बदल गया है दिल्ली का राजनीतिक भूगोल
मनोज कुमार मिश्र
बांग्लादेश की सीमा से लगे राज्यों- त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, असम और बिहार इत्यादि राज्यों की तरह दिल्ली का भी राजनीतिक समीकरण पिछले कुछ सालों में बेहिसाब बदल गया है। इसी का परिणाम है कि चुनाव जीतने के हर तरकीब अपनाने के बावजूद 27 साल बाद पिछले साल फरवरी में हुए विधानसभा चुनाव में करीब तीन फीसदी के अंतर से भाजपा चुनाव जीत पाई। सीटों में काफी अंतर रहा। 70 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा को 48 और दस साल से प्रचंड बहुमत से सरकार में काबिज आम आदमी पार्टी( को 22 सीटें मिली। यह साबित हो चुका है कि बिहार से सीमांचल में मुस्लिम आबादी इतनी ज्यादा हो गई कि भाजपा की जीत तभी हो पाई जब एआईएआईएम जैसी मुस्लिम पार्टी ने पांच सीटें जीतीं और कई सीटों पर अच्छी संख्या में वोट हासिल पर पाई। यही स्थिति असम में भी पिछले चुनाव में हुई। दिल्ली में 2011 की जनगणना के हिसाब से मुस्लिम आबादी 15 फीसदी हैं। उससे पहले उनका औसत 12 फीसदी था। अब जब भी जनगणना होगी इसमें और बढ़ोतरी होना तय सा है।
आजादी के बाद से दिल्ली की आबादी का अनुपात या यूं कहें तो जातीय समीकरण बदलता रहा है। आजादी के बाद बड़ी संख्या में पाकिस्तान से हिंदू और सिख दिल्ली आए। उनमें कांग्रेस का भी समर्थन करने वालों की संख्या थी लेकिन ज्यादातर जनसंघ (आज की भाजपा) के समर्थक थे। यह मान लिया गया था कि पाकिस्तान से आए विस्थापित, सरकारी कर्मचारी, सवर्ण हिंदू और वैश्य इत्यादि जनसंघ के और दिल्ली देहात के गांव के रहने वाले, पुरानी दिल्ली के मुसलमान और गरीब बस्तियों में रहने वाले कांग्रेस के समर्थक होते हैं। दिल्ली में शुरू से ही रोजगार, कारोबार और पढ़ाई करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आते रहा हैं। अपना समर्थन बढ़ाने के लिए कांग्रेस की केन्द्र सरकार ने इमरजेंसी में अनेक पुनर्वास कालोनियां बसाईं और उस इलाके से कांग्रेस लगातार जीतती रही। 1982 के एशियाड खेलों के आयोजन में बड़े पैमाने पर दिल्ली में निर्माण हुए। उसके लिए बाहर से मजदूर आए और फिर बाहर से आने वालों का सिलसिला बढ़ता गया। माना गया कि दिल्ली की स्वाभाविक आबादी में होने वाली बढ़ोतरी के साथ-साथ हर साल करीब पांच साल अतिरिक्त आबादी दिल्ली में जुड़ जाती है। इसी की आड़ में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी दिल्ली में भी घुसपैठ करके वोट और नोट की राजनीति में दिल्ली के नागरिक बनते जा रहे हैं। उन्होंने कई नए इलाकों को मुस्लिम बहुल बना दिया है।
यह आबादी पहले आंख मूंदकर भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस को वोट करती रही। मुस्लिम आबादी के चक्कर में भाजपा के नेता झुग्गी और अनधिकृत कालोनियों में रहने वालों का विरोध करके एक बड़े वर्ग को अपना विरोधी बना लिया। पहले यह वर्ग कांग्रेस के साथ था, आप ने राजनीति ही इन्हीं लोगों को अपने पक्ष में करने से किया। उनका हर तरह से समर्थन करने के साथ-साथ आप ने मुफ्त की रेवड़ियां बांटी। कांग्रेस के नेता छुप-छुपाकर इनका समर्थन करते थे, आआपा के शीर्ष नेता अरविंद केजरीवाल समेत हर नेता इन घुसपैठियों का खुलेयाम समर्थन करते हैं। उल्टे-सीधे प्रयासों से आआपा ने कांग्रेस के समर्थक माने जाने वाले कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यक और पूर्वांचल(पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड आदि के मूल निवासी) के प्रवासियों को अपना स्थाई वोटर बना लिया। 2013 के विधानसभा चुनाव में दिल्ली के अल्पसंख्यकों ने गलतफहमी में कांग्रेस के वोट दिया। तब उन्हें लगा कि भाजपा को कांग्रेस हरा रही है। उसके बाद के दोनों विधानसभा चुनावों में इस वर्ग ने आप को वोट किया। आप रिकार्ड सीटों से सत्ता में रही।
आजादी के समय मुस्लिम आबादी पुरानी दिल्ली तक सिमटी हुई थी। जामिया मिल्लिया इस्लामिया बनने के काफी सालों बाद जामिया के आस-पास के नए और पुराने मोहल्ले मुस्लिम आबादी वाले हुए। बल्कि 2019 में नागरिक संशोधन एक्ट (सीएए) लागू किए जाने के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन उसी इलाके के शाहीन बाग में 15 दिसंबर, 2019 से 8 फरवरी,2020 तक चला। उस कानून में पड़ोसी देशों में रहने वाले हिंदू, सिख, बौध, जैन, पारसी और ईसाई को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था। कहा जा रहा था कि विरोध सीएए लागू होने से ज्यादा यूनिफार्म सिविल कोड (यूसीसी) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) लागू किए जाने से रोकने के लिए किया गया था। उत्तराखंड यूसीसी लागू करने वाला पहली राज्य बन गया है। इन दोनों को देश भर में कब लागू किया जाएगा कहा नहीं जा सकता है।
दिल्ली में पहले विधानसभा की चार सीटें ऐसी थीं जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा थी। पहले मुस्लिम आबादी का औसत दस फीसदी से नीचे थी। 2001 में 12 फीसदी हुआ और 2011 में यह 12 से बढ़कर अब 15 फीसद से ज्यादा हो गई है। नई जनगणना में यह और बढ़ने की संभावना है। 70 में से 17 सीटें ऐसा हैं जहां मुस्लिम मतदाता 20 फीसद से ज्यादा हैं। इनमें सीलमपुर, मटिया महल, बल्लीमरान, ओखला, मुस्तफाबाद, किराड़ी, चांदनी चौक, गांधीनगर, करावल नगर, विकास पुरी, ग्रेटर कैलाश, कस्तूरबा नगर, बाबरपुर, मोतीनगर, मालवीय नगर, सीमापुरी और छत्तरपुर शामिल हैं। यह संख्या लगातार बढ़ रही है। इस बदले अनुपात के चलते ही अनुसूचित जाति का औसत 18 से घटकर 17 हो गया। इसके चलते अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या 13 से घट कर 12 हो गई। दिल्ली के 70 में से 42 सीटों पर पूरबियों (पूर्वाचंल के प्रवासी) का वोट 20 फीसद से ज्यादा है। इसके चलते पिछले कई चुनावों से पूरबिए नेताओं को दिल्ली की राजनीति में महत्व मिलने लगा। सबसे पहले बिहार मूल के महाबल मिश्र को कांग्रेस ने पहले विधायक और सांसद का टिकट दिया। उसके बाद भाजपा ने भोजपुरी के लोकप्रिय कलाकार मनोज तिवारी को सांसद और प्रदेश का अध्यक्ष बनाया। 2020 के विधानसभा चुनाव के लिए पहले बिहार मूल के नेता कीर्ति आजाद को प्रदेश अध्यक्ष बनाना तय किया गया।
वे पहले भाजपा के दिल्ली से विधायक और बिहार से सांसद थे। अचानक कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता सुभाष चोपड़ा को अध्यक्ष और आजाद को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बना दिया गया। गुटबाजी में आजाद अलग-थलग हो गए, उन्हें दिल्ली कांग्रेस दफ्तर में नियमित बैठने के लिए कमरा तक नहीं दिया गया। बाद में चुनाव नतीजों के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और तृणमूल कांग्रेस में शामिल होकर लोकसभा के सदस्य बन गए। 2020 के विधानसभा चुनाव के कुछ समय बाद कांग्रेस के पूर्वांचल के सबसे लोकप्रिय चेहरा रहे पूर्व सांसद महाबल मिश्र भी कांग्रेस छोड़कर आआपा में शामिल हो गए। इस बार आआपा ने उन्हें पश्चिमी दिल्ली से लोक सभा उम्मीदवार बनाया। उनके पुत्र विनय मिश्र पहले से ही आआपा में शामिल होकर विधायक बने। इस बार वे भी पराजित हुए।
पुरबिए वोट तो प्रयास करने से कम-ज्यादा भाजपा को मिलते रहे हैं और भविष्य में भी मिलेंगे।
उत्तराखंड के प्रवासियों का लगातार समर्थन भाजपा को मिलता रहा है। उसमें कम विभाजन हुआ है। इसके अलावा भाजपा को परंपरागत वोट भी मिलते रहे हैं, अब समीकरण बदल गए हैं और लगातार बदलते जाएंगे। दिल्ली विधानसभा पिछले कई चुनावों में भाजपा केवल इसलिए हार रही थी कि उसके खिलाफ वोट करने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। भाजपा के लिए आसान विकल्प तो यह है कि वह असम और बिहार जैसे मजबूत तीसरा विकल्प बनाए जैसा अगले महीने होने वाले चुनाव में भाजपा असम का फार्मूला पश्चिम बंगाल में आजमाने की कोशिश कर रही है। यह विकल्प स्थाई नहीं हो सकता है। जिस तरह से नरेन्द्र मोदी की अगुवाई वाली केन्द्र सरकार के गृहमंत्री अमित शाह ने 31 मार्च,2026 तक देश को नक्सल मुक्त करने के अपने वादे को पूरा करके दिखाया, उसी तरह सरकार को देश को तय समय सीमा में विदेशी घुसपैठ से मुक्त करने का संकल्प लेना होगा।
देश की राजधानी दिल्ली इस बार तो हर संभव प्रयास करके भाजपा जीत ली है लेकिन आगे जीतना संभव नहीं होगा। तीन फीसदी का अंतर स्थाई नहीं माना जा सकता है। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि कई बार से लगातार दिल्ली की लोकसभा की सभी सीटें भाजपा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर जीतती रही है। अगर ऐसा होता तो पहले भी जीत होती। इस विधानसभा चुनाव में भी मिली जीत में एक बड़ा योगदान प्रधानमंत्री का नाम होगा, वोट समीकरण ठीक किए बिना स्थाई जीत संभव नहीं हैं। केन्द्र सरकार को अनुच्छेद 370 हटाने, तीन तलाक खत्म करने और सीएए जैसे कड़े फैसले लेने होंगे।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद

