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दीपोत्सवः भारत के प्रकाश अभिप्सु चित्त की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति

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दीपोत्सवः भारत के प्रकाश अभिप्सु चित्त की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति


हृदयनारायण दीक्षित

दीपोत्सव भारत के प्रकाश अभिप्सु चित्त की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है। हर बरस कार्तिक महीने की अमावस्या में रात्रि का गहन अंधकार दिक्काल को प्रकाश से भर देता है। सृष्टि के आदिकाल से मनुष्य प्रकाश का प्यासा है। वैदिक ऋषियों ने तमसो मा ज्योतिर्गमय के स्तुतिवाचन किए हैं। प्रकृति में प्रकाश के अनेक स्रोत हैं। सूर्य हैं। वे प्रकाशदाता हैं। मेरे मन में बार-बार आता है कि सूर्य प्रति दिवस नियत समय उग कर हम सबका कुशलक्षेम जानने के लिए ही आते हैं। प्रकाश के अनेक रूप हैं। प्रकाश के एक रूप सूर्य हैं। प्रकाश दिव्यता है। जहां-जहां दिव्यता है, वहां-वहां देवता।

भारतीय चिन्तन में प्रकाश और ज्ञान पर्यायवाची हैं इसीलिए प्रकाशदाता सूर्य उपास्य देवता हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में सूर्य-सविता से प्रकाश के वरण की प्रार्थना की गई है-तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्। अग्नि भी प्रकाशदाता हैं। ऋग्वेद में उन्हें कवि और परम विद्वान बताया गया है। लेकिन सूर्य की बात दूसरी है। वे आत्मसंयमी कर्मठ देवता हैं। सूर्य लाखों वर्षों से लगातार तप रहे हैं। सोचता हूं कि उनका ईंधन कब तक जलेगा। प्रकाश के लिए ईंधन की आवश्यकता होती ही है। प्रकाशदाता सूर्य जब आते हैं, तब ऊषा कहलाते हैं। जाते हैं तो प्रकाश और अंधकार के मिलन बिन्दु को संध्या कहते हैं। हमारे पूर्वजों ने अंधकार से भरी पूरी अमावस्या को प्रकाश से भर दिया। प्रकाश उत्सव मनाने के लिए दीप प्रतीक बनाया गया। दीप भारत के सांस्कृतिक मन की खूबसूरत धारणा है। प्रकाश है तो भारत का मन मनोरम होगा ही। मेरे लेखे प्रकाश में गंध भी होती होगी। प्रकाश में सात रंग होते हैं। सात दिन होते हैं। ध्वनि में सात सुर होते हैं। दीपावली की रात सात सुर, सात रंग सब एक साथ समवेत होते हैं।

मैं विश्वासपूर्वक प्रकाश को गंधपूर्ण नहीं कह सकता। लेकिन दीपावली के महापर्व में भारत का मन सुगंध से भर जाता है। अंग्रेजी के प्रतिष्ठित कवि शेली ने प्रकाश गंध का उल्लेख किया है। उन्होंने एडोनिस नाम की कविता में कहा है कि, ”व्हेन स्प्लेंडर इज चेंज्ड टू फ्रेगरेंस - जब प्रकाश की आभा गंध में बदल जाती है, तब जैसे नक्षत्रों ने अपना रूप बदल लिया है फूलों में।” यहां नक्षत्र की आभा का रूपांतरण हो गया है। और प्रकाश गंध बन गया है। दीप प्रकाश में भी गंध है। लेकिन थोड़ा अंतर जान पड़ता है। प्रकाश अक्षुण्ण है और प्रकाश में भी गंध होती है। हम भारतवासियों को प्रकाश गंध का अनुभव भले न हो लेकिन दीपोत्सव की गंध से सारा भारत मदमस्त रहता है। भारत का मन संस्कृति से बना है और संस्कृति भारत के मन से बनी है। हम भारतवासी हजारों वर्षों से दीपरस के प्यासे हैं।

प्रकाश रस या गंध अति सूक्ष्मतर है। सूक्ष्म सुंदर होता भी है। सुंदरता भी सूक्ष्म ही है। जान पड़ता है कि प्रकृति का सारा सौन्दर्य, आभा, प्रभा, सुगंध या सरस मधुमय चेतन सूक्ष्म ही है। यहां संग्रही लोगों के लिए कोई सुविधा नहीं। सूक्ष्म का संग्रह असंभव है। ऐसे प्रयास में चेतन फिसल जाता है और मृत काया ही हाथ आती है। तोता मैना या गीत गाता कोई सुंदर पक्षी मन भावन होता है। अपने साथ लाइए तो गीत छूट जाते हैं, सौन्दर्य फिसल जाता है। प्राणी आता है, प्राणों का छन्द खो जाता है। लेकिन दीप प्राणमय है। दीप हमारे पूर्वजों की कृति है। प्रकृति नहीं सुकृति। इसलिए संस्कृति। तुलसीदास मध्यकालीन महाकवि हैं। रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड वाला ज्ञानदीपक का प्रसंग गाने का मन करता है।

विज्ञान दीप है यह। यहां योग की अग्नि है ज्ञान का घृतरस है। बुद्धि विज्ञानरूपिणी है। तीन गुणों से युक्त कपास की बाती है लेकिन इसे बनाने में चित्त की तुरी-अवस्था का प्रयोग किया गया है-तूल तुरीय संवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि। फिर समता का दिया है। दीपक की लौ में “सो अहं अस्मि”-(मैं सम्पूर्णता का अंश हूं) की वृत्ति है। ऐसे में बने दीपक की प्रकाशधारा “दीपशिखा सोई परम प्रचण्डा” है। तुलसी के मानस का यह दीप भारतीय अन्तःप्रज्ञा और दर्शन का प्रतिनिधि है। मानस की यह पंक्तियां झमाझम प्रकाश देती है। दुनिया के सभी दर्शनवेत्ताओं को इन्हें ध्यान से पढ़ना चाहिए।

ज्योति राग हजारों बरस से भारतीय मन की प्यास है। यह प्यास असाधारण है। साधारण प्यास जलरस पीकर शान्त हो जाती है। ज्योति प्यास पीकर-पाकर और भी बढ़ती है। संत कवियों ने “ज्योति से ज्योति जलाने” की देशना दी है। बुद्ध ने सीधी मर्मभरी बात कही-“अप्प दीपो भव”। स्वयं दीप बनो। सच भी है। हमारे चित्त का तमस भीतर के दीप प्रज्जवलन से ही जाएगा। महादेवी के काव्य में भी प्रकाश बेचैनी है। विश्वकवित रवीन्द्रनाथ टैगोर ने सीधा दीप-बिम्ब रचा। गाया है “सूर्य अस्तांचल की ओर चले। ठिठके। अब प्रकाश का क्या होगा? नन्हें दीप ने अंगड़ाई ली। कहा-आप विश्राम करो। मैं तमस से लड़ूंगा। दूंगा प्रकाशदीप्ति।”

सुनते आये हैं कि वैदिक देवों को आज की तरह के विशेषाधिकार नहीं थे। वे अपने भक्तों को नियमविरूद्ध सहायता नहीं कर सकते थे। ऋग्वेद में उदात्त घोषणा है कि कर्म आलसी की सहायता देवता भी नहीं करते। वरूण नियमों का पालन कराने वाले देव हैं। हल उन्हें भी जोतना है। हमारे पूर्वज भी सुगंध प्रिय ही थे। वे न्न्यंबक देव से स्तुति करते हैं और उन्हें सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनम् बताते हैं। प्रकाश और गंध की प्यास अनूठी है। भारतीय संस्कृति में प्रकाशवाची शब्दों की भरमार है। ‘भा’ का अर्थ है प्रकाश। प्रकाश परम है। हम सबके भीतर वही प्रकाश उगे तो प्रतिभा। उपनिषद् में कहते हैं “वहां न सूर्य चमकता है, न चन्द्र या तारागण। सब उसी एक प्रकाश से प्रकाशित हैं।” उसका प्रकाश भा। भा की अनुकम्पा से प्रतिभा। आभा और प्रभा भी। हम सब भी भा-रत हैं। भारत यानी प्रकाशरत ज्योर्तिमय राष्ट्रीयता। अर्जुन को श्रीकृष्ण का प्रबोधन मिला। उसे प्रकाश मिला। साधारण प्रकाश नहीं-दिव्य सूर्य सहस्त्राणि। तब हजारों सूर्य एक साथ दीप्तिवान हो गये।

हमारे इन्द्रियबोध की सीमा है। कवि शेली के मन में तारों के फूल बनने की बात यों ही नहीं आई होगी। शापेन हावर भारतीय दर्शन से परिचित थे। यूनानी दर्शन के अनेक निष्कर्ष प्राचीन उपनिषद् वाक्यों से मिलते हैं। भारत के व्यापारी, विद्वान दुनिया घूम रहे थे। उनकी ज्ञानगंध का संस्पर्श यूनानी विद्वानों को भी मिला हो तो आश्चर्य क्या है? हिराक्लिटस् के ऊष्मा सम्बंधी विचार कठोपनिषद् के अग्नि प्रकरण से मिलते हैं। थेल्स के जल सम्बन्धी विचार ऋग्वेद के ‘आपः मातरम्’ की अनुगूंज जान पड़ते हैं। प्रकाश की दीप्ति का गंध रस बनना भौतिक विज्ञान के लिए शोध का विषय है लेकिन ऋग्वेद या उपनिषद् बोध में ऐसी बाते सरल व सहज हैं। ऋग्वेद के एक मंत्र में इन्द्र को ही सभी रूपों में रूप प्रतिरूप गाया गया है। उपनिषदों में अग्नि या वायु को भी सर्वत्र रूप प्रतिरूप देखा गया है। ‘वह एक’ ही अनेक रूपों में प्रत्यक्ष है। वही प्रकाश आभा है और वही सुगंधि। वही रस पूर्ण समग्रता है।

(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश