ब्रिक्स : भारत की नई हुंकार
डॉ. सत्यवान सौरभ
ब्रिक्स आज केवल उभरती अर्थव्यवस्थाओं का आर्थिक समूह नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में वैश्विक दक्षिण की आवाज को प्रभावी बनाने वाला महत्वपूर्ण मंच बन चुका है। मूल रूप से ब्राजील, रूस, भारत और चीन से बने ‘ब्रिक’ में 2011 में दक्षिण अफ्रीका के शामिल होने के बाद इसका नाम ब्रिक्स हुआ। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात इसके पूर्ण सदस्य बने तथा जनवरी 2025 में इंडोनेशिया भी पूर्ण सदस्य के रूप में शामिल हुआ। इस विस्तार के साथ ब्रिक्स अब 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है।
भारत के लिए वर्ष 2026 विशेष महत्व रखता है, क्योंकि भारत ने एक जनवरी 2026 से ब्रिक्स की अध्यक्षता संभाली है और नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। भारत की अध्यक्षता का केंद्रीय दृष्टिकोण लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास पर केंद्रित है। यह अध्यक्षता भारत को केवल आयोजक की भूमिका नहीं देती, बल्कि समूह की प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा को प्रभावित करने का अवसर भी प्रदान करती है।
ब्रिक्स का सबसे बड़ा महत्व भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को मजबूत करने में है। भारत लंबे समय से ऐसी विदेश नीति का समर्थन करता रहा है जिसमें किसी एक शक्ति-गुट पर निर्भरता के बजाय विभिन्न देशों और मंचों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संबंध बनाए जाएं। ब्रिक्स में चीन और रूस जैसे देशों के साथ भारत की भागीदारी है, वहीं भारत अमेरिका, यूरोप, जापान और अन्य शक्तियों के साथ भी समानांतर रूप से सहयोग करता है। इस प्रकार ब्रिक्स भारत की बहु-संरेखीय विदेश नीति को व्यावहारिक आधार प्रदान करता है।
ब्रिक्स का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष वैश्विक दक्षिण की आवाज को मजबूती देना है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में आज भी अनेक निर्णय ऐसी संरचनाओं के भीतर लिए जाते हैं, जिनमें विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व उनकी आर्थिक और जनसंख्या संबंधी भूमिका के अनुरूप नहीं है। भारत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता लगातार उठाता रहा है। ब्रिक्स के माध्यम से विकासशील देश सामूहिक रूप से अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण और न्यायसंगत वैश्विक शासन व्यवस्था की मांग को मजबूत कर सकते हैं।
आर्थिक दृष्टि से भी ब्रिक्स भारत के लिए महत्वपूर्ण है। विस्तृत सदस्यता का अर्थ है बड़े बाजारों, निवेश, ऊर्जा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और आपूर्ति शृंखलाओं में सहयोग की नई संभावनाएं। भारत के लिए यह अवसर विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरक्षणवाद, व्यापारिक तनाव और आपूर्ति शृंखला के पुनर्गठन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। ब्रिक्स के भीतर व्यापारिक बाधाओं को कम करने और भुगतान प्रणालियों को अधिक सुविधाजनक बनाने पर सहयोग भारत के आर्थिक हितों को लाभ पहुंचा सकता है। स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और सीमा-पार भुगतान प्रणालियों पर सहयोग की संभावनाएँ भी इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं।
विकास वित्त के क्षेत्र में न्यू डेवलपमेंट बैंक ब्रिक्स की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में शामिल है। इसका उद्देश्य बुनियादी ढाँचे और सतत विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए वित्त उपलब्ध कराना है। विकासशील देशों के लिए ऐसी संस्थाएँ इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे पारंपरिक वैश्विक वित्तीय संस्थाओं के विकल्प और पूरक दोनों के रूप में काम कर सकती हैं। भारत के लिए इसमें परिवहन, ऊर्जा, शहरी विकास, जलवायु और हरित बुनियादी ढाँचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए सहयोग की व्यापक संभावनाएँ हैं, लेकिन ब्रिक्स के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं।
सबसे बड़ी चुनौती इसके सदस्य देशों के विविध और कई बार परस्पर विरोधी रणनीतिक हित हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तथा व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा किसी भी गहरे राजनीतिक या सुरक्षा सहयोग को प्रभावित कर सकती है। रूस-पश्चिम संघर्ष, पश्चिम एशिया की परिस्थितियाँ और अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता जैसे वैश्विक घटनाक्रम भी ब्रिक्स के भीतर मतभेद पैदा कर सकते हैं।
दूसरी चुनौती है विस्तार के बाद समन्वय की जटिलता। जब समूह छोटा था, तब साझा दृष्टिकोण बनाना अपेक्षाकृत आसान था। अब 11 पूर्ण सदस्यों और अलग-अलग स्तर के साझेदार देशों के साथ निर्णय-निर्माण अधिक जटिल हो गया है। प्रत्येक देश की आर्थिक संरचना, राजनीतिक प्राथमिकताएं और विदेश नीति अलग हैं। इसलिए केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं; साझा एजेंडा और प्रभावी संस्थागत तंत्र भी आवश्यक है।
एक और गंभीर चुनौती यह है कि ब्रिक्स को कहीं पश्चिम-विरोधी गठबंधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति न बढ़ जाए। यदि समूह को केवल अमेरिका और पश्चिमी देशों के विकल्प या प्रतिद्वंद्वी के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो उसके विकासात्मक और आर्थिक उद्देश्यों को नुकसान पहुँच सकता है। भारत के हित में यही होगा कि ब्रिक्स को किसी के विरुद्ध खड़े गुट के बजाय बहुध्रुवीय और समावेशी सहयोग मंच के रूप में विकसित किया जाए।
भारत की 2026 की अध्यक्षता इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण अवसर है। भारत को घोषणाओं से आगे बढ़कर व्यावहारिक परिणामों पर जोर देना चाहिए। व्यापार और निवेश, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, आपदा प्रबंधन और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में ठोस परियोजनाएँ शुरू की जा सकती हैं। न्यू डेवलपमेंट बैंक की कार्यक्षमता और परियोजना-वित्त क्षमता को मजबूत करना भी प्राथमिकता होनी चाहिए।
अंततः ब्रिक्स की सफलता इस बात से तय होगी कि वह वैश्विक राजनीति में कितने प्रभावशाली बयान जारी करता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह कितना व्यावहारिक सहयोग पैदा करता है। भारत के लिए ब्रिक्स रणनीतिक स्वायत्तता, आर्थिक अवसर, वैश्विक दक्षिण की सामूहिक शक्ति और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण विश्व व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण मंच है। इसकी विविधता चुनौती अवश्य है, लेकिन वही इसकी शक्ति भी बन सकती है। भारत को अपनी अध्यक्षता के दौरान सहमति, संवाद और विकास को केंद्र में रखकर ब्रिक्स को ऐसा मंच बनाना चाहिए, जो किसी शक्ति के विरुद्ध नहीं, बल्कि समानता, सहयोग और संतुलित बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के पक्ष में खड़ा हो।
ब्रिक्स भारत के लिए केवल कूटनीतिक मंच नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी स्वतंत्र और प्रभावशाली भूमिका को आकार देने का अवसर है। यदि भारत अपनी अध्यक्षता को व्यावहारिक सहयोग, वैश्विक दक्षिण की एकजुटता और संतुलित कूटनीति से जोड़ने में सफल होता है, तो ब्रिक्स की नई दिशा में उसकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)-----------------
हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी

