विकसित भारत के लिए सिविल सेवा परीक्षा में चाहिए नया प्रतिमान
-अभिषेक शुक्ल
भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की वर्तमान संरचना में औपनिवेशिक प्रशासनिक व्यवस्था की ऐतिहासिक छाप दिखाई देती है। व्यापक सामान्य ज्ञान, अत्यधिक विस्तृत पाठ्यक्रम, स्मृति-आधारित तैयारी और वर्णनात्मक उत्तर लेखन पर निर्भरता इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं। यह व्यवस्था उस समय की प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए उपयोगी रही होगी लेकिन आज की जटिल और तकनीक प्रधान शासन व्यवस्था में इसके पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता स्पष्ट है।
भारत 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है। इस परिवर्तन की सफलता केवल आर्थिक विकास, आधुनिक आधारभूत संरचना और तकनीकी प्रगति पर निर्भर नहीं होगी। शासन की गुणवत्ता, प्रशासनिक संस्थाओं की क्षमता एवं योग्य मानव संसाधन का चयन भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा। इस दृष्टि से भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की वर्तमान संरचना पर गंभीर और व्यापक पुनर्विचार आवश्यक है।
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में सिविल सेवाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सिविल सेवा परीक्षा केवल एक प्रतियोगी परीक्षा नहीं बल्कि भविष्य के प्रशासनिक नेतृत्व के चयन की प्रक्रिया है। चयन की यह प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो इक्कीसवीं सदी और विकसित भारत की प्रशासनिक आवश्यकताओं के अनुरूप प्रतिभा, क्षमता, विशेषज्ञता और निर्णय-कौशल की पहचान कर सके।
स्मृति से क्षमता के मूल्यांकन की ओर
आज एक सिविल सेवक का कार्य केवल नियमों को लागू करना नहीं है। उसे जटिल नीतिगत समस्याओं का विश्लेषण करना है, उपलब्ध आंकड़ों से निष्कर्ष निकालना है, विभिन्न हितधारकों के बीच समन्वय स्थापित करना है, सीमित संसाधनों में प्राथमिकताएं निर्धारित करनी हैं और संकट की परिस्थितियों में त्वरित तथा विवेकपूर्ण निर्णय लेना है। इन क्षमताओं का मूल्यांकन केवल विस्तृत पाठ्यक्रम को याद करके वर्णनात्मक उत्तर लिखने की क्षमता से नहीं हो सकता।
मुख्य परीक्षा की वर्णनात्मक प्रकृति में परीक्षक-भिन्नता की संभावना स्वाभाविक रूप से बनी रहती है। अलग-अलग परीक्षकों द्वारा समान उत्तर की गुणवत्ता की व्याख्या और मूल्यांकन में अंतर हो सकता है। भाषा, प्रस्तुति, लेखन शैली, उदाहरणों के चयन और उत्तर की संरचना जैसे तत्व भी अंक निर्धारण को प्रभावित कर सकते हैं। उच्च स्तरीय चयन प्रक्रिया में इस प्रकार की व्यक्तिपरकता को न्यूनतम करना आवश्यक है।
इसका समाधान वर्णनात्मक परीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने में नहीं बल्कि उसके स्वरूप को अधिक योग्यता आधारित बनाने में है। लिखित परीक्षा में अभ्यर्थी की समस्या-समझ, तार्किक विश्लेषण, उपलब्ध सूचना के उपयोग, प्राथमिकता निर्धारण, प्रमाण-आधारित निष्कर्ष और व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने की क्षमता को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
इक्कीसवीं सदी में सूचना तक पहुंच का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। इंटरनेट, डिजिटल भंडार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने तथ्यात्मक जानकारी तक पहुंच को पहले की तुलना में अत्यंत सरल बना दिया है। ऐसी स्थिति में केवल तथ्यों को स्मरण रखने की क्षमता को अत्यधिक महत्व देना चयन प्रक्रिया को उस वास्तविक क्षमता से दूर कर सकता है जिसकी आधुनिक प्रशासन में आवश्यकता है।
आधुनिक संज्ञानात्मक विज्ञान और मनोविज्ञान ने मानव की बौद्धिक क्षमताओं के मूल्यांकन के लिए अनेक उपयोगी अवधारणाएं विकसित की हैं। संज्ञानात्मक लचीलापन, तार्किक विश्लेषण, निर्णय क्षमता, समस्या-समाधान, सीखने की क्षमता और सूचना-प्रसंस्करण जैसी क्षमताओं का वैज्ञानिक परीक्षण सिविल सेवा चयन को अधिक योग्यता-केंद्रित बना सकता है।
परीक्षा में वास्तविक प्रशासनिक परिस्थितियों पर आधारित परिस्थितिजन्य परीक्षण का व्यापक उपयोग किया जा सकता है। अभ्यर्थियों के सामने ऐसी परिस्थितियां रखी जा सकती हैं जिनमें सीमित समय, अधूरी सूचना, परस्पर विरोधी हित और अनेक प्रशासनिक विकल्प मौजूद हों। इसके माध्यम से केवल अभ्यर्थी के ज्ञान का नहीं बल्कि उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया, प्राथमिकता निर्धारण और समस्या-समाधान क्षमता का भी मूल्यांकन किया जा सकता है।
ब्रिटेन की चयन प्रणाली में परिस्थितिजन्य निर्णय परीक्षण, कार्य-सामग्री परीक्षण और मूल्यांकन-केंद्र आधारित अभ्यास जैसे माध्यमों का उपयोग इसी प्रकार की क्षमताओं के आकलन के लिए किया जाता है। अभ्यर्थी को प्रशासनिक परिस्थितियों के अनुरूप कार्य दिए जाते हैं, जिनमें उपलब्ध सूचनाओं का विश्लेषण, प्राथमिकता निर्धारण और निर्णय क्षमता का परीक्षण होता है।
अमेरिकी व्यवस्था में भर्ती अधिक पद-विशिष्ट है। अलग-अलग पदों और संस्थाओं की आवश्यकताओं के अनुसार विशिष्ट ज्ञान, तार्किक क्षमता और व्यावहारिक योग्यता को महत्व दिया जाता है। इससे यह संकेत मिलता है कि आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में प्रत्येक भूमिका के लिए समान प्रकार की प्रतिभा और समान प्रकार के परीक्षण को अनिवार्य मानना आवश्यक नहीं है।
सामान्यज्ञता के साथ विशेषज्ञता की आवश्यकता
सिविल सेवा परीक्षा में सामान्यज्ञ अभिविन्यास की अपनी उपयोगिता है। एक अधिकारी को प्रशासन, संविधान, अर्थव्यवस्था, समाज और सार्वजनिक नीति की व्यापक समझ आवश्यक है। लेकिन इक्कीसवीं सदी के प्रशासन में व्यापक दृष्टि के साथ विशेषज्ञता का महत्व भी तेजी से बढ़ रहा है।
साइबर सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, वित्तीय प्रौद्योगिकी, ऊर्जा नीति, नगरीय नियोजन और डिजिटल प्रशासन जैसे क्षेत्रों में निर्णय लेने के लिए गहन विषयगत ज्ञान की आवश्यकता होती है। इसलिए भविष्य की सिविल सेवा में सामान्य प्रशासनिक आधार और विशेषज्ञ योग्यता के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक होगा।
विशेषज्ञता को महत्व देने का अर्थ सामान्य प्रशासनिक दृष्टिकोण को समाप्त करना नहीं है। इसका अर्थ यह है कि व्यापक प्रशासनिक क्षमता के साथ अभ्यर्थी की विशिष्ट बौद्धिक और पेशेवर क्षमता को भी पहचानने की व्यवस्था विकसित की जाए।
फ्रांस का अनुभव इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। वहां पारंपरिक राष्ट्रीय प्रशासन विद्यालय की व्यवस्था में कठोर लिखित और मौखिक चयन के माध्यम से प्रशासनिक प्रतिभाओं की पहचान की जाती थी। बाद में इस व्यवस्था की सामाजिक प्रतिनिधित्व और व्यावहारिकता के संदर्भ में आलोचना हुई। वर्ष 2022 में इसके स्थान पर राष्ट्रीय लोक सेवा संस्थान की स्थापना तथा चयन प्रक्रिया में सामाजिक विविधता, व्यावहारिक अनुभव और क्षेत्रीय कार्य पर बढ़ता जोर यह दर्शाता है कि सिविल सेवा चयन प्रणाली को समय के साथ निरंतर विकसित करना पड़ता है।
भारत के लिए इन देशों की नकल करना उचित नहीं होगा। प्रत्येक देश की संवैधानिक व्यवस्था, प्रशासनिक परंपरा और सामाजिक संरचना अलग है। फिर भी इन व्यवस्थाओं से एक महत्वपूर्ण सिद्धांत ग्रहण किया जा सकता है। प्रशासनिक प्रतिभा के चयन में आधुनिक मनोमितीय परीक्षण, योग्यता-मूल्यांकन, परिस्थितिजन्य परीक्षण और पद-विशिष्ट मूल्यांकन का अधिक उपयोग किया जा सकता है।
साक्षात्कार से वैज्ञानिक मूल्यांकन तक
सिविल सेवा चयन के साक्षात्कार चरण में भी इसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता है। पारंपरिक साक्षात्कार में चयन मंडल की धारणा, अभ्यर्थी की प्रस्तुति और संवाद शैली जैसे कारकों का प्रभाव हो सकता है। इसे अधिक संरचित और योग्यता-आधारित बनाया जा सकता है। नेतृत्व, निर्णय क्षमता, सत्यनिष्ठा, संवाद-कौशल, सामूहिक कार्य, भावनात्मक संतुलन और समस्या-समाधान जैसी क्षमताओं के लिए पहले से निर्धारित व्यवहार-सूचकांक और समान मूल्यांकन मानदंड विकसित किए जा सकते हैं। परिस्थितिजन्य प्रश्नों और व्यवहार-आधारित मूल्यांकन के माध्यम से साक्षात्कार को अधिक प्रमाण-आधारित बनाया जा सकता है।
सिविल सेवा परीक्षा सुधार का उद्देश्य केवल परीक्षा को सरल या कठिन बनाना नहीं होना चाहिए। वास्तविक उद्देश्य चयन की वैधता और विश्वसनीयता को बढ़ाना होना चाहिए। जिस योग्यता के लिए किसी अधिकारी का चयन किया जा रहा है, उसी योग्यता का विश्वसनीय और वैध परीक्षण चयन प्रक्रिया का मूल आधार होना चाहिए। भारत ने अंतरिक्ष, डिजिटल सार्वजनिक आधारभूत संरचना, जैव प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्रों में विश्व स्तर पर अपनी क्षमता प्रदर्शित की है। अब प्रशासनिक प्रतिभा के चयन में भी उसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को अपनाने का समय है।
विकसित भारत को ऐसे प्रशासनिक अधिकारियों की आवश्यकता होगी जो केवल बड़ी मात्रा में जानकारी याद रखने में सक्षम न हों, बल्कि नई जानकारी को तेजी से समझ सकें, बदलती परिस्थितियों में सीख सकें, जटिल समस्याओं का विश्लेषण कर सकें, अनिश्चितता में निर्णय ले सकें और व्यावहारिक समाधान विकसित कर सकें। इसलिए सिविल सेवा परीक्षा में सुधार केवल पाठ्यक्रम में परिवर्तन या परीक्षा-पद्धति में छोटे बदलाव तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आवश्यकता एक व्यापक प्रतिमान परिवर्तन की है- स्मृति से संज्ञानात्मक क्षमता की ओर, केवल सामान्यज्ञता से संतुलित विशेषज्ञता की ओर, व्यक्तिपरक मूल्यांकन से अधिक वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन की ओर एवं सैद्धांतिक उत्तरों से वास्तविक समस्या-समाधान की ओर।
साल 2047 के विकसित भारत के लिए प्रशासनिक प्रतिभा का चयन भी विकसित दृष्टिकोण से होना चाहिए। औपनिवेशिक युग की प्रशासनिक आवश्यकताओं के लिए निर्मित परीक्षा-दर्शन को इक्कीसवीं सदी की शासन चुनौतियों के अनुरूप पुनर्परिभाषित करना समय की आवश्यकता है।
सिविल सेवा परीक्षा की सफलता का वास्तविक मापदंड केवल चयनित अभ्यर्थियों की संख्या या परीक्षा की कठिनाई नहीं बल्कि चयन की गुणवत्ता होनी चाहिए। ऐसी चयन प्रणाली विकसित करना आवश्यक है जो ज्ञान के साथ विवेक, स्मृति के साथ विश्लेषण, सामान्य समझ के साथ विशेषज्ञता और अभिव्यक्ति के साथ वास्तविक समस्या-समाधान क्षमता की पहचान कर सके।
विकसित भारत के निर्माण में प्रशासनिक सुधार की भूमिका निर्णायक होगी। प्रशासनिक सुधार की शुरुआत उन प्रतिभाओं की पहचान से होती है जिन्हें भविष्य के भारत का नेतृत्व करना है। इसलिए सिविल सेवा परीक्षा में वैज्ञानिकता, वस्तुनिष्ठता और योग्यता-आधारित मूल्यांकन की दिशा में निर्णायक कदम अब समय की मांग है।
(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सेवा एवं प्रशासनिक विधि के मामलों के अधिवक्ता हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

