दिल्ली में कांग्रेस किसी चमत्कार के भरोसे
-मनोज कुमार मिश्र
दिल्ली भले केन्द्र शासित प्रदेश है। कुल 1483 वर्ग मीटर का एक शहर है लेकिन देश की राजधानी होने के चलते दिल्ली का राजनीतिक समीकरण पूरे देश का दिशासूचक माना जाता है। दिल्ली विधानसभा में पिछले फरवरी से भाजपा का बहुमत है यानी दिल्ली सरकार में भाजपा का शासन है। जिन मतदाताओं के समर्थन से कांग्रेस परंपरा तोड़ कर साल 1998 से 2012 तक शासन में रही, उन्हीं मतदाताओं के समर्थन से आम आदमी पार्टी (आआपा) दस साल प्रचंड बहुमत से दिल्ली सरकार में काबिज रही। यह माना जाता रहा है कि आआपा न तो कार्यकर्ताओं की पार्टी है और न उसकी कोई विचारधारा है। वह तो पार्टी के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल की पार्टी है जो मुफ्त की योजनाओं के लाभार्थियों की पार्टी है। एक बार पराजित होते ही इसके बिखरने का खतरा बना। अगर पंजाब में आआपा की सरकार न होती तो यह पार्टी तेजी से बिखर जाती।
समस्या यह है कि कांग्रेस आआपा की जगह यानी विकल्प बनने को तैयार नहीं लगती। न तो संगठन दिखता है और न ही जमीन से जुड़े नेता। शीला दीक्षित के समय के कई नेता या तो बूढ़े हो गए या दुनिया से विदा हो गए। जो बच गए उनमें कई पार्टी छोड़ गए या घर बैठ गए। कुछ से तो सत्ता का नशा (हैंगओवर) उतर ही नहीं रहा है।
दिल्ली में कांग्रेस ने साल 2008 में आखिरी बार विधानसभा चुनाव जीता था। उस चुनाव में जीत के साथ शीला दीक्षित लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनी थी। उस चुनाव में कांग्रेस की जीत का एक कारण तो भाजपा की ओर से आखिरी समय में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बदलना माना गया लेकिन एक बड़ा कारण 2006-7 का दिल्ली का परिसीमन भी था। शीला दीक्षित के समर्थन से उनके करीबी वरिष्ठ कांग्रेस नेता चतर सिंह ने जी जान से परिसीमन आयोग के साथ मिलकर दिल्ली का ऐसा परिसीमन कराया जिससे भाजपा के खांटी इलाके 15 विधानसभा सीटों में सिमट गए।
दिल्ली में विधानसभा की 70 सीटें हैं। चुनाव आयोग के मतदाता जांच अभियान यानी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) में काटे जा रहे वोटरों को कांग्रेस मुद्दा नहीं बना पाई । पिछले दिनों उन्होंने संवाददाता सम्मेलन करके बताया कि 2025 विधानसभा चुनाव के समय कुल एक करोड़ 56 लाख 26 हजार 756 वोटर थे। इसमें 94 लाख 34 हजार 638 वोट पड़े। इसमें यदि आयोग के वर्तमान आंकड़े जिसमें एक करोड़, 45 लाख 10 हजार 299 मतदाता घटा दें तो फिर 11 लाख 20 हजार 495 मतदाता कहां गए?
किसी को नोटिस नहीं मिली। कोई ठोस प्रमाण नहीं दिया गया और एक दल के इशारे पर जिस विधानसभा में लगा कि भाजपा की स्थिति कमजोर है और विपक्ष मजबूत तो वहां के वोटर को सीधे कम कर दिया गया। उन्होंने साल 1993 से लेकर अभी तक के वोटरों की संख्या, कितने वोट डाले और कितने फीसदी मतदान पड़े, इसके सिलसिलेवार आंकड़े प्रस्तुत किए। चतर सिंह ने बताया कि दिल्ली में जनगणना के हिसाब से 68 से 70 फीसदी युवा हैं। यहां एक करोड़ 61 लाख 39 हजार 364 सौ वयस्क मतदाता होना चाहिए। एसआईआर के बहाने इन्होंने 47 लाख 56 हजार 722 सौ वोटरों के नाम काट दिए। तर्क दिया गया कि इसका फार्म नहीं आया या वे अपना पुख्ता कागजात दिखा नहीं पाए। उनका दावा था कि जिस तरह महाराष्ट्र में नौ लाख और बीते विधानसभा चुनाव से पहले बिहार में करीब 65 लाख मतदाताओं के नाम काट दिए गए। उसी तरह दिल्ली में नाम काटे जा रहे हैं।
देशभर में कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी दल इसे मुद्दा बनाए हुए हैं लेकिन दिल्ली में संगठन के अभाव में यह मुद्दा बन ही नहीं रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी के जिस जेन जी आंदोलन से भाजपा की अगुवाई वाली सरकार को धाराशायी करने का विपक्ष दावा कर रहा है, उसी जेन जी ने दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में भाजपा समर्थित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को इस बार भी जीत दिला कर विपक्ष के दावे की कलई खोल दी। आआपा को तो हर स्तर पर भाजपा की ताकत बढ़ने और कांग्रेस की जमीन खिसकने का अंदाजा साल 2024 के लोकसभा चुनाव में हो गया था। उस चुनाव में कांग्रेस का आआपा से सीटों का तालमेल था। सात में से तीन सीट कांग्रेस और चार आआपा लड़ी। चुनाव में सभी सातों सीटें भाजपा लगातार तीसरी बार जीती। कांग्रेस को 18.50 फीसद वोट मिले। माना जा रहा है कि कांग्रेस के समर्थक वोट पर दिल्ली में राज कर रही आआपा को लग रहा है कि उसके साथ तालमेल करने से कांग्रेस मजबूत हो जाएगी और देर-सबेरे आआपा को ही नुकसान पहुंचाएगी। इसलिए उसने विधानसभा चुनाव अकेले चुनाव लड़ना तय किया। चुनाव में भाजपा को जीत मिली और 27 साल बाद दिल्ली की सत्ता में उसकी वापसी हुई। 70 सदस्यों वाली विधानसभा में भाजपा 45.86 वोट के साथ 48 और आआपा 43.57 फीसद वोट के साथ 22 सीट जीत पाई। कांग्रेस को करीब छह फीसद वोट मिले।
चुनाव नतीजों के बाद भाजपा के साथ-साथ कांग्रेस के नेता प्रसन्न थे। उन्हें लगता था कि आआपा के पराजय के साथ कांग्रेस की वापसी होगी लेकिन अभीतक एक भी कार्यक्रम ऐसा न हुआ जिससे लगे कि कांग्रेस दिल्ली में वापसी का कोई प्रयास कर रही है।
दिल्ली में कांग्रेस एक दिन में हाशिए पर नहीं पहुंची, सालों से ठोस संगठन बनाने पर काम नहीं हुआ। इतना ही नहीं गुटबाजी को खूब हवा दी गई। साल 2019 में शीला दीक्षित ने आआपा से समझौते का विरोध किया तो उन्हें प्रदेश अध्यक्ष के साथ जबरन लोकसभा चुनाव लड़वाया गया। बीमारी की हालत में चुनाव लड़कर वे पराजित हुईं और कुछ समय बाद उनका निधन हो गया।
सत्ता सुख भोगने की आदत पड़ जाने के चलते एक ही चुनाव की हार ने कांग्रेस को संकट में ला दिया। अपनी चिंता में लगे नेताओं ने पार्टी को हाशिए पर ला दिया। साल 2013 के विधानसभा चुनाव की हार के बाद पार्टी बिखरती गई। साल 2015 के चुनाव के समय प्रदेश अध्यक्ष थे अरविंद सिंह लवली और मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया गया अजय माकन को। इससे नाराज लवली ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। अब लवली भाजपा में हैं। उसके बाद प्रदेश अध्यक्ष बने अजय माकन ने साल 2019 के लोकसभा चुनाव में आआपा से तालमेल की मुहिम चलाई। बताया गया कि कांग्रेस का एक वर्ग सात में से दो सीटों पर भी समझौता करने को तैयार हो गया था। जिस पार्टी ने कांग्रेस को हाशिए पर पहुंचाया, शीला दीक्षित ने उससे समझौता करने का भारी विरोध किया। समझौता न होने पर अजय माकन भारी मन से नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़कर हारे। उन्होंने भी बिना प्रदेश अध्यक्ष तय हुए बीमारी के बहाने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ दी। वही अजय माकन आज राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं। उन्हें लोकसभा चुनाव हारने के बाद पहले हरियाणा और वहां से पराजित होने के बाद कर्नाटक से राज्यसभा का सदस्य बनाया गया। वे पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं।
विधानसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस का दिल्ली में प्रयोग ही चल रहा है। साल 2020 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली और कांग्रेस का वोट औसत घटकर 4.26 हो गया। साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जुलाई में शीला दीक्षित के निधन के बाद चौधरी अनिल कुमार प्रदेश अध्यक्ष बने। लवली थोड़े ही समय भाजपा में रहकर कांग्रेस में लौट गए और साल 2019 का लोकसभा चुनाव पूर्वी दिल्ली सीट से मजबूती से लड़े। उन्हें साल 2023 में अनिल कुमार के इस्तीफा देने पर दोबारा अध्यक्ष बनाया गया लेकिन साल 2024 के लोकसभा चुनाव में टिकट बंटवारे में अपनी भूमिका न होने से नाराज होकर उन्होंने फिर कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन पकड़ लिया। अब विधायक बनने के बाद भाजपा ने उन्हें यमुना पार विकास बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया है।
उसी दौरान बड़ी तादाद में कांग्रेस के अनेक नेता भाजपा में शामिल हुए। अब आर्थिक रूप से संपन्न पूर्व विधायक देवेन्द्र यादव दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष हैं। वे केवल पार्टी चलाने की औपचारिकता ही कर पा रहे हैं। शीला दीक्षित के साथ की पीढ़ी या तो समाप्त हो गई या निष्प्रभावी हो गई। नए प्रभावशाली नेता तैयार ही नहीं हो पाए। दिल्ली में कांग्रेस विपक्षी दल की भूमिका में नहीं आ पा रही है इसीलिए आआपा अभी भी दिल्ली की पहले नंबर की विपक्षी पार्टी बनी हुई है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अगुवाई में भाजपा ने गुजरात, मध्य प्रदेश में कांग्रेस को सालों से सत्ता से बेदखल रखा हुआ है। आने वाले कई सालों में तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार और पंजाब इत्यादि में उसकी ताजपोशी की संभावना नहीं दिख रही है।
यह प्रमाणित हो चुका है कि देशभर में भाजपा के वोटबैंक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रभाव से नया वोट बैंक जुड़ा है, जिसने 27 साल बाद दिल्ली में भाजपा की सत्ता में वापसी कराई और अनेक राज्यों में भाजपा की लगातार सरकारें बनवाई हैं। इसने ऐसे हालात बना दिए हैं कि कांग्रेस के लिए सही मायने में दिल्ली दूर हो गई है। आआपा के सत्ता से बाहर होने के बावजूद वह अपने पुराने समर्थकों को वापस कांग्रेस से जोड़ने का कोई प्रयास करती नहीं दिख रही है। इसके चलते देश की राजधानी दिल्ली में कांग्रेस की वापसी की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही है।
(लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

