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लोककला से लोकसमृद्धि तक: बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई कहानी

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लोककला से लोकसमृद्धि तक: बिहार के सांस्कृतिक पुनर्जागरण की नई कहानी


-डॉ. मीना कुमारी

बिहार की पहचान केवल नालंदा, वैशाली और बोधगया तक सीमित नहीं है। यह राज्य अपनी जीवंत लोक कलाओं, लोकगीतों और पारंपरिक शिल्प के कारण भी विश्व पटल पर विशिष्ट स्थान रखता है। मधुबनी चित्रकला, मंजूषा कला, सिक्की शिल्प, सुजनी कढ़ाई, बिदेसिया और जट-जटिन जैसी विधाएं बिहार की सांस्कृतिक आत्मा हैं। किंतु लंबे समय तक इन कलाओं के सृजक कलाकार सम्मान से अधिक संघर्ष का जीवन जीते रहे। उनके सामने बाजार का अभाव, पूंजी की कमी, तकनीकी पिछड़ापन और संस्थागत समर्थन का संकट था।

पिछले कुछ वर्षों में यह परिदृश्य बदलने लगा है। केंद्र की “विरासत से विकास” की नीति और बिहार सरकार के सांस्कृतिक संरक्षण एवं कौशल संवर्धन के प्रयासों ने लोक कलाकारों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में उल्लेखनीय आधार तैयार किया है। आज पहली बार लोककला को केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं बल्कि क्रिएटिव इकोनॉमी यानी रचनात्मक अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है। इसी सोच के अनुरूप भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने “क्रिएटिव इकोनॉमी” के लिए अलग नीति आधारित पहल शुरू की है, जिसका उद्देश्य सांस्कृतिक उद्योगों को रोजगार, नवाचार और वैश्विक बाजार से जोड़ना है।

इस परिवर्तन की सबसे बड़ी पहचान प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना है। परंपरागत कारीगरों और शिल्पकारों को पहचान, कौशल उन्नयन, आधुनिक औजार, आसान ऋण, डिजिटल भुगतान और विपणन सहायता देने वाली यह योजना पहली बार शिल्पकार को केवल लाभार्थी नहीं बल्कि उद्यमी के रूप में स्थापित करती है। बिहार में इसके परिणाम उल्लेखनीय रहे हैं। सरकारी आँकड़ों के अनुसार राज्य में 1.62 लाख से अधिक पारंपरिक कारीगर पंजीकृत हुए, 1.05 लाख से अधिक को प्रशिक्षण मिला, लगभग 19 हजार लाभार्थियों को 160 करोड़ रुपये से अधिक का रियायती ऋण मिला तथा हजारों आधुनिक टूल किट वितरित किए गए। लाभार्थियों में बड़ी संख्या अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़े वर्ग और महिलाओं की है।

यह परिवर्तन केवल एक योजना का परिणाम नहीं है। वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) जैसी पहल ने जिलों की विशिष्ट कला और उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान देने का नया अवसर दिया है। बिहार के हस्तशिल्प और पारंपरिक उत्पाद अब स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रह गए हैं बल्कि उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार से जोड़ने की रणनीति विकसित की जा रही है।

बिहार सरकार ने भी इस दिशा में समानांतर प्रयास किए हैं। कला, संस्कृति एवं युवा विभाग द्वारा आयोजित बिहार दिवस, राज्य स्तरीय लोक महोत्सव, जिला स्तरीय सांस्कृतिक आयोजन, कलाकार सम्मान और प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने लोक कलाकारों को मंच उपलब्ध कराया है। पटना का बिहार संग्रहालय तथा विभिन्न सांस्कृतिक संस्थान राज्य की लोक परंपराओं को नई पीढ़ी और पर्यटकों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि सरकार संरक्षण की पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर संस्कृति को विकास के संसाधन के रूप में देख रही है।

मधुबनी चित्रकला इसका सबसे प्रेरक उदाहरण है। जीआई (ज्योग्राफिकल इंडिकेशन) टैग मिलने के बाद इस कला की वैश्विक पहचान और मजबूत हुई है। मिथिलांचल की हजारों महिला कलाकार आज स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से देश-विदेश के बाजारों तक पहुंच रही हैं। यह केवल कला का विस्तार नहीं बल्कि महिला उद्यमिता और ग्रामीण आत्मनिर्भरता का भी सशक्त मॉडल है।

आज विश्व स्तर पर भी यही दृष्टिकोण विकसित हो रहा है। रचनात्मक उद्योगों को रोजगार, समावेशी विकास और स्थानीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार माना जा रहा है। भारत ने भी जी-20 के बाद संस्कृति को विकास की केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित करने की दिशा में ठोस पहल की है।

निःस्संदेह, चुनौतियाँ अभी भी हैं। सभी कलाकारों का डिजिटल डेटाबेस तैयार होना बाकी है। विपणन क्षमता को और मजबूत करना होगा। डिज़ाइन नवाचार, निर्यात, ई-कॉमर्स, पर्यटन और बौद्धिक संपदा संरक्षण के क्षेत्र में अभी व्यापक संभावनाएँ हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि आज नीति की दिशा पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट और दूरदर्शी दिखाई देती है।

आगे की रणनीति भी स्पष्ट होनी चाहिए- लोक कलाकारों का राज्यव्यापी डिजिटल रजिस्टर, सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट, विश्वविद्यालयों में लोककला अध्ययन, ई-कॉमर्स आधारित विपणन, निर्यात प्रोत्साहन और युवाओं के लिए कौशल कार्यक्रम। यदि इन पहलों को वर्तमान योजनाओं के साथ जोड़ा जाए तो बिहार की लोक कलाएं लाखों परिवारों की आय का स्थायी आधार बन सकती हैं।

बिहार के विकास की कहानी केवल आर्थिक सूचकांकों से नहीं लिखी जाएगी। वह उस दिन पूर्ण होगी, जब मधुबनी की चित्ररेखाएँ, मंजूषा की कथाएँ, सिक्की की बुनावट और लोक गायकों की स्वर परंपरा राज्य के ग्रामीण परिवारों की समृद्धि का माध्यम बनेंगी। केंद्र और राज्य सरकार ने इस दिशा में मजबूत नींव रखी है। अब आवश्यकता है कि नीति, समाज और बाजार मिलकर इस सांस्कृतिक पूंजी को आर्थिक शक्ति में बदले। बिहार की लोक कलाओं का भविष्य आज पहले से कहीं अधिक आश्वस्त दिखाई देता है। यदि यही गति और यही प्रतिबद्धता बनी रही तो आने वाले वर्षों में बिहार केवल अपनी विरासत को संरक्षित करने वाला राज्य नहीं रहेगा बल्कि लोककला आधारित समावेशी विकास का राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरेगा।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश