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इसलिए सीईसी को हटा पाना है मुश्किल

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इसलिए सीईसी को हटा पाना है मुश्किल


अभिषेक शुक्ल

पिछले दो दिन 10 और 11 अक्टूबर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और अन्य के प्रदर्शन से दिल्ली के कुछ हिस्सों में सामान्य जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा। भारत निर्वाचन आयोग के भीतर असहमति की रिपोर्टों, विपक्षी दलों के प्रदर्शन और उच्चतम न्यायालय में दाखिल नई याचिकाओं ने एक बार फिर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की शक्तियों, जवाबदेही और उनके पद की सुरक्षा पर राष्ट्रीय विमर्श छेड़ दिया है। इन विरोध प्रदर्शनों और बढ़ते राजनीतिक दबाव के बीच एक अहम संवैधानिक सवाल खड़ा होता है, क्या सार्वजनिक प्रदर्शन या राजनैतिक दबाव के आधार पर देश के मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाया या निलंबित किया जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर राजनीतिक बयानों में नहीं, बल्कि भारतीय संविधान के प्रावधानों और निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वायत्तता में निहित है।

मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति अनुच्छेद 324(2) के अंतर्गत राष्ट्रपति करते हैं। वर्ष 2022 तक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर संसद ने कोई कानून नहीं बनाया था। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री की सलाह पर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति करते रहे हैं। किन्तु वर्ष 2023 में उच्चतम न्यायालय ने 'अनूप बरनवाल' वाद में निर्देश दिया कि जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक तीन सदस्यीय समिति की सिफारिश पर की जाए, जिसमें प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और भारत के प्रधान (मुख्य) न्यायाधीश सदस्य होंगे। इसी वर्ष 2023 में संसद ने एक अधिनियम पारित कर देश के प्रधान न्यायाधीश को चयन समिति से बाहर कर दिया और उनके स्थान पर प्रधानमंत्री नामित एक कैबिनेट मंत्री को सदस्य बनाया गया।

यह बदलाव भारतीय संविधान के आधारभूत ढांचे और शक्ति के पृथक्करण सिद्धांत को मजबूत करता है। भारत के प्रधान न्यायाधीश को चुनाव आयुक्त की चयन समिति का हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि यदि न्यायपालिका का प्रमुख कार्यपालिका की नियुक्तियों में सक्रिय भूमिका निभाता है तो कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य पृथक्करण का सिद्धांत कमजोर होता है। इसके पीछे एक दूसरा तर्क यह है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित विवाद भविष्य में न्यायपालिका के सम्मुख आ सकते हैं। ऐसे में जब न्यायपालिका का प्रमुख उस नियुक्ति प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार रहा हो तो न्यायालय के लिए नियुक्ति प्रक्रिया का निष्पक्ष न्यायिक पुनरावलोकन एक चुनौती बन जाएगा। एक अन्य महत्त्वपूर्ण तर्क यह है कि यदि भारत के प्रधान न्यायाधीश प्रधानमंत्री से सहमत होते हैं तो उन्हें सरकार के पक्ष में झुका हुआ माना जाएगा और यदि वह नेता प्रतिपक्ष से सहमत होते हैं तो उन्हें सरकार विरोधी माना जाएगा। दोनों परिस्थितियों में भारत के प्रधान न्यायाधीश की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाएगी।

वैसे भी, उच्च संवैधानिक पदों की नियुक्तियों में सरकार की सक्रिय भूमिका होनी चाहिए। यही सामान्य सार्वभौमिक नियम है। इससे सरकार और उच्च संवैधानिक पदों के मध्य गतिरोध की संभावना कम होती है और सहयोग बढ़ता है। सरकार की जवाबदेही तय करना आसान हो जाता है क्योंकि सरकार अपनी असफलता के लिए उच्च संवैधानिक पदाधिकारियों को दोष नहीं दे सकती। उदाहरण के लिए, विपक्ष के संवैधानिक संस्थाओं के साथ असहयोग और विरोध प्रकट करने से कोई संवैधानिक संकट पैदा नहीं होता। किन्तु यदि सरकार और निर्वाचन आयोग जैसी संवैधानिक संस्था के मध्य असहयोग और टकराव पैदा हो गया तो यह एक संवैधानिक संकट को जन्म दे सकता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सलाह पर निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान किया था।

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को लेकर उच्चतम न्यायालय में डॉ. जया ठाकुर बनाम भारत संघ और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की याचिकाएं लंबित हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नए कानून ने भारत के प्रधान न्यायाधीश को समिति से हटाकर उनकी जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल कर दिया है। इससे समिति में सरकार को 2-1 का स्पष्ट बहुमत मिल जाता है, जो चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। अभी सितंबर 2026 में उच्चतम न्यायालय की दो जजों की बेंच ने इस मामले में खंडित फैसला सुनाया। इसके बाद प्रधान न्यायाधीश ने इस मामले को अंतिम फैसले के लिए एक बड़ी संविधान पीठ को सौंप दिया है।

इस घटनाक्रम में एक नाटकीय मोड़ तब आया जब 'इंडियन एक्सप्रेस' में 23 सितंबर 2026 को छपी एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि पिछले 10 महीने में चुनाव आयोग के दो सदस्यों ने आयोग के निर्णयों पर 14 बार लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं। इनमें फॉर्म 6 में किए गए बदलाव सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इस रिपोर्ट को आधार बनाकर अधिवक्ता शैलेंद्र (शलभ) मणि त्रिपाठी और सह-याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह ने मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यप्रणाली को चुनौती देते हुए उच्चतम न्यायालय में एक याचिका दायर की। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अन्य दो चुनाव आयुक्तों को दरकिनार करते हुए मतदाता सूची और विशेष गहन पुनरीक्षण से संबंधित एकतरफा निर्णय लिए हैं। यह 2023 के अधिनियम की धारा 18 का सीधा उल्लंघन है, जो यह अनिवार्य करती है कि चुनाव आयोग के सभी निर्णय सर्वसम्मति या बहुमत से लिए जाने चाहिए।

राकेश कुमार सिंह की याचिका में जहां मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने की मांग की गई, वहीं त्रिपाठी की याचिका में मांग की गई कि बिना सामूहिक अधिकार के मतदाता सूची में बदलाव करने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 32 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों पर मुकदमा चलाया जाए। यद्यपि न्यायालय ने तत्काल निलंबन से इनकार कर दिया लेकिन चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया। उच्चतम न्यायालय ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि जांच में यह साबित होता है कि फैसले बिना बहुमत के लिए गए तो उन फैसलों को रद्द कर दिया जाएगा। इस तथ्य को परखने के लिए अदालत ने चुनाव आयोग की आंतरिक फाइलों, बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त को न्यायिक समीक्षा के लिए तलब किया है।

किन्तु यहां पर सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को निलंबित करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसमें केवल उन्हें पद से हटाने की एक अत्यंत कठोर प्रक्रिया निर्धारित की गई है। अनुच्छेद 324(5) के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके और आधार यथा 'साबित कदाचार या असमर्थता' पर ही हटाया जा सकता है, जिसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना आवश्यक है। संविधान में निलंबन तंत्र की यह अनुपस्थिति चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने के लिए एक जानबूझकर बनाया गया सुरक्षा कवच है। यह सुनिश्चित करता है कि कार्यपालिका अनुशासनात्मक कार्रवाई के बहाने मुख्य चुनाव आयुक्त को मनमाने ढंग से किनारे न कर सके और चुनाव आयोग के स्वतंत्र कामकाज को अस्थायी रूप से बाधित या प्रभावित न कर पाए। ऐसे में न्यायालय से मुख्य चुनाव आयुक्त के निलंबन की मांग करना न्यायसंगत नहीं है।

दूसरी ओर, मुख्य चुनाव आयुक्त को 2023 के अधिनियम की धारा 16 के तहत मुकदमे के विरुद्ध संरक्षण प्राप्त है। उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी भी कार्य या लिए गए निर्णय के खिलाफ कोई भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती और यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बरकरार रहती है। जब तक 2023 के अधिनियम की धारा 16 को न्यायालय द्वारा विधिशून्य नहीं घोषित किया जाता, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

ऐसे में उच्चतम न्यायालय 2023 के अधिनियम के प्रावधानों और भारत निर्वाचन आयोग के निर्णयों का न्यायिक पुनरावलोकन कर उसे विधिशून्य घोषित कर सकता है। किन्तु उच्चतम न्यायालय न तो निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति करने वाली समिति के सदस्यों का निर्धारण कर सकता है और न ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटा या निलंबित कर सकता है। नियुक्ति और बर्खास्तगी कार्यपालिका का क्षेत्राधिकार है। इसमें न्यायपालिका का न्यूनतम हस्तक्षेप होना चाहिए।

इसी बीच विपक्ष के सांसदों ने राष्ट्रपति से मुलाकात की। किन्तु यहां पर यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यकाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त नहीं है। राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल तभी हटा सकते हैं जब संसद के दोनों सदन उन्हें विशेष बहुमत द्वारा ऐसा करने के लिए अधिकृत करें। मुख्य चुनाव आयुक्त को पदच्युत करने की प्रक्रिया भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 (5) में दी गई है। इसके लिए विपक्ष को सदन में प्रस्ताव लाना होगा। किन्तु विपक्ष के पास इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए पर्याप्त संख्या बल नहीं है।

लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता इस बात में निहित है कि वे राजनीतिक दबावों और सार्वजनिक बहसों से अप्रभावित रहकर अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करें। संविधान निर्माताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को कार्यपालिका की मनमर्जी और तात्कालिक राजनीतिक उथल-पुथल से परे रखने के लिए ही महाभियोग जैसी जटिल प्रक्रिया की ढाल दी। वर्तमान विवाद यह स्पष्ट करता है कि निर्वाचन आयोग के आंतरिक प्रशासनिक निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा की नजर भले ही बनी रहे लेकिन राजनीतिक मांग या अदालती अर्जी के सहारे मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाना या निलंबित करना न तो संवैधानिक रूप से संभव है और न ही संसदीय अंकगणित के लिहाज से आसान। अंततः, संस्था की गरिमा और संवैधानिक सीमाओं का संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है।

(लेखक, इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / मुकुंद