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बदलते फैशन, बदलती सोच और समाज की असली चिंता

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बदलते फैशन, बदलती सोच और समाज की असली चिंता


- डॉ. सत्यवान सौरभ

समाज में समय के साथ बहुत कुछ बदलता है। भाषा बदलती है, रहन-सहन बदलता है, तकनीक बदलती है और पहनावा भी बदलता है। हर युग की अपनी पहचान होती है। कभी घूँघट और साड़ी को आदर्श माना गया, फिर सलवार-सूट सामान्य हुआ, उसके बाद जींस और आधुनिक परिधान युवाओं की पसंद बने। आज सोशल मीडिया और वैश्विक संस्कृति के प्रभाव से फैशन लगातार नए रूप ले रहा है। ऐसे में स्वाभाविक है कि समाज में इस बदलाव को लेकर चर्चा भी हो और मतभेद भी।

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्टर तेजी से वायरल हुआ जिसमें महिलाओं के पहनावे में आए बदलाव को “संस्कारों की हार” और “नग्न होती नारी” जैसे शब्दों से जोड़ा गया। पोस्टर में 1980 से 2025 तक के फैशन परिवर्तन को दिखाकर यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि आधुनिकता ने भारतीय संस्कृति को कमजोर कर दिया है। यह विषय केवल कपड़ों का नहीं बल्कि समाज की सोच, मानसिकता, स्वतंत्रता, नैतिकता और स्त्री के प्रति दृष्टिकोण का भी है। इसलिए इस विषय पर गंभीर और संतुलित चर्चा आवश्यक है।

सबसे पहले यह समझना होगा कि पहनावा केवल शरीर ढँकने का माध्यम नहीं होता बल्कि यह संस्कृति, मौसम, सुविधा, पेशा, परिवेश और व्यक्तिगत पसंद का भी हिस्सा होता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में अलग-अलग राज्यों की महिलाओं का पहनावा सदियों से भिन्न रहा है। कहीं साड़ी प्रमुख रही, कहीं घाघरा-चोली, कहीं मेखला, कहीं फुलकारी और कहीं सलवार-सूट। यदि परंपरा ही एकमात्र मानदंड होती, तो इतने विविध रूप कभी विकसित नहीं होते। इसका अर्थ स्पष्ट है कि समाज हमेशा बदलता रहा है और पहनावे में परिवर्तन कोई नई घटना नहीं है।

आज की युवा पीढ़ी ऐसे दौर में जी रही है जहाँ वैश्विक संस्कृति का प्रभाव पहले से कहीं अधिक है। मोबाइल फोन, इंटरनेट, फिल्मों, वेब सीरीज और सोशल मीडिया ने दुनिया को छोटे से मंच में बदल दिया है। फैशन अब महानगरों तक सीमित नहीं रहा बल्कि गाँवों और कस्बों तक पहुँच चुका है। ऐसे में युवाओं का नए पहनावे की ओर आकर्षित होना अस्वाभाविक नहीं है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इस बदलाव को सीधे “चरित्र”, “संस्कार” और “नैतिकता” से जोड़ दिया जाता है।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं के कपड़ों को ही उनकी मर्यादा का पैमाना मानता है। यदि कोई लड़की आधुनिक कपड़े पहनती है तो उसके संस्कारों पर प्रश्न उठा दिए जाते हैं, जबकि वही समाज पुरुषों के पहनावे को इतनी कठोर दृष्टि से नहीं देखता। यह दोहरा मापदंड लंबे समय से हमारे समाज में मौजूद है। सवाल यह है कि क्या किसी व्यक्ति का चरित्र केवल उसके वस्त्र तय करते हैं? यदि ऐसा होता, तो अपराध कभी परंपरागत कपड़े पहनने वालों द्वारा नहीं किए जाते। वास्तविकता यह है कि नैतिकता मनुष्य के व्यवहार, सोच और कर्मों से निर्धारित होती है, न कि केवल उसके पहनावे से।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि आधुनिकता और अश्लीलता दोनों अलग बातें हैं। हर आधुनिक परिधान अश्लील नहीं होता और हर पारंपरिक वस्त्र संस्कारों की गारंटी नहीं देता। कई बार समाज अपनी असहजता को “संस्कृति की रक्षा” का नाम देकर प्रस्तुत करता है। जबकि असली चुनौती कपड़ों से अधिक मानसिकता की है। यदि किसी महिला को सड़क पर असुरक्षा महसूस होती है, तो उसके पीछे कारण उसके वस्त्र नहीं बल्कि समाज के कुछ लोगों की विकृत सोच है।

यह भी सच है कि फैशन उद्योग और सोशल मीडिया ने शरीर को प्रदर्शन की वस्तु की तरह प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। लाइक्स, फॉलोअर्स और वायरल होने की होड़ में कई बार लोग सीमाओं को भूल जाते हैं। बाजारवाद ने सुंदरता को एक उत्पाद बना दिया है। युवाओं पर आकर्षक दिखने का दबाव बढ़ा है। यह चिंता का विषय अवश्य है क्योंकि इससे आत्मविश्वास की जगह दिखावे की संस्कृति मजबूत होती है। परंतु इसका समाधान महिलाओं को दोष देना नहीं, बल्कि समाज में संतुलित और स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित करना है।

परिवार और शिक्षा की भूमिका यहाँ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि बच्चों को बचपन से ही सम्मान, समानता और संवेदनशीलता के संस्कार दिए जाएँ, तो वे किसी व्यक्ति को उसके कपड़ों से नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व से पहचानेंगे। लड़कों को यह सिखाना अधिक आवश्यक है कि महिलाओं का सम्मान करें, बजाय इसके कि लड़कियों को हर समय अपने पहनावे के लिए दोषी महसूस कराया जाए।

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता उसकी विविधता और सहनशीलता रही है। हमारी सभ्यता ने हमेशा परिवर्तन को अपनाया है। कभी महिलाओं की शिक्षा का विरोध हुआ, फिर वही शिक्षा समाज की शक्ति बनी। कभी नौकरी करने वाली महिलाओं को गलत माना गया, आज वही महिलाएँ परिवार और देश की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं इसलिए केवल बदलाव के आधार पर किसी चीज को गलत ठहराना उचित नहीं कहा जा सकता।

हालाँकि इसका अर्थ यह भी नहीं कि समाज में मर्यादा और संतुलन का कोई महत्व नहीं रह गया। स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। हर व्यक्ति को अपने परिवेश, अवसर और सामाजिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना चाहिए। लेकिन यह निर्णय भय या दबाव से नहीं बल्कि समझ और आत्मसम्मान से होना चाहिए। संस्कार का अर्थ बंधन नहीं बल्कि विवेक है।

सोशल मीडिया के इस युग में संवाद की जगह आरोपों ने ले ली है। लोग तुरंत किसी की तस्वीर देखकर निर्णय सुना देते हैं। महिलाओं के पहनावे पर बहस करना आसान है लेकिन महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा, रोजगार और समान अवसरों पर गंभीर चर्चा कम होती है। यदि समाज वास्तव में संस्कृति और भविष्य को लेकर चिंतित है तो उसे सबसे पहले महिलाओं के प्रति सम्मानजनक वातावरण बनाना होगा।

हमें यह समझना होगा कि संस्कृति केवल कपड़ों में नहीं रहती। संस्कृति हमारे व्यवहार, भाषा, परिवारिक मूल्यों, बुजुर्गों के सम्मान, ईमानदारी, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी में बसती है। यदि कोई व्यक्ति आधुनिक कपड़े पहनकर भी दूसरों का सम्मान करता है, अपने कर्तव्यों का पालन करता है और मानवीय मूल्यों को महत्व देता है तो वह उतना ही संस्कारी है जितना कोई पारंपरिक वस्त्र पहनने वाला व्यक्ति।

आज आवश्यकता किसी एक पक्ष को सही या गलत साबित करने की नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की है। न अंधी आधुनिकता उचित है और न ही कट्टर सोच। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि नई पीढ़ी अपनी पसंद और पहचान के साथ जीना चाहती है। वहीं युवाओं को भी यह समझना होगा कि आत्मविश्वास केवल फैशन से नहीं, बल्कि ज्ञान, व्यक्तित्व और व्यवहार से आता है।

महिलाओं को सम्मान देना केवल “देवी” कह देने से पूरा नहीं होता। वास्तविक सम्मान तब होगा जब उन्हें अपने जीवन, शिक्षा, करियर और पहनावे के निर्णय लेने की स्वतंत्रता मिलेगी। यदि कोई महिला साड़ी पहनना चाहती है तो वह उसका अधिकार है और यदि कोई जींस पहनना चाहती है तो वह भी उसका अधिकार है। समाज का कार्य निर्णय थोपना नहीं, बल्कि सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण बनाना होना चाहिए।

अंततः, बदलते फैशन को देखकर घबराने की आवश्यकता नहीं है। हर पीढ़ी अपने समय के अनुसार जीवन जीती है। हमें केवल इतना सुनिश्चित करना है कि आधुनिकता के बीच मानवीय मूल्य कमजोर न हों। संस्कृति तब तक जीवित रहती है जब तक समाज में सम्मान, संवेदना और नैतिकता बनी रहती है। कपड़े बदल सकते हैं लेकिन यदि हमारी सोच संतुलित और मानवीय बनी रहे तो समाज कभी “नग्न” नहीं होगा। असली संकट वस्त्रों का नहीं, दृष्टि का है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश