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पुरानी फिल्मों का आकर्षण तब भी और अब भी

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पुरानी फिल्मों का आकर्षण तब भी और अब भी


- आयुषी दवे

भारतीय फिल्मों ने महज 115 वर्षों में कई दौर देखे। टॉकीजों में हाउस फुल से लेकर ब्लैक में टिकट का भी मजेदार जमाना था। धीरे-धीरे तकनीक ने इस इंडस्ट्री को नया ठौर दिया। एक समय थ्री डी फिल्मों का भी जबरदस्त क्रेज रहा, लेकिन लोगों, खासकर भारत की बात करें तो पुरानी फिल्में और पुराने गीत ही लोगों की जुबान पर हमेशा छाए रहे। चाहे सफर में लक्जरी कार में हों या ट्रेन में मोबाइल पर बज रहे गीत ज्यादातर पुराने और 60 से 90 दशक के बीच के ही बजते सुनाई देते हैं। तमाम बदलाव एवं चुनौतियों के बाद धमाकेदार शुरुआत के बावजूद नए दौर के गानों ने वो मुकाम कभी हासिल ही नहीं किया जो कि पुराने गानों का अब तक बना हुआ है। कमोबेश अब ऐसा ही ट्रेन्ड पुरानी फिल्मों को लेकर लौट रहा है। भले ही तकनीक ने बहुत बड़ा बदलाव किया और फिल्मों को एक से एक आइडिया दिए लेकिन बावजूद तमाम फैन्टेसी, थ्रिल, मिक्सिंग, वीडियो एडिटिंग, एनीमेशन के पुरानी और सीधी सपाट शूटिंग से बनी फिल्मों का आकर्षण कमा जरूर लेकिन घटा नहीं।

इस बीच कम से चार-पांच पीढ़ियों का अंतर भी आया। तीन घंटे की जगह 2 घंटे की फिल्में बनने लगीं, ब्लैक एंड व्हाइट से कलर फिल्में बनीं और सिनेमाघरों के साथ-साथ मल्टीफ्लेक्स, ओटीटी तथा होम थियेटर का भी चलन शुरू हो गया। नई पीढ़ी का फिल्मों उसमें विशेषकर गीत-संगीत के प्रति बदलता नजरिया और जायका भी दिखा। पश्चिमीकरण के प्रभावों में आकर न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में तमाम संगीत, संस्कृतियां इससे प्रभावित हुईं और मूल स्वरूप तक को खो दिया। जैज, रॉक एंड रोल और कंट्री-वेस्टर्न ने धमाल मचाना शुरू किया। भारतीय संगीत परंपरा ने वो दौर भी देखा जब तेज और विदेशी वाद्य यंत्रों के साथ मिक्स संगीत कल्चर ने खूब हल्ला मचाया।

बीच-बीच मेंफूहड़पन का भी एक दौर चला। तब भी पुराने गानों की लोकप्रियता में कमीं नहीं आई। रेडियो सीलोन जो बाद में श्री ब्रॉडकास्टिंग कार्पोरेशन के नाम से प्रसारण करने लगा से प्रसारित बिनाका गीत माला ने तो धूम ही मचा दी। यह शो 1952 से 1988 तक रेडियो सीलोन पर हर बुधवार को प्रसारित हुआ। इसने भी भारतीय गीतों को बड़ी उंचाई दी। लोग इतने दीवाने थे कि सारा काम निपटा कागज, पेन ले गीतों की ग्रेडिंग के लिए बैठ जाते। हालांकि, बाद में 1989 से 1994 तक इसे विविध भारती से प्रसारित किया लेकिन तब तक टेलीविजन का युग भारत में आ चुका था और इस कार्यक्रम की लोकप्रियता घटती गई। बावजूद इसके सरकारी नियंत्रण के शुरुआती चैनल दूरदर्शन पर भी भारतीय फिल्मों के गीतों के कई कार्यक्रम चित्रहार और अलग-अलग नामों से आए और खासे लोकप्रिय हुए। इनमें भी पुराने गीतों का जलवा रहा, लेकिन 1970 के दौर से ही पश्चिमी संगीत का प्रभाव दिखने लगा। नई पीढ़ी धीरे-धीरे इसकी गिरफ्त में आने लगी। टेप रिकॉर्डर के आते ही फिर नए-पुराने गीतों की अघोषित प्रतिस्पर्धा भी काफी दिखी। शादी-विवाह में भी यह सब दिखा। लेकिन पिछले एक-डेढ़ दशक से एक बार फिर न केवल पुराने गीत-संगीत वापस सुनाई देने लगे हैं बल्कि रिमिक्स के नाम पर उसका सम्मिश्रण अलग ही तरह की अनुभूति देने लगा।

गत तीन मई 1913 को भारतीय सिनेमा की पहली फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ प्रदर्शित हुई जो बिना आवाज की फिल्म थी। इसका निर्माण भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहेब फाल्के ने किया था। तब से अब तक बॉलीवुड का सफर हमेशा ऊंचाइयों को ही छूता रहा। इस बीच दक्षिण, पंजाब, भोजपुरी सहित तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में भी फिल्मों का भी जबरदस्त दौर आया जो अब भी जारी है। यदि पूरे भारत की बात करें तो फिल्म और संगीत में अब भी पुराने गीत-संगीत का धमक और जादू जस का तस है, लेकिन लोगों का पुरानी फिल्मों के प्रति बदलता नजरिया और आकर्षण भले ही नई तकनीक ओटीटी और इण्टरनेट के जरिए होम थियेटर के प्रभाव बढ़ा लेकिन यह सच है कि परंतु पुरानी फिल्मों का क्रेज धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़ रहा है।

मदर इंडिया, उपकार, पूरब-पश्चिम, गुड्डी, हाथी मेरे साथी, आनन्द, गाइड, दीवार, कटी पतंग, हरे रामा हरे कृष्णा, लैला-मजनू, मुगल-ए-आजम, शोले, बॉबी जैसी ढेरों फिल्मों ने तबकी युवा और अबकी बूढ़ी हो चुकी पीढ़ी पर अमिट छाप छोड़ी। हां, नई तकनीक उसमें भी खासकर इंटरनेट के प्रभाव से कुछ वर्षों तक ये फिर से बॉक्स में बंद जैसी स्थिति में जरूर थीं, लेकिन सुकून की बात है कि एक बार फिर पुरानी और संदेश देती लोकप्रिय फिल्मों का दौर लौट रहा है। इसके पीछे लोगों का भावनात्मक जुड़ाव और दमदार स्क्रिप्ट है। कहानियां सच के धरातल पर दिखती हैं। शायद यही वजह है कि पुरानी फिल्में थियेटर से लेकर मल्टीफ्लेक्स पर फिर अपना जलवा बिखेरने को तैयार हैं। निश्चित रूप से भारतीय परिवेश, संस्कार, रीति-रिवाज वो चाहे देश के पूरब से पश्चिम हो या उत्तर से दक्षिण लोग वापस जुड़ रहे हैं और जानना-समझना चाहते हैं जो बेहद सुकून की बात है। नई पीढ़ी का पुरानी भारतीय फिल्मों के प्रति लगाव-झुकाव बेहद सुखद संदेश है।

(लेखिका, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं कम्युनिकेशन इंजीनियर हैं।)-----------

हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी