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उबलती धरती, डगमगाती थाली

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उबलती धरती, डगमगाती थाली


- डॉ. सत्यवान सौरभ

जलवायु परिवर्तन के इस निर्णायक दौर में चरम गर्मी अब केवल मौसमी विचलन नहीं रह गई है; यह एक गहरे संरचनात्मक संकट के रूप में उभर रही है, जो वैश्विक खाद्य प्रणालियों की बुनियाद को हिला रही है। बढ़ते तापमान और तीव्र होती हीटवेव्स ने कृषि, पशुपालन, मत्स्य पालन और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं को एक ऐसे दबाव में ला खड़ा किया है, जहां हर कड़ी कमजोर पड़ती दिख रही है। वैज्ञानिक और नीति-निर्माता अब इसे एक “रिस्क मल्टीप्लायर” के रूप में पहचान रहे हैं- ऐसा कारक जो न केवल स्वयं नुकसान पहुंचाता है बल्कि अन्य जोखिमों को भी कई गुना बढ़ा देता है। यदि अब निर्णायक कदम नहीं उठाए गए तो चरम गर्मी आने वाले दशकों में वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा व्यवस्थित खतरा बन जाएगी।

चरम तापमान का सबसे प्रत्यक्ष और स्पष्ट प्रभाव फसलों पर पड़ता है। यह स्थापित तथ्य है कि 30 डिग्री सेल्सियस से ऊपर का तापमान गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों के लिए प्रतिकूल होता है। अधिक तापमान पौधों की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया को बाधित करता है, परागण को प्रभावित करता है और दानों के विकास को अधूरा छोड़ देता है। परिणामस्वरूप उत्पादन में गिरावट आती है, जो कई मामलों में 10 से 50 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह केवल मात्रा की समस्या नहीं है- गर्मी के कारण अनाज का पोषण स्तर भी घटता है, जिससे खाद्य गुणवत्ता प्रभावित होती है। इस प्रकार, यह संकट उत्पादन और पोषण दोनों को एक साथ चोट पहुंचाता है।

पशुपालन क्षेत्र भी इस तापीय दबाव से अछूता नहीं है। उच्च तापमान के कारण पशुओं में हीट स्ट्रेस बढ़ता है, जिससे उनकी उत्पादकता पर सीधा असर पड़ता है। डेयरी पशुओं में दूध उत्पादन में कमी, मुर्गियों में अंडा उत्पादन का घट जाना और सूअरों में वृद्धि दर का धीमा होना इसके प्रमुख उदाहरण हैं। चरम परिस्थितियों में पशुओं की मृत्यु तक हो सकती है, जिससे किसानों की आय पर गंभीर चोट पड़ती है। मत्स्य पालन में स्थिति और भी जटिल हो जाती है—समुद्री तापीय लहरों के कारण जल में घुलित ऑक्सीजन की मात्रा घटती है, जिससे मछलियां तनावग्रस्त हो जाती हैं और उनका जीवित रहना कठिन हो जाता है। इस तरह, अत्यधिक गर्मी खाद्य उत्पादन के सभी प्रमुख स्रोतों को एक साथ प्रभावित कर रही है।

असली चुनौती तब सामने आती है जब ये प्रभाव एक-दूसरे को बढ़ाने लगते हैं। चरम गर्मी सूखे को जन्म देती है, जिससे जल संसाधनों पर अभूतपूर्व दबाव पड़ता है। सिंचाई के लिए पानी की कमी फसलों की उत्पादकता को और घटा देती है, जबकि पशुओं और मनुष्यों के लिए जल संकट गंभीर रूप ले लेता है। इसके अलावा, उच्च तापमान कीटों और रोगों के प्रसार के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा करता है। टिड्डी दल जैसी घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही हैं, जो कुछ ही दिनों में विशाल फसल क्षेत्र को नष्ट कर सकती हैं। इस प्रकार, तापमान वृद्धि केवल एक अलग-थलग समस्या नहीं बल्कि एक ऐसे चक्र का हिस्सा है जो लगातार खुद को मजबूत करता जाता है।

वन क्षेत्रों में भी इसका गहरा प्रभाव दिखाई देता है। बढ़ती गर्मी और सूखे के कारण जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे जैव विविधता को नुकसान पहुंचता है और कार्बन चक्र बाधित होता है। यह एक खतरनाक दुष्चक्र को जन्म देता है—जंगलों की आग से कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है, जो आगे तापमान वृद्धि को और तेज करता है, और यह वृद्धि फिर नई आग की घटनाओं को जन्म देती है। इस चक्र का प्रभाव अंततः कृषि और खाद्य प्रणालियों पर ही पड़ता है।

चरम गर्मी का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखा पहलू श्रम उत्पादकता पर इसका प्रभाव है। कृषि क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक, विशेषकर विकासशील देशों में, अत्यधिक तापमान के कारण काम करने में असमर्थ हो जाते हैं। जब “गीला बल्ब तापमान” एक निश्चित सीमा से ऊपर पहुंच जाता है, तो मानव शरीर के लिए लंबे समय तक काम करना जानलेवा हो सकता है। यह स्थिति एक प्रकार का “हीट-इकोनॉमी ट्रैप” पैदा करती है, जहां गर्मी सीधे श्रम, उत्पादन और आय—तीनों को सीमित कर देती है। अनुमान है कि दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों में साल के सैकड़ों दिन ऐसे हो सकते हैं, जब श्रमिकों के लिए काम करना संभव नहीं रहेगा। इसका सीधा असर किसानों और मजदूरों की आय पर पड़ता है, जिससे आर्थिक असुरक्षा बढ़ती है।

इन सभी प्रभावों का सम्मिलित परिणाम एक “कैस्केडिंग फेल्योर” के रूप में सामने आता है। जब फसलें असफल होती हैं, पशुधन प्रभावित होता है और श्रमिक काम नहीं कर पाते, तो खाद्य आपूर्ति शृंखला टूटने लगती है। इसका सीधा असर बाजार पर पड़ता है- खाद्य कीमतें बढ़ती हैं, जिससे गरीब और कमजोर वर्गों के लिए भोजन तक पहुंच और कठिन हो जाती है। यह स्थिति कुपोषण, गरीबी और सामाजिक अस्थिरता को जन्म देती है। कई क्षेत्रों में यह प्रवासन को भी बढ़ावा देती है, जहां लोग जीविका की तलाश में अपने घर छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं। इस प्रकार, चरम गर्मी एक पर्यावरणीय समस्या से कहीं अधिक- एक व्यापक सामाजिक-आर्थिक संकट बन जाती है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए यह चुनौती और भी गंभीर है। हरियाणा, पंजाब और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में हाल के वर्षों में हीटवेव्स के कारण गेहूं और चावल की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा गया है। विशेष रूप से देर से बोई गई फसलों पर इसका असर अधिक पड़ता है, जिससे उत्पादन में 10 से 15 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई है। भारत की हरित क्रांति का केंद्र रहे ये क्षेत्र अब जलवायु अस्थिरता के सबसे बड़े प्रयोगशाला बनते जा रहे हैं। इसके साथ ही, भूजल का अत्यधिक दोहन और बढ़ती गर्मी मिलकर जल संकट को और गहरा कर रहे हैं, जो कृषि की स्थिरता के लिए गंभीर खतरा है।

इस संकट का प्रभाव समान रूप से वितरित नहीं है। छोटे और सीमांत किसान, महिलाएं और युवा सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। उनके पास सीमित संसाधन, कम तकनीकी जानकारी और जोखिम उठाने की कम क्षमता होती है। परिणामस्वरूप, वे जलवायु परिवर्तन के इस बढ़ते दबाव के सामने अधिक असुरक्षित हो जाते हैं। इस प्रकार, अत्यधिक गर्मी केवल पर्यावरणीय चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को भी गहरा करने वाला कारक बन रही है।

ऐसे में समाधान की दिशा में ठोस और बहुआयामी रणनीतियों की आवश्यकता है। सबसे पहले, अनुकूलन (adaptation) पर ध्यान देना होगा। जलवायु-स्मार्ट कृषि पद्धतियां—जैसे गर्मी-सहनशील बीजों का उपयोग, फसल विविधीकरण, ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, तथा छायादार खेती—इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इसके अलावा, मौसम पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करना आवश्यक है, ताकि किसान समय रहते अपने निर्णय बदल सकें और नुकसान को कम कर सकें।

पशुपालन के क्षेत्र में भी सुधार की आवश्यकता है। बेहतर वेंटिलेशन वाले शेड, पर्याप्त जल उपलब्धता और चयनात्मक प्रजनन जैसी तकनीकों के माध्यम से पशुओं को गर्मी के प्रभाव से बचाया जा सकता है। साथ ही, बीमा योजनाओं और वित्तीय सहायता के जरिए किसानों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना भी आवश्यक है, ताकि वे जलवायु जोखिमों का सामना कर सकें।

नीतिगत स्तर पर, सरकारों को एक समग्र और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाना होगा। जल संरक्षण, जैव विविधता संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और अन्य कृषि योजनाओं को जलवायु परिवर्तन के अनुरूप पुनर्गठित करने की आवश्यकता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग बढ़ाना और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करना अनिवार्य है, क्योंकि दीर्घकालिक समाधान केवल शमन (mitigation) के माध्यम से ही संभव है।

अंततः, यह समझना आवश्यक है कि चरम गर्मी का यह संकट एक चेतावनी है—एक ऐसा संकेत जो हमें बताता है कि हमारी विकास प्रणाली प्रकृति की सीमाओं से टकरा रही है। खाद्य प्रणालियों को सुरक्षित रखने के लिए हमें केवल तकनीकी और नीतिगत बदलाव ही नहीं, बल्कि अपने दृष्टिकोण में भी परिवर्तन लाना होगा। संदेश साफ है—या तो हम अभी कार्रवाई करें या भविष्य में खाद्य असुरक्षा की भारी कीमत चुकाएं।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश