home page

ब्रिक्स की उपलब्धि बनाम राजनीतिक संकीर्णता

 | 
ब्रिक्स की उपलब्धि बनाम राजनीतिक संकीर्णता


-प्रो. महेश वर्मा

भारत ने हाल ही में नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की। दुनिया के प्रमुख उभरते देशों के नेता भारत आए। वैश्विक अर्थव्यवस्था, आतंकवाद, ऊर्जा, स्वास्थ्य, जलवायु, तकनीक, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वैश्विक संस्थाओं में सुधार और ग्लोबल साउथ की भूमिका जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा हुई। 45 पृष्ठों की नई दिल्ली घोषणापत्र के माध्यम से सदस्य देशों ने अनेक मुद्दों पर साझा सहमति भी व्यक्त की।

ऐसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय आयोजन के तुरंत बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी की ओर से आया वह बयान स्वाभाविक रूप से बहस का विषय बन गया, जिसमें उन्होंने ब्रिक्स के रात्रिभोज में शाकाहारी भोजन परोसे जाने के संदर्भ में 80 फीसदी भारतीयों को मांसाहारी बताते हुए भारत के मांसाहारी भोजन को स्वादिष्ट बताया।

सवाल यह नहीं है कि कोई व्यक्ति शाकाहारी है या मांसाहारी। भारत विविधताओं का देश है और प्रत्येक नागरिक को अपनी भोजन-पसंद का अधिकार है। असली सवाल यह है कि विपक्ष के नेता से सार्वजनिक जीवन में किस प्रकार की राजनीतिक और राष्ट्रीय जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है? क्या हर उपलब्धि को राजनीतिक चश्मे से देखना उचित है? विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना है। गलतियों को उजागर करना है। यह लोकतंत्र की अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन क्या विपक्ष की जिम्मेदारी केवल विरोध करना है?

जब भारत किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर मेजबान देश के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होता है, तब प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ दल की उपलब्धि से कहीं बड़ा विषय भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा बन जाता है। ब्रिक्स केवल भाजपा या नरेन्द्र मोदी का कार्यक्रम नहीं था। वह भारत का अंतरराष्ट्रीय दायित्व और भारत की कूटनीतिक प्रतिष्ठा थी। इसलिए सरकार की उपलब्धियों की आलोचना विपक्ष का अधिकार है लेकिन क्या ऐसी आलोचना के लिए भोजन की थाली को राजनीतिक हथियार बनाना उचित है? यही प्रश्न आज देश को राहुल गांधी से पूछना चाहिए।

राष्ट्रीय हित सबसे बड़ा

राहुल गांधी लोकसभा में विपक्ष के नेता हैं। यह केवल एक राजनीतिक पद नहीं है। नेता विपक्ष को संसद में महत्वपूर्ण संवैधानिक-संसदीय भूमिका प्राप्त है और उन्हें कैबिनेट मंत्री के समकक्ष दर्जा प्राप्त है। इस पद के साथ सुविधाएँ और सार्वजनिक संसाधन जुड़े हैं। लेकिन उससे कहीं महत्वपूर्ण बात है- इस पद के साथ जनता का विश्वास और राष्ट्रीय जिम्मेदारी जुड़ी है। इसलिए प्रश्न यह होना चाहिए कि जब भारत किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी करता है और दुनिया के बड़े देशों के नेता भारत आते हैं, तब विपक्ष के नेता की भाषा कैसी होनी चाहिए? क्या उन्हें उपलब्धियों पर सवाल नहीं उठाना चाहिए? बिल्कुल उठाना चाहिए।

लेकिन क्या प्रश्न उठाने का केंद्र नीति, परिणाम, राष्ट्रीय हित और कूटनीतिक उपलब्धियाँ होनी चाहिए या फिर इस बात पर बहस कि विदेशी मेहमानों को भोजन में मांसाहारी व्यंजन क्यों नहीं परोसा गया? यह अंतर लोकतांत्रिक राजनीति और राजनीतिक संकीर्णता के बीच की रेखा तय करता है।

भोजन व्यक्तिगत पसंद

भारत में शाकाहारी और मांसाहारी दोनों तरह की खाद्य परंपराएँ हैं। भारत की विविधता में दोनों का स्थान है। लेकिन ब्रिक्स का रात्रिभोज कोई सामान्य घरेलू भोजन नहीं था। वह भारत की सांस्कृतिक और पाक-परंपरा को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का एक अवसर था। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार रात्रिभोज में खंडवी मिलेट, मशरूम, पनीर लबाबदार, गुच्छी, मिलेट पुलाव, रायता, भारतीय रोटियाँ, जलेबी और फिरनी जैसे अनेक भारतीय व्यंजन शामिल थे। ऐसे में शाकाहारी मेन्यू को भारत की किसी एक विचारधारा को थोपने के रूप में प्रस्तुत करना क्या वास्तव में उचित है? भारत की अनेक प्राचीन और समृद्ध खाद्य परंपराएँ शाकाहारी भी हैं। मिलेट, दाल, पनीर, मशरूम और अनेक क्षेत्रीय व्यंजन हमारी पाक-विविधता का हिस्सा हैं। यदि विदेशी मेहमानों के सामने भारत की ऐसी विविधता प्रस्तुत की गई तो उसे भी भारत की सांस्कृतिक शक्ति के रूप में देखा जा सकता है।

क्या है असली मुद्दा

राहुल गांधी ने 80 प्रतिशत भारतीयों के मांसाहारी होने का दावा किया। लेकिन भारत में भोजन संबंधी आंकड़े इस बात पर निर्भर करते हैं कि “मांसाहारी” की परिभाषा क्या है- क्या कभी-कभार अंडा, मछली या मांस खाने वाला व्यक्ति भी उसी श्रेणी में आएगा या नियमित रूप से मांस खाने वाला? इसलिए किसी एक आंकड़े को अंतिम और निर्विवाद राष्ट्रीय सत्य की तरह प्रस्तुत करना अपने आप में बहस का विषय है। उससे भी बड़ा सवाल यह है कि ब्रिक्स की सफलता का मूल्यांकन क्या खाने की प्लेट देखकर किया जाना चाहिए? क्या भारत की विदेश नीति, प्रधानमंत्री की द्विपक्षीय बैठकों, वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका, आतंकवाद के खिलाफ साझा रुख, आर्थिक सहयोग, तकनीकी सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषयों से बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा यह है कि डिनर में चिकन या मटन क्यों नहीं था?

क्या यह लोकतांत्रिक मर्यादा का हनन है?

मेरे विचार से इसे सीधे-सीधे संवैधानिक या कानूनी रूप से लोकतांत्रिक मर्यादा का उल्लंघन कहना सही नहीं होगा। विपक्ष के नेता को सरकार की आलोचना का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, जिम्मेदारियों से भी चलता है। लोकतांत्रिक मर्यादा का वास्तविक प्रश्न यही है कि क्या सार्वजनिक जीवन में पद की गरिमा के अनुरूप मुद्दों का चुनाव किया जा रहा है? एक तरफ भारत विश्व राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर रहा है और दूसरी तरफ यदि हमारी घरेलू राजनीति हर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि को पार्टी बनाम पार्टी के चश्मे से देखने लगे तो इससे अंततः नुकसान किसका होगा? सरकार का नहीं- देश का।

विपक्ष को जवाबदेह होना चाहिए

सत्ता पक्ष की आलोचना विपक्ष का धर्म है लेकिन राष्ट्रहित से ऊपर कोई दल नहीं हो सकता। आज भारत जिस वैश्विक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, उसमें ब्रिक्स जैसे मंचों का महत्व बढ़ रहा है। नई दिल्ली में हुए सम्मेलन में ग्यारह सदस्यीय विस्तारित ब्रिक्स के बीच आर्थिक सहयोग, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि, तकनीक और वैश्विक शासन से जुड़े मुद्दों पर सहमति बनी। ऐसे समय में भारत के विपक्ष को और अधिक जिम्मेदार, अधिक तथ्यपरक और अधिक राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाला होना चाहिए। विपक्ष सरकार की आलोचना करे-पूरी ताकत से करे। लेकिन जब भारत सफल हो तो भारत की सफलता को भारत की सफलता कहने का साहस भी दिखाए। यही परिपक्व लोकतंत्र है।

अंततः सवाल राहुल गांधी से नहीं, हमारी राजनीतिक संस्कृति से है। क्या हम हर अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि को राजनीतिक चश्मे से देखेंगे? क्या हम भारत की उपलब्धि को केवल इसलिए कमतर बताएँगे क्योंकि उस समय केंद्र में हमारी पसंद की सरकार नहीं है? क्या राष्ट्रीय उपलब्धि और राजनीतिक उपलब्धि के बीच अंतर करना हम सीखेंगे?

देश की जनता को ऐसे विपक्ष की आवश्यकता है जो सरकार को कठघरे में खड़ा करे, लेकिन जब देश हित सामने हो तो सरकार के साथ खड़ा होने में भी संकोच न करे। क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की उपलब्धि अपनी जगह है, भाजपा की राजनीति अपनी जगह है और भारत की उपलब्धि उससे कहीं ऊपर है। ब्रिक्स में भारत की सफलता को भोजन की थाली के विवाद में सीमित करना उस व्यापक कूटनीतिक और रणनीतिक महत्व को छोटा करना है, जिसे दुनिया देख रही है। राजनीतिक विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन राष्ट्रहित राजनीतिक विरोध से बड़ा है। विपक्ष के नेता से देश यही अपेक्षा करता है कि वे इस अंतर को समझें।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश