भारत के संदर्भ में यूरोप की हिंसा भिन्न प्रणाली से समझनी होगी
योगेश कुमार सोनी
लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन जनता की आवाज बुलंद करने का महत्वपूर्ण माध्यम है। जब सरकारें जनभावनाओं को अनसुना करती हैं, नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ता है या लोगों को लगता है कि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो रहा, तब सड़कों पर उतर कर विरोध करना स्वाभाविक है। लेकिन जब यही विरोध हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़ और पुलिस से टकराव का रूप ले लेता है तो सवाल केवल प्रदर्शनकारियों के उद्देश्य का नहीं रह जाता बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और कानून के शासन का भी बन जाता है। यूरोप के विभिन्न देशों में समय-समय पर हुए हिंसक प्रदर्शनों से भारत को भी कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। हालांकि यूरोप एक समान राजनीतिक या सामाजिक इकाई नहीं है। फ्रांस में पेंशन सुधारों के विरोध, किसानों के आंदोलन, ब्रिटेन में दंगों और अन्य देशों में आर्थिक असंतोष से जुड़े प्रदर्शनों की परिस्थितियां अलग-अलग रही हैं। इसलिए हर घटना को एक ही नजरिये से देखने के बजाय उसके कारणों और परिणामों को समझना आवश्यक है।
हिंसक प्रदर्शनों का पहला सबक यह है कि जन-असंतोष को समय रहते समझना और उसका समाधान करना किसी भी सरकार की जिम्मेदारी है। महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, किसान समस्या, सामाजिक भेदभाव और भविष्य को लेकर असुरक्षा जैसे मुद्दे लोगों में नाराजगी पैदा कर सकते हैं। यदि नागरिकों को लगता है कि उनकी बात सुनने वाला कोई नहीं है तो व्यवस्था के प्रति अविश्वास गहरा सकता है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। यहां भाषाई, धार्मिक, जातीय, क्षेत्रीय और आर्थिक विविधता के कारण अलग-अलग वर्गों की अपेक्षाएं भी अलग हैं। सरकारों को चाहिए कि वे नीतियों के निर्माण और क्रियान्वयन में जनसंवाद को प्राथमिकता दें। समय पर संवाद और शिकायतों का समाधान कई बार उस स्थिति को पैदा होने से रोक सकता है, जिसमें सामान्य विरोध उग्र हो जाता है।
हालांकि यह भी समझना जरूरी है कि हर हिंसक घटना का कारण सरकारी नीतियों की विफलता नहीं होता। अफवाह, संगठित उकसावा, आपराधिक तत्व और राजनीतिक ध्रुवीकरण भी परिस्थितियों को बिगाड़ सकते हैं। विरोध का अधिकार है, हिंसा का नहीं। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यह है कि नागरिक सरकार की नीतियों से असहमति जता सकते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, धरना, जुलूस और सार्वजनिक बहस लोकतांत्रिक व्यवस्था के आवश्यक अंग हैं लेकिन किसी नीति का विरोध करने का अधिकार सार्वजनिक संपत्ति जलाने, दुकानों को लूटने, वाहनों में आग लगाने या आम नागरिकों की सुरक्षा खतरे में डालने का अधिकार नहीं बन जाता।
यूरोप की हिंसक घटनाएं यह याद दिलाती हैं कि जब विरोध की सीमा टूटती है तो सबसे अधिक नुकसान अक्सर उन्हीं आम लोगों को उठाना पड़ता है जिनके हितों की रक्षा का दावा किया जाता है। कारोबार प्रभावित होता है, सार्वजनिक परिवहन बाधित होता है, छोटे दुकानदारों की आजीविका पर असर पड़ता है और भय का वातावरण बनता है। भारत में भी किसी आंदोलन की सफलता का मूल्यांकन केवल भीड़ के आकार या सड़कों पर पैदा हुए दबाव से नहीं बल्कि उसकी वैध मांगों, जनसमर्थन, शांतिपूर्ण आचरण और प्राप्त परिणामों से होना चाहिए।
सोशल मीडिया की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आज किसी भी घटना का वीडियो कुछ ही मिनटों में हजारों-लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया जनसमस्याओं को सामने लाने, लोगों को संगठित करने और प्रशासन तक शिकायतें पहुंचाने का प्रभावी माध्यम है लेकिन यही माध्यम भ्रामक सूचनाओं, पुराने वीडियो को नई घटना बताकर प्रसारित करने, नफरत फैलाने और भीड़ को उकसाने का जरिया भी बन सकता है। यूरोप और भारत, दोनों के संदर्भ में यह महत्वपूर्ण चुनौती है। तनावपूर्ण परिस्थितियों में बिना पुष्टि की गई खबरें आग में घी डालने का काम कर सकती हैं। इसलिए नागरिकों को किसी भी संदेश या वीडियो को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जांचनी चाहिए।
प्रशासन को भी अफवाहों का त्वरित खंडन करना चाहिए और विश्वसनीय जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध करानी चाहिए। डिजिटल मंचों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के साथ-साथ हिंसा के लिए प्रत्यक्ष उकसावे और संगठित दुष्प्रचार से निपटने की जरूरत है। लेकिन इसके नाम पर वैध आलोचना को दबाना भी लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध होगा।
हिंसक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना, नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना पुलिस का दायित्व है। हिंसा, आगजनी और लूटपाट करने वालों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन पुलिस की कार्रवाई निष्पक्ष, अनुपातिक और जवाबदेह भी होनी चाहिए। शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और हिंसा करने वालों के बीच स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। अत्यधिक बल प्रयोग, मनमानी गिरफ्तारी या किसी समुदाय के प्रति पक्षपात का आरोप व्यवस्था पर जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।
भारत के लिए सबक स्पष्ट है- न तो हिंसा के सामने प्रशासन कमजोर दिखाई देना चाहिए और न ही कानून लागू करने के नाम पर नागरिक अधिकारों की अनदेखी होनी चाहिए। आधुनिक पुलिस व्यवस्था की सफलता केवल बल प्रयोग में नहीं बल्कि तनाव कम करने, संवाद स्थापित करने, खुफिया सूचनाओं के सही इस्तेमाल और समय रहते स्थिति संभालने में भी है। राजनीतिक दलों को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए चूँकि लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की नीतियों की आलोचना करना और जनता के मुद्दे उठाना है। वहीं, सत्तापक्ष का दायित्व है कि वह आलोचना को लोकतंत्र का हिस्सा माने और असहमति रखने वालों से संवाद करे।
समस्या तब पैदा होती है, जब राजनीतिक लाभ के लिए किसी विवाद को भड़काया जाता है, तथ्यों के बजाय भावनाओं को उकसाया जाता है या हिंसा करने वालों के प्रति चयनात्मक रवैया अपनाया जाता है। भारत में सभी राजनीतिक दलों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे विरोध प्रदर्शनों के दौरान अपने समर्थकों को शांतिपूर्ण आचरण के लिए प्रेरित करें। हिंसा किसी भी पक्ष की ओर से हो, उसकी निंदा समान रूप से होनी चाहिए। कानून का पालन राजनीतिक विचारधारा या सत्ता में मौजूद होने के आधार पर अलग-अलग नहीं हो सकता।
यूरोप के हिंसक प्रदर्शनों से भारत को सबसे बड़ा सबक यह मिलता है कि लोकतंत्र केवल चुनाव कराने तक सीमित नहीं है। उसकी वास्तविक मजबूती नागरिकों के भरोसे, संस्थाओं की निष्पक्षता, शांतिपूर्ण असहमति की स्वतंत्रता और कानून के समान अनुपालन में निहित है। सरकारों को जनसमस्याओं के समाधान के लिए संवेदनशील होना होगा, राजनीतिक दलों को जिम्मेदार आचरण अपनाना होगा, पुलिस को निष्पक्षता और संयम के साथ कार्रवाई करनी होगी तथा नागरिकों को अफवाहों और हिंसक उकसावों से बचना होगा। भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी विविधता और संवाद की परंपरा में है। असहमति को दबाने के बजाय सुनना और हिंसा को किसी भी परिस्थिति में जायज न ठहराना ही वह रास्ता है, जिससे लोकतंत्र अधिक मजबूत बन सकता है। आखिरकार, किसी भी आंदोलन का उद्देश्य व्यवस्था को बेहतर बनाना होना चाहिए, उसे हिंसा और अराजकता के हवाले करना नहीं।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

