डिजिटल संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप
-डॉ. आशीष वशिष्ठ
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नीट पेपर लीक को लेकर जेन-जी को संबोधित करते हुए जो पहला सेल्फी वीडियो अपलोड किया था, उसे मेटा ने हटा दिया था। यही वीडियो इंस्टाग्राम पर 24 घंटे के भीतर 300 मिलियन से अधिक बार देखा गया था। बाद में जब इस पर हंगामा हुआ, तब कंपनी ने सफाई देते हुए कहा कि वीडियो को जानबूझकर नहीं हटाया गया बल्कि यह एक तकनीकी खामी थी। इतनी बड़ी कंपनी का तकनीकी खामी का तर्क आसानी से गले नहीं उतरता। समर्थकों का आरोप है कि यह एक सोची-समझी साजिश है ताकि सरकार की बात करोड़ों युवाओं तक पहुंचने से रोका जा सके। फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की नीतियों, कंटेंट मॉडरेशन और डिजिटल जवाबदेही को लेकर नई बहस का विषय बन गया है।
वास्तव में, मेटा द्वारा प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो सेंसर करना भारतीय लोकतंत्र और डिजिटल संप्रभुता में सीधा हस्तक्षेप है। यह कोई सामान्य कंटेंट मॉडरेशन नहीं है बल्कि एक विदेशी प्लेटफॉर्म द्वारा यह तय करने की तानाशाही कोशिश है कि भारतीय नागरिक क्या देख सकते हैं। अमेरिकी सोशल मीडिया कंपनियां दुनियाभर में नैरेटिव तय करके सरकारें बदलने का खेल खेलती रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी की पोस्ट पर रोक लगाना इस बात का प्रमाण है कि उपभोक्ता जो देख रहे हैं, वह कंपनियां तय करती हैं।
सोशल मीडिया ने आम आदमी को बहुत बड़ी ताकत दी है। सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म के जरिए लोग बिना किसी रोक-टोक अपनी बात तुरंत लाखों लोगों तक पहुंचाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से संगठित रूप से निगेटिव चीज़ों को प्रचारित करने का प्रयास हो रहा है। सोशल मीडिया ने कई देशों में सरकारों के खिलाफ जन-आंदोलनों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई है। अरब क्रांति, श्रीलंका और बांग्लादेश के हालिया उदाहरण इसके बड़े प्रमाण हैं, जहां डिजिटल प्लेटफॉर्म ने जनता को एकजुट किया।
पिछले एक दशक में देश में विपक्ष और विभिन्न संगठनों द्वारा जितने भी आंदोलन हुए हैं, उनमें निगेटिव, फर्जी और भड़काऊ सामग्री प्रचारित-प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म का जमकर प्रयोग हुआ। हालिया कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में सोशल मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई। सोशल मीडिया पर बनी एक पार्टी के रातोंरात करोड़ों फॉलोअर बन गए। इसके आंदोलन के दौरान सुनियोजित सोशल मीडिया कैंपेन चलाए गए। जनता के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए सीजेपी ने उस वामपंथी सोशल मीडिया तंत्र की शरण ली है जो लंबे समय से राष्ट्रवादी आवाजों को दबाने के मिशन में जुटा है।
भारत में सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता को बिगाड़ने के प्रयास पिछले एक दशक से जारी हैं। फेक न्यूज़, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जनित डीपफेक और सीमा पार से संचालित होने वाले फर्जी अकाउंट्स के जरिए सुनियोजित ढंग से भ्रम और तनाव पैदा किया जा रहा है। सीएए विरोध प्रदर्शन और किसान आंदोलन दोनों ही प्रमुख घटनाओं के दौरान सोशल मीडिया के दुरुपयोग के कई गंभीर मामले सामने आए थे। इन आंदोलनों के दौरान डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल न केवल सूचना साझा करने के लिए हुआ बल्कि इसके जरिए भारी मात्रा में भ्रामक जानकारियां, अफवाह और नफरत फैलाने वाले कंटेंट प्रसारित किए गए। ये खुला तथ्य है कि वामपंथी और लिबरल इकोसिस्टम ने इन प्लेटफॉर्म्स का इस्तेमाल कर राष्ट्रवादी आवाजों को दबाने और अपनी सहूलियत का नैरेटिव गढ़ने का प्रयास किया, जिसके जवाब में भारत सरकार ने समय-समय पर राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के तहत कड़े कदम उठाए।
सोशल मीडिया ख़ासकर इंस्टाग्राम पर कॉक्रोच जनता पार्टी के प्रदर्शन और सोनम वांगचुक को उसके समर्थन के लिए जो ज्वार अचानक उठा था, अब उस विद्रूप और उच्छृंखल सुनामी लहरों का थमना शुरू हो गया है। इंस्टाग्राम पर उनके लिए समर्थन पूरी तरह से फर्जी और प्रायोजित था। इसके लिए तीन प्रोफ़ेशनल एजेंसियों ने पैसे देकर वृहद स्तर पर प्रचार अभियान चलाया। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु की तीन एजेंसियों ने सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को पैसे देकर पूरा नैरेटिव सेट करने की कोशिश की। भारत को श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल की तरह जलाने की पूरी तैयारी थी।
प्रदर्शन जारी रखने के लिए विभिन्न देशों से खाने-पीने और अन्य आर्थिक मदद दी जा रही थी। इस सुनियोजित षडयंत्र से जुड़ी तमाम रपट और जानकारियां पब्लिक डोमेन में उपलब्ध हैं। चूंकि इस षड्यंत्र का जाल सामने आ गया है, जिसका सार्वजनिक पर्दाफाश होना बहुत जरूरी है। यह खेल आगे न हो इसलिए सरकार और प्रशासन को चाहिए कि इन मामलों की गहराई से जांच करे और यह पता लगाये कि आख़िर कौन-सी ताकतें इस अभियान में मोटी फंडिंग कर भारत में माहौल खराब करने की कोशिश कर रही हैं?
चीन में फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम जैसे बड़े प्लेटफॉर्म पूरी तरह ब्लॉक हैं। उत्तर कोरिया में सोशल मीडिया पर पूरी तरह बैन है। आमलोग सिर्फ क्वांगमयोंग नाम के सरकारी इंट्रानेट तक सीमित रहते हैं। ईरान में फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब ब्लॉक हैं। ब्राजील ने एक्स को अस्थायी तौर पर बैन किया है। मिस्र, सऊदी अरब और सीरिया जैसे कई देशों में राजनीतिक कारणों से सोशल मीडिया पर कड़ी पाबंदियां हैं। इसके पीछे की वजह सूचना के प्रवाह को नियंत्रित करना, फेक न्यूज को रोकना है।
असल में, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जुड़ाव-संचालित एल्गोरिदम को प्राथमिकता देते हैं, तथ्यात्मक जानकारी की तुलना में सनसनीखेज और भ्रामक सामग्री को बढ़ाते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि फर्जी खबरें सच्ची खबरों की तुलना में छह गुना तेज़ी से फैलती हैं। सोशल मीडिया उपयोगकर्त्ता अक्सर ऐसी सामग्री से जुड़ते हैं जो उनकी पूर्व-मौजूदा मान्यताओं के अनुरूप होती है, जिससे गलत सूचना को बल मिलता है।
प्रधानमंत्री मोदी हर आयुवर्ग खासकर युवाओं में बेहद लोकप्रिय हैं। युवाओं के बीच उनकी लोकप्रियता और सीधे कनेक्ट करने की शैली अक्सर विपक्षी दलों को खटकती है। लोकप्रियता के प्रमाण के तौर पर सीजेपी प्रदर्शन के दौरान इंस्टाग्राम पर पीएम मोदी ने दो वीडियो पोस्ट किए थे, जिन पर करोड़ों में लाइक हैं, पीएम मोदी के इंस्टाग्राम पर फॉलोअर्स की संख्या 10.5 करोड़ के पार हो चुकी है। सीजेपी आंदोलन में सिर्फ एक सप्ताह के दौरान उनके एकाउंट में नए 40 लाख फॉलोअर्स जुड़े हैं। पेपर लीक जैसी गंभीर समस्या पर कड़ा रुख अपनाते हुए मोदी सरकार ने हाई पावर टास्क फोर्स और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन किया है। वहीं, युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले दोषियों को सख्त से सख्त सजा दिलाने के लिये पेपर लीक रोधी कानून में आवश्यक बदलाव कर उसे संसद से पास कराया है।
ये गंभीर चिंता का विषय है कि अगर मेटा विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री के साथ ऐसा व्यवहार कर सकती है तो क्या उन्होंने एक विशेष इंस्टा पोस्ट को वायरल नहीं किया होगा? क्या आप दावे से कह सकते हैं कि ये नहीं हुआ होगा? सोशल मीडिया का सारा नियंत्रण अमेरिकी कंपनियों के पास है। ये उनके लिए चुटकी बजाने जितना आसान काम है। भारतीय विज्ञापन राजस्व से अरबों कमाने वाले ये अमेरिकी प्लेटफॉर्म्स अब भारतीय लोकतंत्र को प्रभावित करने का काम कर रहे हैं, जिन पर मोदी सरकार को तुरंत सख्त ‘रेड लाइन्स’ तय करनी चाहिए। सीजेपी आंदोलन के दौरान 20 जुलाई को हुई हिंसा में अल्गोरिदम का भी बहुत बड़ा खेल है। इन विदेशी कंपनियों की मंशा साफ है। सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिए।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

