गोहत्या की पक्षधरताः इतिहास, संस्कृति और अतीत को अपमानित करने का कृत्य
हृदयनारायण दीक्षित
तमिलनाडु सरकार भारतीय संस्कृति पर लगातार हमलावर है। हाई कोर्ट के उस फैसले के विरुद्ध राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट गई है, जिसमें कोर्ट ने गोहत्या पर पाबंदी लगाई थी। राज्य सरकार की तरफ से कहा गया है कि गाय वध किए जाने योग्य है। दूसरी तरफ, गाय भारतीय संस्कृति में मां की तरह आदरणीय हैं। वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक गाय की प्रतिष्ठा है लेकिन विचारधारा के प्रति दुराग्रही तत्व गोहत्या की बातें करते हैं।
मंत्रों के अर्थार्थ में अपनी-अपनी दृष्टियाँ होती हैं। वैदिक समाज गाय को अघन्या/अवध्य मानता था। ऋग्वेद (1.164.27) में वह अघन्या है (वध न किए जाने योग्य), सौभाग्यदायिनी है। गाय सम्पूर्ण वैदिक साहित्य की श्रद्धा केन्द्र है। अथर्ववेद में वह विराट ब्रह्म है। वह एक सूक्त (9.12) की देवता है, ‘‘गाय का ऊपरी जबड़ा द्युलोक है, निचला पृथ्वी, जीभ विद्युत है, दाँत मरुद्गण हैं, उदर भाग अंतरिक्ष है, दोनों कंधे मित्र और वरुण हैं आदि।’’
इसके पहले ऋग्वेद (8.101.215) में कहते हैं, ‘‘यह रुद्रों की माता, वसुओं की दुहिता, आदित्यों की बहन तथा अमृत की नाभि है। यह अवध्य है।’’ थोड़े शब्द बदल कर यही मंत्र अथर्ववेद में भी दुहराया गया है। यजुर्वेद भी गाय की महिमा से भरापूरा है। अथर्ववेद (12.4) में गाय को कष्ट पहुँचाने वालों का दण्ड वर्णित है, ‘‘जो गाय के कान को पीड़ा देते हैं वे मानो देवताओं पर प्रहार करते हैं। जो गौ पर परिचय चिह्न बनाते हैं, उनका धन नष्ट होता है। जो साज-सज्जा के लिए गौ बाल काटते हैं इस अपराध कर्म से उनकी संतानें मृत्यु को प्राप्त होती हैं। जिस गोपति के सामने कौआ गाय के बाल नोचता है, उसकी संतानें मर जाती हैं आदि।’’ फिर गोहत्या के बारे में (अथर्व 12.9) कहा, ‘‘गौघाती इस लोक और परलोक दोनों में दण्डनीय है।’’
ऋग्वेद (8.4.11) के एक मंत्र ‘उक्षात्राय, वशात्राय, सोमपृष्ठाय वेधसे’ के आधार पर मैकडनल और कीथ ने ‘वैदिक इंडेक्स’ में आर्यों को गोमांस भक्षी बताया है। यहाँ ऋषि अग्नि की प्रार्थना करते हैं। उन्होंने उक्षा का अर्थ बैल तथा वशा का अर्थ गाय लगाया। उनके मुताबिक अग्नि देव मांस भक्षी हैं। इन विद्वानों ने उक्षा और वसा के साथ प्रयुक्त ‘अन्नाय’ (अन्न) शब्दों पर गौर नहीं किया। सातवलेकर ने इसी मंत्र के अनुवाद में कहा, ‘‘अन्न को रस से सिंचित करने वाले, अन्न को रमणीय बनाने वाले सोमपीठ अग्नि की हम उपासना करते हैं।’’
भारत में अन्न मांस नहीं था। 10वें मंडल के 27वें सूक्त के मंत्र 17 को भी गोमांस भक्षण के पक्ष में इस्तेमाल किया जाता है। वे मंत्र 17 के ‘पीवान मेष’ का अर्थ भेड़ का पकाया जाना लगाते हैं। लेकिन लुडविग ने ‘पीवान मेष’ का अर्थ जल से फूला मेघ किया है। सत्यकेतु विद्यालंकार ने बताया, ‘‘ये मंत्र पहेलियों के रूप में हैं। यहाँ मेष का अर्थ भेड़ न होकर मेघ राशि अभिप्रेत है ... ‘पीवानंमेष’ का अर्थ मेष राशि के तारा पुंज को चमकाना है।’’ (प्राचीन भारतीय इतिहास का वैदिक युग, पृ. 213)
देवता मनुष्य की श्रद्धा है। मनुष्य अपना प्रिय खाद्य ही देवताओं को अर्पित करता है। गोदुग्ध वैदिक समाज का प्रिय पेय है। एक ऋषि अग्नि को दूध देना चाहते हैं लेकिन उनके पास ‘अघन्या गाय’ है नहीं। (ऋ. 8.102.19) ऋषि इन्द्र से कहता है, “अघन्या अपना दूध तुम्हें देती है।“ (9.1.9) इन्द्र ‘अघन्या रक्षक‘ (8.69.2) हैं तब वह और उनके अनुयायी आर्य अघन्या भक्षक कैसे होंगे? अघन्या अश्विनी देवों को भी दूध देती है। (1.164.27) गाएँ ऋग्वैदिक समाज में ही ऋषित्व की श्रेणी में पहुँच गईं। वे सोम की स्तुति करती हैं। अथर्व. में तो खैर वे देवता हैं ही। घी, अग्नि का अन्न है। वैदिक समाज जौ खाता था। अग्नि को भी जौ खिलाता था। वे गाय के दूध में सोम मिलाकर इन्द्र को भेंट करते थे। एक अन्न था धाना/धान्या। वे इन्द्र को धाना खिलाते थे। (ऋ 4.24.7)
ऋषि इन्द्र से कहते हैं, “प्रतिदिन पधारो, धाना खाओ।“ (ऋ 3.53.7) खेती के देवता पूषन थे। वे ‘करम्भ‘ प्रेमी हैं। मार्क्सवादी विचारक डॉ. रामविलास शर्मा ने बताया, करम्भ भुना हुआ अनाज था। करम्भ इन्द्र पूषन सबका प्रिय है। लेकिन घी के साथ मिलाकर तैयार ‘अपूप‘ अन्य देवों के साथ मरुतगण भी खाते हैं। (ऋ 3.52.7) मैकडनल और कीथ ने एक और वैदिक व्यंजन ‘पुरोडास‘ को ‘यज्ञ की रोटी‘ बताया है। ऋषि इन्द्र से कहते हैं, “प्रार्थना सुनो, पुरोडाइस खाओ।“ (ऋ 4.32.16) जो इन्द्र को पुरोडास खिलाता है, उसे इन्द्र पापों से बचाते हैं (ऋ 8.31.2) वैदिक समाज का जौ, धाना, करम्भ, अपूप, पुराडास, दूध और घी प्रेम चारों वेदों में व्याप्त है। गोमांस खिलाने का कहीं जिक्र ही नहीं। गाएं श्रद्धा हैं। अन्न खाद्य है। एक देवता बृहस्पति हैं। उन्होंने गायों को आकाश तक चरने भेजा (ऋ 2.24.14) मैकडनल ने लिखा, “वह बादलों में जाकर गायों को पुकारते हैं।“ (ऋ 10.68.12)
ऋग्वेद से लेकर महाभारत और वर्तमानकाल तक गाय भारतीय संस्कृति और परम्परा में पूज्य है। तुलसीदास ने रामजन्म के कारण में से एक कारण गोसंवर्द्धन बताया, “विप्र धेनु सुर संतहित लीन्ह मनुज अवतार।“ गीता में कृष्ण ने अर्जुन को अपने तमाम रूपों में से एक गाय रूप भी बताया। कृष्ण गोपाल थे। कौटिल्य ने भी गोसंरक्षण को जरूरी बताया। प्राचीन भारत गोपूजक था। गाय प्रतिष्ठा थी, गाय समृद्धि थी, गाय ऐश्वर्य थी। चैथी सदी के चीनी यात्री फाहियान व 7वीं सदी ह्वेनसांग के निष्कर्ष हैं कि भारत में मांसाहारी नहीं हैं।
गोहत्या के विरुद्ध भारत में अनेक आंदोलन हुए। गांधीजी ने गोहत्या बंदी को स्वराज का एक अंग बताया। गाय भारतीय अर्थव्यवस्था की माँ है, समाज व्यवस्था और सांस्कृतिक व्यवस्था का श्रद्धा केन्द्र। बावजूद इसके गोहत्या की पक्षधरता है। ऐसे तत्व गोमांस का पक्ष लेकर न जाने कैसा भारत बनाने का ख्वाब देख रहे हैं। अपने इतिहास, संस्कृति और अतीत को अपमानित करने का ऐसा कृत्य निन्दनीय है। विश्व इतिहास में किसी राष्ट्र में ऐसे आत्मघाती विचार नहीं मिलते। यह भारत का अपमान है। सनातन संस्कृति और परम्परा पर बेहूदा प्रहार है।
(लेखक, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

