एसआईआर पर संग्राम, कांग्रेस की चुनावी हार पर सवाल
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विवेक शुक्ला
ये किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि चुनाव जीतने के लिए जनता का विश्वास जीतना पड़ता है। इसके लिए राजनीतिक दलों को लोगों के बीच जाना होता है, उनकी समस्याएं समझनी होती हैं और अपनी नीतियों पर भरोसा पैदा करना होता है। लेकिन जब कोई पार्टी लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना करती है, तो उसके सामने आत्ममंथन का सवाल भी खड़ा होता है। कांग्रेस आज इसी स्थिति से गुजर रही है। राहुल गांधी लगातार आरोप लगा रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी को जनता नहीं बल्कि चुनाव आयोग चुनाव जितवा रहा है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस की दशकों पुरानी चुनावी गिरावट के लिए केवल चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है?
राहुल गांधी के आरोपों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तक निशाने पर हैं। कांग्रेस का आरोप है कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ दल के पक्ष में काम कर रहा है। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है लेकिन गंभीर आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण भी होने चाहिए। राजनीतिक बयानबाजी से किसी आरोप की सत्यता साबित नहीं होती।
भाजपा की ओर से कांग्रेस को जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने उसके चुनावी इतिहास का हवाला दिया। उनका सवाल था कि यदि चुनाव आयोग और एसआईआर ही कांग्रेस की पराजय के कारण हैं तो उन राज्यों में पार्टी की कमजोरी का क्या कारण है, जहां वह लंबे समय से सत्ता से बाहर है?
अमित शाह के बयान पर कांग्रेस नेताओं ने अलग-अलग सवाल उठाए। जयराम रमेश ने पूछा कि कितने घुसपैठियों की पहचान हुई और कितनों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए या उन्हें देश से बाहर निकाला गया। पवन खेड़ा ने जंतर-मंतर पर भारी पुलिस बल की तैनाती पर सवाल खड़ा किया। के.सी. वेणुगोपाल ने शाह के बयान को अगले चुनाव के परिणाम की अग्रिम घोषणा बताते हुए भाजपा पर चुनाव प्रभावित करने का आरोप लगाया।
इन प्रतिक्रियाओं के बीच कांग्रेस की चुनावी गिरावट पर बहस पीछे छूट गई। एसआईआर और घुसपैठियों से जुड़े सवाल महत्वपूर्ण हो सकते हैं लेकिन कांग्रेस को अपनी राजनीतिक कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। अमित शाह का मुख्य तर्क यही था कि पार्टी अपनी हार के कारणों की समीक्षा करे।
चार दशक से बहुमत से दूर कांग्रेस
कांग्रेस को लोकसभा में अपने दम पर पूर्ण बहुमत मिले चार दशक से अधिक समय बीत चुका है। वर्ष 1984 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद पैदा हुई असाधारण परिस्थितियों में पार्टी ने 543 निर्वाचित सीटों में से 404 सीटें जीती थीं। उसके बाद कांग्रेस कभी अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल नहीं कर सकी।
राजीव गांधी के नेतृत्व में पार्टी 1989 और 1991 के चुनावों में भी बहुमत से दूर रही। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 2004 और 2009 में वापसी की। 2004 में उसने 145 और 2009 में 206 सीटें जीतीं। सहयोगियों के साथ केंद्र में सरकार भी बनाई। लेकिन इसके बाद पार्टी का प्रदर्शन तेजी से गिरा।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस केवल 44 सीटों पर सिमट गई। 2019 में उसे 52 सीटें मिलीं, जबकि 2024 में उसकी सीटें बढ़कर 99 हो गईं। यह सुधार जरूर था लेकिन पार्टी बहुमत से बहुत दूर रही। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कांग्रेस की चुनावी चुनौतियां एसआईआर से बहुत पुरानी हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण को उसकी दशकों की राजनीतिक गिरावट का एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता।
राज्यों में कमजोर होता जनाधार
कभी देश के बड़े हिस्से में सरकार बनाने वाली कांग्रेस आज कई राज्यों में कमजोर स्थिति में है। तमिलनाडु में कांग्रेस का अपना मुख्यमंत्री बने छह दशक हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल में भी वह लंबे समय से सत्ता से बाहर है। उत्तर प्रदेश में पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंच सकी है। गुजरात और ओडिशा जैसे राज्यों में भी उसे लंबे समय से सत्ता से बाहर रहना पड़ा है।
इन राज्यों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं। कहीं क्षेत्रीय दलों का प्रभाव बढ़ा है तो कहीं भाजपा ने अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत की है। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह इन बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप अपना संगठन और नेतृत्व तैयार करे। केवल पुराने राजनीतिक गौरव के सहारे जनता का भरोसा वापस नहीं पाया जा सकता।
राजनीति केवल प्रदर्शन से नहीं चलती
राजनीतिक विश्लेषक बिक्रम उपाध्याय मानते हैं कि अमित शाह ने कांग्रेस को यह सही नसीहत दी कि दिल्ली में कुछ हजार लोगों की भीड़ जुटाने से चुनाव नहीं जीते जा सकते। राजनीतिक दलों को गांवों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों तक पहुंचना पड़ता है। जनता की समस्याओं को समझना और उनके समाधान के लिए काम करना जरूरी है।
यह बात कांग्रेस ही नहीं, हर राजनीतिक दल पर लागू होती है। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। चुनाव आयोग की निष्पक्षता और मतदाता सूची की शुद्धता पर सवाल उठाना भी विपक्ष का अधिकार है। लेकिन विरोध के साथ संगठन मजबूत करना और जनता के बीच लगातार काम करना भी जरूरी है।
कांग्रेस की चुनौती यह है कि वह अपनी चुनावी पराजयों की जिम्मेदारी तय करे। क्या पार्टी का संगठन कमजोर हुआ है? क्या उसका नेतृत्व लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतर रहा है? क्या उसकी नीतियां नए मतदाताओं को आकर्षित कर पा रही हैं? इन सवालों पर गंभीर चर्चा के बिना राजनीतिक वापसी कठिन होगी।
आत्ममंथन भी जरूरी
भाजपा हाल के स्थानीय निकाय और ग्राम समिति चुनावों में अपने प्रदर्शन को जनता के समर्थन के रूप में पेश कर रही है। कांग्रेस को भी इन नतीजों और अपने प्रदर्शन का तथ्यों के आधार पर विश्लेषण करना चाहिए। हर चुनाव के परिणाम को उसके स्थानीय और राजनीतिक संदर्भ में समझना जरूरी है।
राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व के सामने दो चुनौतियां हैं। पहली, चुनाव आयोग के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणों के साथ सामने रखना। दूसरी, अपनी चुनावी कमजोरियों को स्वीकार कर संगठन में सुधार करना। ये दोनों काम एक साथ किए जा सकते हैं।
लोकतंत्र में किसी भी दल को जीत का स्थायी अधिकार नहीं मिलता। जनता का विश्वास कामकाज, नेतृत्व और नीतियों से अर्जित करना पड़ता है। कांग्रेस यदि अपनी राजनीतिक जमीन वापस पाना चाहती है तो उसे आरोपों से आगे बढ़कर आत्ममंथन करना होगा। चुनाव आयोग पर सवाल उठाना एक राजनीतिक विकल्प हो सकता है लेकिन अपनी कमजोरियों को दूर करना उसकी जरूरत है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार और जाने-माने स्तंभकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

