सहयोग, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा तथा विश्वास निर्माण होना चाहिए। यूरोप में शीतयुद्ध के बाद विकसित बहुपक्षीय सुरक्षा संस्थाओं की तरह पश्चिम एशिया को भी संवाद और सहयोग आधारित सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है।

पश्चिम एशिया में समुद्री सुरक्षा का महत्व भी निरंतर बढ़ रहा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। हाल के वर्षों में इन क्षेत्रों में बढ़े तनाव ने यह स्पष्ट किया है कि क्षेत्रीय संघर्ष केवल संबंधित देशों तक सीमित नहीं रहते बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। तेल की कीमतों में वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं में बाधा तथा व्यापारिक अनिश्चितता इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इसलिए किसी भी समावेशी सुरक्षा ढाँचे में समुद्री सुरक्षा को केंद्रीय स्थान देना आवश्यक है।

भारत के लिए पश्चिम एशिया का महत्व बहुआयामी है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा भाग इसी क्षेत्र से पूरा होता है। सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देश भारत के प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता हैं। यदि क्षेत्र में किसी प्रकार का सैन्य संघर्ष या समुद्री अवरोध उत्पन्न होता है तो उसका सीधा प्रभाव भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता पर पड़ता है। इसके अतिरिक्त लगभग 90 लाख भारतीय नागरिक विभिन्न खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। ये प्रवासी भारतीय प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं और भारतीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। किसी भी क्षेत्रीय संकट की स्थिति में उनकी सुरक्षा भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता बन जाती है।

इन परिस्थितियों में भारत को अपनी विदेश नीति को अधिक सक्रिय, संतुलित और बहुआयामी बनाना होगा। भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण की नीति है। भारत के इज़राइल, ईरान, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ समान रूप से मजबूत संबंध हैं। भारत को किसी एक पक्ष के साथ पूर्ण रूप से जुड़ने के बजाय संतुलन की नीति जारी रखनी चाहिए। इज़राइल के साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग, ईरान के साथ संपर्क एवं कनेक्टिविटी परियोजनाएँ तथा खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा और निवेश संबंध- इन सभी को समानांतर रूप से आगे बढ़ाना भारत के हित में होगा।

ऊर्जा सुरक्षा के संदर्भ में भारत को आयात स्रोतों का विविधीकरण करना चाहिए। पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने के लिए रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से ऊर्जा आयात के विकल्पों को भी विकसित करना आवश्यक है। साथ ही हरित ऊर्जा, सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडारों में निवेश बढ़ाना चाहिए ताकि किसी भी क्षेत्रीय संकट का प्रभाव कम किया जा सके।

प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के लिए भी भारत को एक मजबूत संस्थागत ढाँचा विकसित करना होगा। संकट की स्थिति में त्वरित निकासी, डिजिटल पंजीकरण, आपातकालीन सहायता केंद्र तथा श्रमिक अधिकार संरक्षण जैसी व्यवस्थाओं को और सुदृढ़ किया जाना चाहिए। हाल के वर्षों में विभिन्न संघर्ष क्षेत्रों से भारतीय नागरिकों की सफल निकासी ने भारत की क्षमता को प्रदर्शित किया है, किंतु भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए इन व्यवस्थाओं का और विस्तार आवश्यक है।

समुद्री सुरक्षा के क्षेत्र में भारत को अपनी भूमिका और अधिक सक्रिय करनी चाहिए। भारतीय नौसेना को अरब सागर, अदन की खाड़ी तथा लाल सागर में अपनी उपस्थिति बनाए रखनी चाहिए ताकि व्यापारिक जहाजों और ऊर्जा आपूर्ति मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। साथ ही क्षेत्रीय देशों के साथ संयुक्त समुद्री अभ्यास, सूचना साझाकरण और आतंकवाद विरोधी सहयोग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

भारत को पश्चिम एशिया में केवल ऊर्जा उपभोक्ता या प्रवासी हितों के रक्षक के रूप में नहीं बल्कि एक रचनात्मक और विश्वसनीय साझेदार के रूप में भी उभरना चाहिए। भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी), I2U2 जैसे बहुपक्षीय मंचों तथा खाड़ी देशों के साथ बढ़ते आर्थिक संबंधों का उपयोग क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक सहयोग को प्रोत्साहित करने के लिए किया जा सकता है। डिजिटल अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित ऊर्जा और अवसंरचना विकास जैसे क्षेत्रों में सहयोग भारत और पश्चिम एशिया के संबंधों को नई दिशा दे सकता है।

अंततः पश्चिम एशिया में हो रहे समकालीन भू-राजनीतिक परिवर्तन यह स्पष्ट करते हैं कि सैन्य हस्तक्षेपों पर आधारित सुरक्षा व्यवस्था अपनी सीमाओं तक पहुँच चुकी है। इराक, लीबिया, सीरिया और यमन के अनुभवों ने यह सिद्ध किया है कि स्थायी शांति केवल संवाद, समावेशन और क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से ही संभव है। खाड़ी देशों, ईरान और वैश्विक शक्तियों के बीच बदलते संबंध एक नई बहुध्रुवीय क्षेत्रीय व्यवस्था के निर्माण की ओर संकेत करते हैं।

भारत के लिए यह अवसर और चुनौती दोनों है। यदि भारत अपनी विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता, ऊर्जा विविधीकरण, प्रवासी संरक्षण, समुद्री सुरक्षा और बहुपक्षीय सहयोग को प्राथमिकता देता है तो वह न केवल अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकेगा बल्कि पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता का एक महत्वपूर्ण भागीदार भी बन सकेगा।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश