अग्नि-जाल में बदलते शहरी भवन
- डॉ. सत्यवान सौरभ
भारत आज विश्व के सबसे तेज़ी से शहरीकरण करने वाले देशों में शामिल है। आर्थिक विकास, औद्योगीकरण, सेवा क्षेत्र के विस्तार और ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर निरंतर हो रहे पलायन ने भारतीय शहरों का स्वरूप तेजी से बदला है। महानगरों से लेकर छोटे शहरों तक बहुमंजिला इमारतें, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, कोचिंग संस्थान, होटल, अस्पताल और मिश्रित-उपयोग वाले भवन विकास के नए प्रतीक बनकर उभरे हैं। किंतु इस विकास के पीछे एक गंभीर सच्चाई भी छिपी है—शहरी नियोजन की अनदेखी, सुरक्षा मानकों की उपेक्षा और प्रशासनिक शिथिलता। परिणामस्वरूप, आज अनेक शहरी भवन आर्थिक प्रगति के केंद्र होने के साथ-साथ संभावित अग्नि-जाल भी बनते जा रहे हैं।
हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुई अग्नि-दुर्घटनाओं ने इस संकट की भयावहता को उजागर किया है। दिल्ली, लखनऊ, सूरत, कोलकाता, हैदराबाद की व्यावसायिक इमारतों, होटलों, कोचिंग संस्थानोंं और मुंबई के अस्पतालों में लगी आग ने सैकड़ों परिवारों को असमय शोक में डुबो दिया। अधिकांश घटनाओं में एक जैसी कमियाँ सामने आईं- भवनों का अनधिकृत उपयोग, अग्नि-सुरक्षा उपकरणों का अभाव, बंद या अवरुद्ध आपातकालीन निकास, संकरी सड़कें, अवैध पार्किंग और नियमों के पालन में गंभीर लापरवाही। यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या किसी एक भवन, किसी एक शहर या किसी एक विभाग की नहीं, बल्कि हमारे पूरे शहरी विकास मॉडल की है।
भारत में मिश्रित-उपयोग वाले भवनों की संख्या लगातार बढ़ रही है। एक ही भवन में नीचे दुकानें, ऊपर कार्यालय, उसके ऊपर कोचिंग संस्थान और सबसे ऊपर आवास होना अब सामान्य बात है। यह व्यवस्था आर्थिक दृष्टि से लाभकारी अवश्य प्रतीत होती है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत जोखिमपूर्ण है। ऐसे भवनों में ज्वलनशील सामग्री, विद्युत उपकरण, गैस सिलेंडर, बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति और सीमित निकास मार्ग आग लगने की स्थिति में उसे विनाशकारी बना देते हैं। यदि भवन मूल रूप से आवासीय उद्देश्य के लिए निर्मित हो और बाद में बिना संरचनात्मक परिवर्तन के व्यावसायिक गतिविधियों के लिए उपयोग में लाया जाए, तो खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
अनियोजित शहरीकरण इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ है। भारत के अधिकांश शहर बिना दीर्घकालिक मास्टर प्लान के फैलते गए। आबादी बढ़ती गई, लेकिन सड़कें नहीं बढ़ीं; भवन ऊँचे होते गए, परंतु अग्निशमन सेवाओं की क्षमता उसी अनुपात में विकसित नहीं हुई। अनेक पुराने बाजारों और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में अग्निशमन वाहन तक प्रवेश नहीं कर पाते। कई स्थानों पर बिजली के तारों का जाल, अवैध पार्किंग और अतिक्रमण आग पर नियंत्रण की प्रक्रिया को और कठिन बना देते हैं। ऐसी परिस्थितियों में कुछ ही मिनटों में छोटी आग भी बड़ी त्रासदी में बदल जाती है।
इस संकट का दूसरा महत्वपूर्ण कारण नीतिगत विरोधाभास है। एक ओर सरकार 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' के माध्यम से व्यापार को बढ़ावा देने के लिए अनुमतियों की प्रक्रिया सरल बना रही है, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा मानकों के अनुपालन पर पर्याप्त बल नहीं दिया जा रहा। कई राज्यों में निश्चित ऊँचाई तक के भवनों को अनिवार्य अग्नि-अनापत्ति प्रमाण-पत्र से छूट प्राप्त है। परिणामस्वरूप हजारों ऐसे भवन बिना नियमित अग्नि-सुरक्षा निरीक्षण के संचालित होते रहते हैं। कई बार भवन निर्माण की अनुमति एक उद्देश्य के लिए मिलती है, किंतु समय के साथ उसका उपयोग पूरी तरह बदल जाता है। दुर्भाग्य से इस परिवर्तन की प्रभावी निगरानी करने वाली कोई मजबूत प्रणाली विकसित नहीं हो सकी है।
प्रशासनिक समन्वय का अभाव भी स्थिति को जटिल बनाता है। भवन निर्माण की अनुमति नगर निगम देता है, भूमि उपयोग परिवर्तन विकास प्राधिकरण देखता है, व्यापार लाइसेंस किसी अन्य विभाग से जारी होता है और अग्नि-सुरक्षा का दायित्व अग्निशमन विभाग पर होता है। इन विभागों के बीच सूचनाओं का समुचित आदान-प्रदान नहीं होने से नियमों का प्रभावी अनुपालन नहीं हो पाता। कई बार भवन निर्माण के समय सभी औपचारिकताएँ पूरी कर ली जाती हैं, लेकिन बाद में भवन में किए गए अवैध परिवर्तन वर्षों तक किसी की निगाह में नहीं आते।
भ्रष्टाचार और जवाबदेही का अभाव भी इस समस्या का महत्वपूर्ण पहलू है। यदि निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रह जाएँ और प्रमाण-पत्र वास्तविक जाँच के बिना जारी होने लगें, तो नियमों का अस्तित्व मात्र औपचारिकता बनकर रह जाता है। अनेक दुर्घटनाओं के बाद यह सामने आया कि भवनों में अग्निशामक यंत्र तो लगे थे, किंतु उनकी समय-समय पर जाँच नहीं हुई थी। कई स्थानों पर स्प्रिंकलर प्रणाली कार्य नहीं कर रही थी या आपातकालीन निकास पर ताले लगे हुए थे। यह केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक और नैतिक विफलता भी है।
नागरिक जागरूकता की कमी भी इस संकट को बढ़ाती है। अधिकांश लोग भवन खरीदते या किराए पर लेते समय अग्नि-सुरक्षा व्यवस्था की जाँच नहीं करते। व्यापारिक प्रतिष्ठान लागत कम करने के लिए सुरक्षा उपकरणों की उपेक्षा करते हैं। नियमित मॉक ड्रिल, आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण और आपातकालीन निकासी अभ्यास को अनावश्यक समझा जाता है। जबकि विकसित देशों में अग्नि-सुरक्षा संस्कृति को विद्यालय स्तर से ही बढ़ावा दिया जाता है।
भारत में आपदा प्रबंधन की व्यवस्था पिछले दो दशकों में काफी मजबूत हुई है, लेकिन आग जैसी शहरी आपदाओं की रोकथाम पर अपेक्षित ध्यान अभी भी नहीं दिया गया है। आपदा आने के बाद राहत और बचाव कार्यों में हमारी संस्थाएँ उल्लेखनीय कार्य करती हैं, किंतु यदि रोकथाम और जोखिम न्यूनीकरण पर समान गंभीरता से निवेश किया जाए तो अनेक त्रासदियों को रोका जा सकता है। आपदा प्रबंधन का मूल सिद्धांत भी यही है कि रोकथाम पर खर्च किया गया प्रत्येक रुपया राहत और पुनर्वास पर होने वाले कई गुना व्यय को बचाता है।
अब आवश्यकता केवल दंडात्मक कार्रवाई की नहीं, बल्कि व्यापक संरचनात्मक सुधारों की है। सबसे पहले शहरी नियोजन को वैज्ञानिक और भविष्य-दृष्टि वाला बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक शहर में भूमि उपयोग, जनसंख्या घनत्व, सड़क चौड़ाई, जल स्रोत, अग्निशमन केंद्रों की स्थिति और आपातकालीन पहुँच मार्गों का पुनर्मूल्यांकन किया जाए। मिश्रित-उपयोग वाले क्षेत्रों के लिए अलग सुरक्षा मानक निर्धारित किए जाएँ और भवनों की स्वीकृति इन्हीं मानकों के अनुरूप हो।
दूसरा, राष्ट्रीय भवन संहिता से अग्नि-सुरक्षा मानकों का देशभर में समान रूप से कठोर अनुपालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। भवन की ऊँचाई के बजाय उसमें उपस्थित लोगों की संख्या, गतिविधि की प्रकृति और अग्नि-जोखिम के आधार पर सुरक्षा मानक निर्धारित किए जाने चाहिए। सभी सार्वजनिक और मिश्रित-उपयोग भवनों में स्वचालित स्प्रिंकलर, धुआँ संवेदक, अग्नि-अलार्म, आपातकालीन प्रकाश व्यवस्था और स्पष्ट निकास मार्ग अनिवार्य हों।
तीसरा, भवनों की स्वीकृति, व्यापार लाइसेंस, फायर लाइसेंस और निरीक्षण को एकीकृत डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म से जोड़ा जाए। यदि किसी भवन का उपयोग स्वीकृत उद्देश्य से भिन्न पाया जाए या उसका सुरक्षा प्रमाण-पत्र समाप्त हो जाए तो संबंधित विभागों को स्वतः सूचना प्राप्त हो। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भू-स्थानिक तकनीक का उपयोग कर जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान की जा सकती है।
चौथा, अग्निशमन सेवाओं का आधुनिकीकरण अत्यंत आवश्यक है। आधुनिक उपकरण, ऊँची इमारतों तक पहुँचने वाली हाइड्रोलिक सीढ़ियाँ, पर्याप्त जल स्रोत, प्रशिक्षित मानव संसाधन और तेज़ प्रतिक्रिया प्रणाली विकसित की जाए। छोटे और मध्यम शहरों में भी अग्निशमन अवसंरचना को जनसंख्या और भवनों की संख्या के अनुरूप मजबूत किया जाना चाहिए।
पाँचवाँ, नागरिक सहभागिता को नीति का अभिन्न अंग बनाया जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों, कोचिंग संस्थानों, बाजारों, अस्पतालों और आवासीय सोसाइटियों में नियमित अग्नि-सुरक्षा प्रशिक्षण और मॉक ड्रिल अनिवार्य किए जाएँ। जिस प्रकार स्वच्छ भारत अभियान ने जनभागीदारी को बढ़ावा दिया, उसी प्रकार राष्ट्रीय स्तर पर अग्नि-सुरक्षा जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
अंततः, शासन व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित करना सबसे महत्वपूर्ण है। यदि किसी दुर्घटना का कारण नियमों का उल्लंघन या निरीक्षण में लापरवाही हो, तो केवल भवन मालिक ही नहीं बल्कि संबंधित अधिकारियों की भी स्पष्ट जवाबदेही तय हो। पारदर्शिता, नियमित सामाजिक लेखा-परीक्षण और स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट इस दिशा में प्रभावी कदम हो सकते हैं।
भारत के शहर केवल आर्थिक गतिविधियों के केंद्र नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन, सपनों और भविष्य के आधार हैं। यदि शहरी विकास सुरक्षा, नियोजन और उत्तरदायित्व से रहित होगा, तो विकास का यही मॉडल बार-बार मानवीय त्रासदियों को जन्म देता रहेगा। आवश्यकता ऐसी शहरी संस्कृति विकसित करने की है जिसमें भवनों की ऊँचाई से अधिक महत्व उनकी सुरक्षा को मिले, व्यावसायिक लाभ से अधिक प्राथमिकता मानव जीवन को दी जाए और नियमों का पालन बाध्यता नहीं बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व माना जाए।
वास्तविक स्मार्ट सिटी वही होगी जहाँ नागरिक स्वयं को सुरक्षित महसूस करें, जहाँ भवन विकास के प्रतीक होने के साथ-साथ सुरक्षा के भी मानक बनें और जहाँ प्रत्येक निर्माण यह संदेश दे कि मानव जीवन किसी भी आर्थिक लाभ से अधिक मूल्यवान है। यदि भारत को भविष्य के सुरक्षित, टिकाऊ और आपदा-प्रतिरोधी शहर बनाने हैं, तो प्रतिक्रियात्मक कार्रवाइयों से आगे बढ़कर दूरदर्शी शहरी नियोजन, कठोर नियामकीय व्यवस्था, आधुनिक तकनीक, पारदर्शी प्रशासन और जागरूक नागरिक सहभागिता पर आधारित दीर्घकालिक सुधारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। तभी विकास की चमक के पीछे छिपे अग्नि-जाल को समाप्त कर सुरक्षित और संवेदनशील शहरी भारत का निर्माण संभव होगा।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

