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वृद्ध हमारे समाज का अनुभव समृद्ध भाग, इनकी देखभाल हमारा कर्तव्य

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वृद्ध हमारे समाज का अनुभव समृद्ध भाग, इनकी देखभाल हमारा कर्तव्य


हृदयनारायण दीक्षित

अमेरिका की समाज व्यवस्था व्यक्तिवादी है। संयुक्त परिवार व्यवस्था नहीं है। अमेरिका में रहने वाले तमाम भारतवासी हमारे परिचित हैं। वे अपने पुत्रों के किस्से सुनाते हुए भावुक हो जाते हैं। आँखें छलछला जाती हैं। ताजा घटना ने मुझे मर्माहत किया है। मेरे एक मित्र के दोनों पुत्र परिवार सहित अमेरिका में कार्यरत हैं। जीवन के अंतिम दिनों में पत्नी के साथ अकेले रह गए। बीमारी के समय न तो संतानें साथ थीं और न उचित देखभाल का सहारा मिला। निधन के उपरांत एक पुत्र और दूसरे की पत्नी औपचारिक रूप से आए। किंतु अंतिम संस्कार तक में वह श्रद्धा परंपरा का भाव नहीं। अस्पताल से सीधे श्मशान ले जाकर बिना विधि-विधान के अंत्येष्टि कर दी गई। घर तक लाना आवश्यक नहीं समझा गया। घटना बदलते पारिवारिक मूल्यों और वृद्धों की उपेक्षा का मार्मिक उदाहरण है।

मृत्यु जीवन का अंत है। वृद्धावस्था जीवन ऊर्जा का अवसान है। क्या मृत्यु दुख देती है या नहीं देती? यह प्रश्न अनुत्तरित है। मृत्यु का अनुभव अज्ञात है लेकिन वृद्धावस्था के कष्ट सर्वविदित हैं। बुद्ध की कथा में भी वृद्ध दर्शन की अनुभूति है। ऋग्वेद में 100 शरद् जीवन की स्तुति है। इस स्तुति में ‘पश्येम शरदः शतं-100 वर्ष देखने की भी इच्छा है। दीनहीन न होने की भी स्तुति है। वृद्धावस्था में दृष्टि सहित अधिकांश इन्द्रियां काम नहीं करती। बुढ़ापे के कष्टों की ओर वैदिक समाज का ध्यान गहरा है। जीवन अमूल्य है। वृद्ध हमारे समाज का अनुभव समृद्ध भाग हैं। उनके जीवन को कष्टरहित बनाना समाज का कर्तव्य है। वृद्धों की सेवा उनके पुत्रों-पौत्रों का प्रथम वरीयता वाला दायित्व है। यह राष्ट्र राज्य का भी कर्तव्य है। राष्ट्र राज्य सतर्क है। इस पर कानून भी है लेकिन समाज इस महत्वपूर्ण समस्या पर सजग व सतर्क नहीं है।

भारतीय समाज जीवन संयुक्त परिवारों में विकसित हुआ है। ऐसे परिवारों के सुख-दुख साझा रहे हैं। वृद्ध अपने बड़े परिवारों में आनंदित रहते हैं लेकिन अब संयुक्त परिवारों की परंपरा टूट गई है। सब एकाकी रहना चाहते हैं। वृद्ध अकेले हो रहे हैं। वे उपयोगी नहीं माने जाते। वे अशक्त हैं। आधुनिक उपयोगितावाद के कारण वृद्धावस्था के शारीरिक कष्टों में अब मानसिक संताप भी जुड़ गए हैं। ज्यादातर वृद्ध मानसिक अवसाद में हैं। संवेदनाएं कुचालक हो रही हैं।

सभी प्राणी काल के भीतर है। मनुष्य भी। जन्म और शैशव ऊषाकाल है। बचपन संभावनाओं का बीज है। संभावना का बीज फूटता है। जीवन ऊर्जा से भरी-पूरी तरूणाई आती है। तरूणाई भी स्थिर नहीं है। 40-50 शरद् पूर्णिमा आई, गई। जीवन का संध्या काल आया। ऊर्जा घटी, शरीर टूटा। प्राचीन कवि बता गए है-शीर्यते इति शरीरं। जो शीर्ण होता रहता है, वह शरीर है। शरीर सतत् क्षरणशील है। 60 वर्ष के आसपास आ जाती है वृद्धावस्था। आयुर्वेद के ग्रंथ शारंगधर संहिता में मनुष्य शरीर के क्षरण का सुंदर उल्लेख है। लिखा है कि प्रत्येक 10 वर्ष बाद भाव ह्नास के लाक्षणिक परिवर्तन आते हैं। जीवन के पहले 10 वर्ष में मनमौजी वाल्यावस्था का ह्नास होता है। फिर अगले 10 वर्ष में वृद्धि का ह्नास होता है। वृद्धि रूक जाती है। फिर अगले 10 वर्ष में कान्ति चेहरे की दीप्ति का ह्नास, फिर आगे के 10 वर्ष में धारणा का ह्नास होता है। 5वें दशक में सौन्दर्य का ह्नास और छठे में दृष्टि का ह्नास बताया गया है। 7वें दशक में ऊर्जाबल का ह्नास, फिर पराक्रम और बुद्धि का ह्नास होता है।”

आधुनिक विज्ञान ने इस ह्नास को घटाया है लेकिन प्रकृति के नियम अपना काम करते ही हैं। वृद्ध होना सबकी नियति है। बुढ़ापा अभिशाप नहीं है। वृद्धों के पास संसार के जीवन्त अनुभवों का कोष होता है। अनुभव का कोष महत्वपूर्ण है। वृद्ध के पास दिशा होती है, युवक के पास गति और ऊर्जा। वृद्धों के दिशा दर्शन में ही युवकों की गति उपयोगी है।

माता-पिता भी मार्गदर्शक संरक्षक होते हैं। वे न होते तो हम न होते। ऋग्वेद में पृथ्वी माता है, आकाश पिता है। इस उदाहरण में विराट पृथ्वी और अनंत आकाश की तुलना माता-पिता से की गई है। माता-पिता से हमारे अंतर्सम्बंध एकात्म है। वे जनक है। वे हमारा भविष्य संवारने में जुटे दो देव हैं। वे प्रतिपल प्यार और शुभांशंसा उड़ेलने वाले शक्ति केन्द्र हैं। उनका आदर और सम्मान हमारा कर्तव्य है। ऋषि की इच्छा है कि हम पृथ्वी को मां जैसी और आकाश को पिता जैसी प्रतिष्ठा दें।

ऋग्वेद (10.22.3) में इन्द्र से कहते हैं ‘‘जैसे पिता अपने पुत्र को संरक्षण देता है आप हमें वैसे ही संरक्षण दें- पिता पुत्रमिव प्रियम्।’’ यहां पिता का संरक्षण सबसे बड़ा है। ऋषि की कामना है कि इन्द्र भी उसे पिता जैसा संरक्षण दें। हाथ पकड़े रहें, हम गिरे तो वे तत्काल उठा लें। एक अन्य मंत्र में इन्द्र से प्रार्थना है कि आप हमें पिता की तरह बुद्धि दें-प्रमतिपितेव। इन्द्र ज्ञानी हैं। यह समाज की मान्यता है लेकिन पिता द्वारा दी गई बुद्धि की बात ही दूसरी है। ऋषि पिता की बुद्धि को श्रेय जानता है। देव सामाजिक मान्यता हैं। पिता यथार्थ हैं। प्रत्यक्ष संरक्षक व सुखदाता है। सोम से स्तुति है, ‘‘हमें वैसे ही सुखी रखो, जैसे पिता पुत्र को सुखी रखता है।” सुख कई तरह का होता है। प्रिय का मिलन सुख है। प्रकृति की अनुकूलता सुख है। इच्छा का पूरा होना भी सुख है लेकिन ऋषि पिता द्वारा दिए गए सुख से सराबोर है।

माता-पिता बचपन में पोषण देते हैं, पढ़ाते हैं-सिखाते हैं। वे स्वयं की चिन्ता नहीं करते अपना भविष्य नहीं देखते। हम सबके सुखद भविष्य का तानाबाना बुनते हैं। हम तरूण होते हैं, पिता वृद्ध होते हैं। हम तरूणाई से और परिपक्व होते हैं, पिता और वृद्ध होते हैं। जब हम तेज रफ्तार जीवन की गतिशीलता में होते हैं, तब माता-पिता उठते ही गिर पड़ते हैं। वे बचपन में हमको गिरने से बचाते थे। ऋषि को स्मृति में ऐसे तमाम प्रसंग हैं। एक ऋषि अग्नि से स्तुति करते हैं, ‘‘हमें वैसे ही उछालो जैसे हमारे पिता हमको उछालते थे।’’ बचपन में माता-पिता हमको उछालते थे। हम उनकी गोद में गिरते थे। खिलखिलाते-हंसते थे। क्या उन्हें हम उनकी वृद्धावस्था में अपनी गोद में बैठा सकते हैं?

अधिकांश वृद्ध माता-पिता जीवन की सांझ में निराश हैं। पुत्र अपने काम में व्यस्त हैं। माता-पिता अकेले हैं। कुछेक को दवा-भोजन मिलता है लेकिन प्रेम नहीं। उन्हें वृद्धावस्था में संरक्षण की जरूरत है। लेकिन कमाऊ पुत्र डांट रहे हैं, वृद्ध व्यथित हैं। सरकारें वृद्धाश्रम बना रही हैं। यह राष्ट्रव्यापी समस्या है। इसका उपचार प्राचीन संस्कृति और वैदिक सभ्यता है। भारत के अपने इतिहास में माता-पिता के आदर व श्रद्धा वाला संस्कारी समाज था। वैसा ही संस्कारी समाज बनाने के लिए माता-पिता का संरक्षण पाना और वृद्धावस्था में उन्हें संरक्षण देना कोई बड़ा काम नहीं है। यह सांस्कृतिक प्रश्न है। सामाजिक प्रश्न है और पारिवारिक आनंद की प्राप्ति का मार्ग भी है।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश