छात्र शक्ति और बिहार आंदोलन का संदेश
-मनोज कुमार मिश्र
आजादी के आंदोलन के बाद बिहार के छात्र आंदोलन को देश के इतिहास में सबसे प्रभावशाली माना गया। इस आंदोलन ने देश की सबसे ताकतवर नेता मानी जाने वाली यानी तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को न केवल सत्ता से बेदखल किया बल्कि उनको अपनी खुद की सीट से पराजय का सामना करना पड़ा। यह अलग बाद है कि सत्ता पर काबिज नेताओं के आपसी कलह और स्वार्थ ने जनता पार्टी के प्रयोग को विफल कर दिया और इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आ गई। उसके बाद असम विदेशी घुसपैठ विरोधी आंदोलन से लेकर 2011 के समाजसेवी अण्णा हजारे की अगुवाई में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन समेत कई आंदोलनों की अगुवाई छात्र-युवाओं ने ही की। इन आंदोलनों की विफलता ने जन आंदोलनों के पक्षधर लोगों के विश्वास पर ही आघात कर दिया। इसका परिणाम हुआ कि अभी सोशल मीडिया के दम पर बनी कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन शुरू होने से पहले ही समाप्त होने लगा। जबकि नीट पेपर लीक और सीबीएसई की परीक्षा प्रणाली जैसे मुद्दे देश के हर कोने में रहने वाले लाखों छात्र-छात्राओं से सीधा जुड़ा है।
खास बात यह है कि इसी उम्र के बच्चे, जिनके लिए जेन जेड (जनरेशन जेड) यानी 1997 से 2012 के बीच पैदा होने वाले छात्र-युवाओं ने पड़ोस के तीन देशों की सरकारें बदल दी। वैसे उन देशों में भी बदलाव बहुत सार्थक होता नहीं दिख रहा है। भारत जैसे विशाल देश में इस तरह के आंदोलन की कल्पना कठिन है लेकिन इतना तय है कि मजबूत विपक्ष की गैरहाजिरी में देश के छात्र-युवा को ही सार्थक विपक्ष की भूमिका निभानी होगी। अगर एक वाक्य में कहें तो यही 1974 के बिहार आंदोलन का संदेश है।
इतना ही नहीं, इस आंदोलन के कई संदेश आज भी सामयिक हैं। यह आम धारणा है कि नवंबर 1973 में गुजरात के एक इंजीनियरिंग कालेज के छात्रावास की फीस बढ़ने के खिलाफ छात्रों का आंदोलन शुरू हुआ जो गुजरात की चिमन भाई पटेल सरकार के भ्रष्टाचार, कुशासन और मंहगाई के खिलाफ स्वत: स्फूर्त प्रदेश भर का आंदोलन बन गया। जिसे गुजरात नव निर्माण आंदोलन कहा गया।
हालांकि बिहार आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र नेताओं के अगुवा रामबहादुर राय (वर्तमान में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष और पद्मभूषण से सम्मानित) बताते हैं कि कहने के लिए बिहार आंदोलन गुजरात से प्रेरणा लेकर शुरू हुआ लेकिन वास्तव में बिहार आंदोलन की तैयारी लंबे समय से चल रही थी। लोकनायक जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने काफी समय बाद आंदोलन का नेतृत्व करना स्वीकारा, वास्तव में उसके काफी समय पहले से उनसे (रामबहादुर राय) और दूसरे छात्र नेता मिलकर आंदोलन की तैयारी की जानकारी देते रहे। राय साहब आंदोलन की 11 सदस्यों की संचालन समिति के सदस्य भी थे। गुजरात आंदोलन में भी सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके छात्र संगठन-अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की ही थी। बिहार आंदोलन की भूमिका बनाने में भी संघ के बड़े नेताओं के साथ-साथ तब संघ के पटना महानगर प्रचारक रहे केएन गोविंदाचार्य आदि का था। गोविंद जी बाद में परिषद और भाजपा में बड़े पदों पर रहे। उनकी और राय साहब की जोड़ी बिहार आंदोलन का नेतृत्व करने वालों में अगली पंक्ति में थी।
उस आंदोलन में छात्र-युवाओं के समर्पण का गजब अनुभव हुआ। सभी को पता है कि जेपी ने बिहार आंदोलन की अगुवाई करना तभी स्वीकारा जब उन्हें विश्वास दिलाया गया कि आंदोलन पूरी तरह से अहिंसक होगा। इसका ऐसा असर हुआ कि जो छात्र पहले पुलिस को देखते ही हाथों में ईंट-पत्थर उठा लेते थे। वही छात्र पुलिस की लाठी-गोलियों के बीच नारे लगाते थे कि ‘हमला चाहे जैसा भी हो हाथ हमारा नहीं उठेगा।‘ इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाने का फैसला एक दिन में नहीं किया। 1971 में पाकिस्तान को विभाजित करके स्वतंत्र बांग्लादेश बनवाने में उनकी बड़ी भूमिका थी। इस सफलता के बाद उनका राजनीतिक कद देश में ही नहीं दुनिया में काफी बड़ा हो गया था। उनके फैसलों पर किसी को सवाल करने की हिम्मत न थी। आपातकाल लगने की मुख्य वजह तो उनके खिलाफ 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन लाल सिन्हा का उनके 1971 के लोकसभा चुनाव को अवैध घोषित करने का फैसला माना जाता है लेकिन वास्तव में कई और कारण भी थे। वे अपने को किसी चुनौती से परे मानने लगी थीं। दूसरा कारण कांग्रेस की गुजरात की चिमन भाई मेहता की सरकार के खिलाफ छात्रों का नव निर्माण आंदोलन भी एक प्रमुख कारण बना। उस आंदोलन को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने पूरे प्रदेश का आंदोलन बनाया। यही काम परिषद ने फरवरी-मार्च, 1974 में बिहार में किया।
26 जून, 1976 की तारीख को बार-बार याद करना इसलिए जरूरी है ताकि इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश पर शासन करने वाला निरंकुश न हो। फिर से कोई शासक अपने को तानाशाह न मान बैठे और गुलामी से मुक्ति की लंबी लड़ाई के बाद मिली आजादी को संविधान के मौलिक अधिकारों के साथ देश की जनता जीवन यापन कर पाए। तब के राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद से 25 जून, 1975 की आधी रात को के देश में आपातकाल लगाने के आदेश पर हस्ताक्षर कराकर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 26 जून, 1975 की सुबह खुद रेडियो पर आकर देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की। इस घोषणा के साथ ही देश की जनता को संविधान से मिले नागरिक अधिकारों को रद्द कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण से लेकर विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दिया गया। 19 महीने देश जेलखाना बना रहा। लोगों के बोलने, लिखने आदि पर रोक लगा दी गई। अनुशासन के नाम पर लोगों को तरह-तरह से यातनाएं दी गई। कानून की अपने हिसाब से व्याख्या करने की कोशिश की गई।
इससे पहले जिस दिन 12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को अवैध घोषित किया था, उसी दिन गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आए। उस चुनाव में कांग्रेस पराजित हुई और विपक्षी गठबंधन की जनता मोर्चा चुनाव जीती। इंदिरा गांधी के करीबी सिद्धार्थ शंकर राय उनके चुनाव को अवैध घोषित किए जाने के खिलाफ नामी वकील नानी पालकीवाला के साथ मिलकर सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन पीठ में याचिका दायर की। पीठ के न्यायाधीश वीआर कृष्ण अय्यर ने 24 जून को इंदिरा गांधी की सदस्यता तो बहाल नहीं की लेकिन उन्हें प्रधानमंत्री बनाए रखने का आदेश दिया। दूसरी ओर इंदिरा गांधी पर कुर्सी छोड़ने के लिए दबाव बनाने को लेकर जनसंघ, लोकदल, सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस (ओ) ने मिल कर मोर्चा बनाया। इस मोर्चा को जयप्रकाश नारायण का संरक्षण था। मोरारजी देसाई इस मोर्चा के अध्यक्ष और नानाजी देशमुख महासचिव बनाए गए। 20 जून को बने जनता मोर्चा ने 25 जून को रामलीला मैदान में रैली की। उस रैली को असफल करने की सरकार की हर कोशिश विफल रही। उसी रैली के समापन के साथ ही जयप्रकाश नारायण समेत अनेक बड़े नेताओं की गिरफ्तारी हुई। अगली सुबह खुद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने की विधिवत घोषणा की।
आपातकाल घोषित होने से पहले बिहार छात्र आंदोलन ने बिहार की अब्दुल गफूर सरकार ही नहीं केन्द्र की इंदिरा गांधी सरकार की चूलें हिला दी थी। आंदोलनकारियों पर जितने अत्याचार हुए आंदोलन और मजबूत हुआ। पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव विद्यार्थी परिषद और समाजवादी युवजन सभा साथ मिलकर जीते। 18 मार्च, 1974 को विधानसभा का घेराव करने जा रहे छात्रों पर गोली चली, जिसमें छह छात्र मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। इस प्रदर्शन ने आंदोलन को घर-घर पहुंचा दिया। आंदोलन के प्रमुख छात्र नेता रामबहादुर राय को मीसा (मेंटिनेंस आफ इंटरनल सिक्योर्टी एक्ट) के तहत गिरफ्तार किया गया था। उस कानून को देश के चोटी के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राय साहब की गिरफ्तारी के सात महीने बाद 12 नवंबर, 1974 को न्यायाधीश वाईवी चन्द्रचूड़ और पीएन भगवती की पीठ ने अवैध करार दिया। इसके चलते उनकी रिहाई हो पाई। इसका उल्लेख जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने 18 नवंबर, 1974 के पटना के गांधी मैदान की रैली में किया। उसके पहले चार नवंबर, 1974 को पटना में हुए ऐतिहासिक मौन जुलूस में जेपी पर लाठी चली। जेपी को बचाने के लिए नानाजी ने लाठी का प्रहार अपने ऊपर ले लिया, जिसमें उनका हाथ टूट गया।
जनता पार्टी की सरकार बनी लेकिन कुछ बड़े नेताओं की महत्वाकांक्षा के चलते ढाई साल में जनता पार्टी और कांग्रेस के समर्थन से बनी चौधरी चरण सिंह की सरकार गिरी। फिर इंदिरा गांधी की सरकार बनी और उसके बाद सरकार बनने का लंबा ब्यौरा है। उसके बाद की कांग्रेस समेत किसी भी सरकार ने आपातकाल का समर्थन करने की बात कहना तो दूर उसकी लगातार आलोचना ही की। तब से हालात और राजनीति में काफी बदलाव हुआ है। आज कांग्रेस के बजाए भाजपा देश का मुख्य दल बन गया, जिसके नेताओं ने आपातकाल की पीड़ा झेली है। केन्द्र में भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार लगातार तीसरी बार बनी। आज की तारीख में देश के अस्सी फीसदी राज्यों में भी राजग की सरकार है। विपक्ष बेहद कमजोर है। विपक्षी दलों का गठबंधन आखिरी सांस ले रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद उसका आकार घटता ही जा रहा है। प्रधानमंत्री का दावेदार मानने वाले कई नेता अपने राज्यों की सत्ता से बाहर हो चुके हैं।
यह भाजपा और राजग के लिए जितनी अच्छी बात है, लोकतंत्र के लिए उतनी अच्छी नहीं। केवल विरोध के लिए नहीं सार्थक विरोध के लिए विपक्ष का होना जरूरी है। यह काम देश के छात्र-युवाओं को करना होगा। ऐसा पहले हुआ है। 1974 का बिहार छात्र आंदोलन इसमें मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता है। उस आंदोलन को 52 साल बाद याद करना और उसके सकारात्मक पक्ष पर अमल करना आज भी जरूरी है। वह आंदोलन जेपी के संपूर्ण क्रांति का वाहक था लेकिन नेताओं के निजी स्वार्थ ने उसकी सफलता में ग्रहण लगा दिया था। देश के लोकतंत्र को और बेहतर बनाने के लिए बिहार छात्र आंदोलन और आपातकाल पर लगातार चर्चा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि कोई भी दल या सरकार निरंकुश न हो जाए।
(लेखक, जाने-माने वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

