विदेश नीति : भरोसा, मानवता और राष्ट्रीय हित की परीक्षा
डॉ. अनिल कुमार निगम
भारत सरकार के केंद्रीय बजट 2026–27 में विदेश मंत्रालय के लिए 22,118 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। इस बजट में नेपाल को 800 करोड़ रुपये, श्रीलंका को 400 करोड़ रुपये, भूटान को सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मानते हुए 2,289 करोड़ रुपये तथा अफगानिस्तान को 150 करोड़ रुपये मानवीय सहायता के रूप में दिए जाने का प्रावधान किया गया है। यह तथ्य भारत की विदेश नीति की कूटनीतिक प्राथमिकताओं को तो रेखांकित करता है, साथ ही कई गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है। क्या यह आवंटन घरेलू जरूरतों के अनुरूप है? क्या भरोसे के आधार पर किया गया निवेश ठोस परिणाम देगा?
विदेश के लिए 22,118 करोड़ रुपये का आवंटन यह संकेत देता है कि भारत वैश्विक मंच पर अधिक सक्रिय और प्रभावशाली भूमिका निभाने की महत्वाकांक्षा रखता है। ‘पड़ोसी पहले’, ‘एक्ट ईस्ट’, ‘इंडो-पैसिफिक’ और ‘वैश्विक दक्षिण’ जैसी नीतियां इस आकांक्षा का वैचारिक आधार हैं। परंतु हमें यह देखना भी आवश्यक है कि क्या यह बढ़ा हुआ व्यय केवल कूटनीतिक विस्तार का प्रतीक है या वास्तव में राष्ट्रीय हितों में ठोस परिणाम देगा?
भूटान को 2,289 करोड़ रुपये का आवंटन यह दर्शाता है कि भारत उसे अपना सबसे भरोसेमंद पड़ोसी मानता है। भारत-भूटान संबंध पारंपरिक रूप से मित्रतापूर्ण और स्थिर रहे हैं। जलविद्युत परियोजनाओं, सुरक्षा सहयोग और आर्थिक सहायता के माध्यम से भारत ने भूटान के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हालांकि आलोचक यह प्रश्न उठाते रहे हैं कि क्या लगातार बड़ी आर्थिक सहायता से भूटान की आत्मनिर्भरता प्रभावित नहीं होती? क्या यह रिश्ता सहयोग से आगे बढ़कर निर्भरता की ओर तो नहीं जा रहा? यदि सहायता का उपयोग केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित रह जाए और स्थानीय क्षमता निर्माण पर ध्यान न दिया जाए, तो दीर्घकाल में यह भारत और भूटान- दोनों के लिए चुनौती बन सकता है। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि यहां भारत एक अच्छे पड़ोसी की भूमिका निभा रहा है।
नेपाल को 800 करोड़ रुपये का आवंटन भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति का प्रमुख उदाहरण है। भारत और नेपाल के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंध अत्यंत गहरे हैं। खुली सीमा और पारिवारिक रिश्ते इस संबंध को विशिष्ट बनाते हैं। हालांकि यह इसमें सचाई है कि नेपाल में चीन की बढ़ती दखलंदाजी भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय रही है।
प्रश्न यह है कि क्या आर्थिक सहायता से नेपाल में भारत के प्रति विश्वास और सहयोग स्थायी रूप से बढ़ा है? पूर्व में नेपाल की आंतरिक राजनीति में भारत-विरोधी स्वर उभरते रहे हैं, जिससे यह संदेह पैदा होता है कि केवल वित्तीय सहायता कूटनीतिक विश्वास स्थापित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। सहायता के साथ-साथ सम्मानजनक संवाद और आपसी हितों का संतुलन भी आवश्यक है।
श्रीलंका को 400 करोड़ रुपये का आवंटन उसके हालिया आर्थिक संकट की पृष्ठभूमि में देखा जा सकता है। संकट के समय भारत ने सहायता देकर एक जिम्मेदार पड़ोसी की भूमिका निभाई, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा भी गया। यह सहायता मानवीय दृष्टि से उचित प्रतीत होती है। लेकिन प्रश्न यह है कि यह सहायता दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ में परिवर्तित होगी? श्रीलंका में चीन की आर्थिक और रणनीतिक उपस्थिति पहले से मजबूत है। यदि भारतीय सहायता केवल संकट-प्रबंधन तक सीमित रह जाती है तो इससे भारत के भू-राजनीतिक हितों को अपेक्षित मजबूती नहीं मिल पाएगी।
अन्य पड़ोसी देश अफगानिस्तान को 150 करोड़ रुपये की मानवीय सहायता भारत की नैतिक और मानवीय प्रतिबद्धता को दर्शाती है। राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और मानवीय त्रासदी के बीच अफगान जनता को सहायता देना अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी के अनुरूप है।
भारत की घरेलू परिस्थितियां देखें तो देश आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की स्थिति, युवाओं में बेरोजगारी और महँगाई का दबाव आम नागरिक की रोजमर्रा की चिंता है। ऐसे में विदेश मंत्रालय के लिए 22,118 करोड़ रुपये और पड़ोसी देशों को दी जा रही बड़ी सहायता यह सवाल उठाती है कि क्या प्राथमिकताओं का संतुलन सही है? लोकतंत्र में सरकारी व्यय की वैधता पारदर्शिता और जवाबदेही पर निर्भर करती है। विदेश सहायता के मामलों में यह और भी आवश्यक हो जाता है, क्योंकि इसका प्रत्यक्ष लाभ आम नागरिक को तुरंत दिखाई नहीं देता। इसलिए यह स्पष्ट होना चाहिए कि इन राशियों का उपयोग किन परियोजनाओं में होगा, उनकी निगरानी कैसे होगी और असफलता की स्थिति में जिम्मेदारी किसकी होगी।
वास्तविकता तो यह है कि 2026–27 के बजट में विदेश मंत्रालय को 22,118 करोड़ रुपये का आवंटन और उसमें नेपाल, श्रीलंका, भूटान तथा अफगानिस्तान के लिए निर्धारित सहायता भारत की सक्रिय और महत्वाकांक्षी विदेश नीति को दर्शाती है। आशा है कि भारत सरकार की यह नीति क्षेत्रीय स्थिरता, मानवीय जिम्मेदारी और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन साधने का सार्थक प्रयास है।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

