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संविधान की हत्या करने वालों का गजब तमाशा

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संविधान की हत्या करने वालों का गजब तमाशा


-डॉ. आशीष वशिष्ठ

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी बात बात पर संविधान और लोकतंत्र की हत्या का जुमला दोहराते हैं। लाल जिल्द वाली संविधान की किताब पकड़कर वो संविधान रक्षक होने का दावा भी करते हैं। संविधान, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आजादी, स्वतंत्रता आदि जैसी बातें जब राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई नेता करता है, तो वो अपने बुर्जुगों और नेताओं के कर्मों और कारनामों को भूल जाते हैं। संविधान और लोकतंत्र की हत्या के दर्जनों उदाहरण ऐसे हैं, जो कांग्रेस के शासन में हुए।

25 जून 1975 का दिन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में काला दिन के रूप में जाना जाता है। इस दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा और सत्ता खोने के डर की वजह से कैबिनेट से चर्चा किए बगैर देश में आपातकाल लागू करने की घोषणा की। इमरजेंसी की घोषणा करने के बाद इंदिरा गांधी सोने चली गई और पुलिस देश के कोने-कोने में विपक्ष के नेताओं और प्रदर्शनकारियों को जगा कर उन्हें गिरफ्तार करना शुरू कर दिया। उसी रात दिल्ली के अखबारों के प्रिंटिंग प्रेस की लाइनें काट दी गईं। सभी समाचार पत्रों पर पूर्व-सेंसरशिप लगा दी गई। संपादकों को समाचार, संपादकीय और तस्वीरें प्रकाशित करने से पहले सरकारी मंजूरी लेना आवश्यक था। समाचार पत्रों को उनके संपादकीय रुख और कवरेज के आधार पर 'मित्रवत', 'तटस्थ' या 'शत्रुतापूर्ण' के रूप में लेबल किया गया था।

आपातकाल के दौरान संसद ने अनेक संवैधानिक संशोधन पारित किये, जिनसे न्यायिक समीक्षा और संस्थागत जांच कमजोर हो गयी। तब इंदिरा गांधी के स्वाभाविक उत्तराधिकारी माने जा रहे संजय गांधी ने राजनीतिक ताकतों का खुलकर इस्तेमाल किया और वो 'छोटे सरकार' कहे जाने लगे। कई नीतियां और सरकारी गतिविधियां सीधे तौर पर संजय गांधी चला रहे थे, जिनमें एक था परिवार नियोजन। परिवार नियोजन के नाम पर आम लोगों के साथ ज्यादतियां हुईं और दिल्ली समेत देश के कई इलाकों में लोगों की जबरन नसबंदी करवा दी गई। इमरजेंसी के 21 महीनों में में 1.07 करोड़ नसबंदी ऑपरेशन किए गए। कई राज्यों ने आवश्यक सेवाओं तक पहुंच को नसबंदी से जोड़ दिया। अगर लोगों के दो या तीन से ज़्यादा बच्चे हैं और वे नसबंदी कराने से इनकार करते थे, तो उन्हें राशन, आवास, नौकरी, स्वास्थ्य सेवा और ऋण देने से मना कर दिया जाता था। इस अवधि के दौरान 25,962 सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों को समय से पहले सेवानिवृत्त कर दिया गया।

कांग्रेस नेताओं की तानाशाही प्रवृत्ति, संविधान के प्रति अनादर का भाव, स्वयं को श्रेष्ठ और संविधान और कानून से ऊपर मानने के प्रवृत्ति वाला रोग नया नहीं पुराना है। संविधान की हत्या और लोकतंत्र का गला घोटने का पाप कांग्रेस ने किया। आज राहुल गांधी, कांग्रेस के नेता या विपक्ष के कई नेता जब मोदी सरकार पर तानाशाही और संविधान की हत्या करने का आरोप लगाते हैं तो पता नहीं वो ये क्यों भूल जाते हैं कि इंदिरा गांधी ने निहत्थे साधु-संतों पर गोलियां चलवाई थी; इमरजेंसी थोपी थी; इंदिरा ने अकाल तख्त पर सेना की चढ़ाई थी। 1984 में निहत्थे और बेगुनाह सिखों को चुन-चुनकर कांग्रेसियों ने ही बेरहमी से मारा था।

अनुच्छेद 356 का सबसे ज्यादा दुरुपयोग कांग्रेस के शासन में हुआ। जब 90 बार से ज्यादा बार चुनी हुई सरकारों को गिरा दिया गया। इसमें से सिर्फ इंदिरा गांधी ने अनुच्छेद-356 का 50 बार इस्तेमाल किया। केरल की चुनी हुई वामपंथी सरकार को जवाहरलाल नेहरू पसंद नहीं करते थे। उन्होंने कुछ ही समय में चुनी हुई पहली सरकार को घर भेज दिया। तमिलनाडु के एमजीआर और करुणानिधि की सरकार को भी कांग्रेस ने ही बर्खास्त किया था। मोदी सरकार के 12 साल के शासन में एक भी ऐसा वाकया बता दीजिए जिसकी तुलना आप किसी कांग्रेस प्रधानमंत्री के कारनामों से कर सकें।

मोदी शासन में दिल्ली में किसान आंदोलनकारियों के उग्रता के जवाब में पुलिस ने एक डंडा भी नहीं चलाया। जबकि 12 जनवरी 1998 को मध्यप्रदेश के बैतूल जिले के मुलताई में मुआवजा मांग रहे किसानों पर कांग्रेस की दिग्विजय सिंह की सरकार ने गोली चलाई थी। उस समय पुलिस फायरिंग में 24 किसान मारे गए और 150 घायल हुए थे। जनवरी 2022 को पीएम मोदी पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले राज्य के दौरे पर थे एक फ्लाईओवर पर प्रदर्शनकारियों ने उनका रास्ता रोक लिया और 15-20 मिनट के लंबे इंतजार के बाद प्रधानमंत्री का काफिला वापस एयरपोर्ट की तरफ लौट पाया। उस समय पंजाब में कांग्रेस की सरकार थी। साजिशन पीएम की जान को खतरे में डाला गया।

दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने कहा,''ये जो नरेंद्र मोदी भाषण दे रहा है, छह महीने बाद ये घर से बाहर नहीं निकल पाएगा। हिन्दुस्तान के युवा इसको ऐसा डंडा मारेंगे, इसको समझा देंगे कि हिन्दुस्तान के युवा को रोजगार दिए बिना ये देश आगे नहीं बढ़ सकता।'' 19 अगस्त 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने एक सभा में कहा, 'तीनों चुनाव आयुक्त सुन लें। अभी नरेंद्र मोदी की सरकार है और आप उनके लिए काम कर रहे हैं। लेकिन एक दिन आएगा, जब बिहार और दिल्ली में 'इंडिया' गठबंधन की सरकार होगी, फिर हम आप तीनों को देखेंगे।'

4 फरवरी 2022 को यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेता अजय राय ने एक सभा में कहा था कि बोरी में नमक भर के तैयार रखिये आप सभी, योगी और मोदी को 7 मार्च को उसी बोरी में डाल कर जमीन के अंदर गाड़ देंगे। नमक का सही उपयोग यही है।” कांग्रेस पार्टी के 20 जून 2022 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर सत्याग्रह के दौरान कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुबोधकांत सहाय ने कहा कि, अगर प्रधानमंत्री हिटलर के रास्ते पर चलेंगे तो वह हिटलर की मौत मरेंगे।

ये चंद उदाहरण हैं। असल में, कांग्रेस के नेता संविधान, लोकतंत्र, संवैधानिक संस्थाओं, संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और कानून के प्रति अनादर का भाव रखते हैं। ये समय-समय पर प्रकट होता रहता है। वे राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, ईडी, सीबीआई, चुनाव आयोग यानी संविधान, संवैधानिक संस्थाओं और व्यक्तियों का अपमान अपनी शान समझते हैं। ऐसा करके वो ये साबित करना चाहते हैं कि वे देश, संविधान और कानून से ऊपर हैं।

गांधी परिवार और कांग्रेस के नेता आज भी किसी ने किसी तरह इमरजेंसी को सही ठहराने की कोशिश करतेहैं। ऐसा करते समय वो अपने नेताओं के कदमों पर ही चलते दिखाई देते हैं। आपातकाल के संदर्भ में कैथरीन फ्रैंक की किताब इंदिरा: द लाइफ ऑफ इंदिरा नेहरू गांधीके अनुसार, इंदिरा ने सिद्धार्थ शंकर रे से कहा, जब एक बच्चा पैदा होता है तो ये देखने के लिए कि बच्चा ठीक है या नहीं, हम उसे हिलाते हैं। भारत को भी इसी तरह हिलने की जरूरत है। बाद में एक इंटरव्यू में इंदिरा ने कहा था कि देश को बचाए रखने के लिए 'शॉक ट्रीटमेंट' की जरूरत थी। असल में, संविधान की किताब लेकर घूमने वाले नकली संविधान रक्षकों का चरित्र और चेहरा देशवासी पहचान चुके हैं। इसलिये चुनाव दर चुनाव उन्हें जनता शॉक देकर संविधान और लोकतंत्र की रक्षा कर रही है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैंं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश