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बदलाव की बयार: केंद्र-राज्य समन्वय और बिहार की नई विकास गाथा

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बदलाव की बयार: केंद्र-राज्य समन्वय और बिहार की नई विकास गाथा


-डॉ. मीना कुमारी

कभी बिहार की पहचान देश के सबसे पिछड़े राज्यों में की जाती थी। बिहार का नाम अक्सर समस्याओं, पलायन और गरीबी के संदर्भ में लिया जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक नया बिहार आकार लेता दिखाई दे रहा है। यह बदलाव रातोंरात नहीं आया है और न ही केवल किसी एक सरकार या व्यक्ति का परिणाम है। इसके पीछे केंद्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर समन्वय, बुनियादी ढाँचे में निवेश, ग्रामीण विकास योजनाओं का विस्तार और कृषि को नई दृष्टि से देखने का प्रयास शामिल है।

बिहार की कहानी को समझने के लिए सबसे पहले गाँवों को समझना होगा क्योंकि राज्य की बड़ी आबादी खेती-किसानी पर निर्भर है। इसलिए बिहार में विकास का वास्तविक अर्थ तभी है जब उसका लाभ किसान और ग्रामीण समाज तक पहुँचे। पिछले एक दशक में बिहार के ग्रामीण परिदृश्य में सबसे बड़ा बदलाव सड़क, बिजली और जलापूर्ति के क्षेत्र में दिखाई देता है। जिन गाँवों तक कभी पहुँचना कठिन था, वहाँ आज सड़कें हैं। जहाँ बिजली कभी मेहमान की तरह आती थी, वहाँ अब अपेक्षाकृत नियमित आपूर्ति संभव हुई है। घर-घर नल का जल, ग्रामीण आवास और स्वच्छता जैसी योजनाओं ने जीवन की बुनियादी गुणवत्ता को बदलने का काम किया है।

इन परिवर्तनों का प्रभाव खेती पर भी पड़ा है। सड़कें बेहतर हुईं तो किसान की उपज बाजार तक तेजी से पहुँचने लगी। बिजली की उपलब्धता बढ़ी तो सिंचाई और कृषि आधारित छोटे उद्योगों को सुविधा मिली। डिजिटल कनेक्टिविटी बढ़ी तो किसान तक मौसम, बाजार और सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुँचना आसान हुआ।

केंद्र सरकार की योजनाओं ने इस बदलाव को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, ग्रामीण सड़क योजना और जल जीवन मिशन जैसी पहलों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आधार प्रदान किया। वहीं, राज्य सरकार ने कृषि रोडमैप, सिंचाई, ग्रामीण अवसंरचना और स्थानीय स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन के माध्यम से इन प्रयासों को जमीन पर उतारने का कार्य किया।

बिहार की कृषि केवल धान और गेहूँ तक सीमित नहीं है। मक्का, फल, सब्जियाँ, दुग्ध उत्पादन और मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में राज्य की बड़ी संभावनाएँ हैं। आज बिहार देश के प्रमुख मक्का उत्पादक राज्यों में गिना जाता है। सब्जी उत्पादन में भी उसकी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी है। यदि इन क्षेत्रों को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, कोल्ड स्टोरेज और बेहतर बाजार व्यवस्था से जोड़ा जाए, तो बिहार ग्रामीण समृद्धि का नया मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।

यहीं पर नेतृत्व की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहार में अब विकास की राजनीति को केवल घोषणाओं से आगे बढ़ाकर परिणामों से जोड़ने की आवश्यकता है। सम्राट चौधरी जैसे नेताओं की राजनीति का मूल्यांकन भी इसी कसौटी पर होगा कि वे किसान, युवा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को किस प्रकार विकास के केंद्र में रखते हैं।

आज बिहार का युवा केवल सरकारी नौकरी नहीं बल्कि अवसर चाहता है। वह अपने राज्य में उद्योग, कृषि-आधारित रोजगार और उद्यमिता के नए रास्ते देखना चाहता है। यदि कृषि को प्रसंस्करण, भंडारण, लॉजिस्टिक्स और निर्यात से जोड़ा जाए तो लाखों नए रोजगार पैदा किए जा सकते हैं। यह बिहार के पलायन की समस्या का भी एक स्थायी समाधान हो सकता है।

हालाँकि चुनौतियाँ अभी भी कम नहीं हैं। प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से कम है। औद्योगीकरण की गति को और तेज करने की आवश्यकता है। बाढ़ और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियाँ भी कृषि पर प्रभाव डालती हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद यह स्वीकार करना होगा कि बिहार अब केवल समस्याओं की कहानी नहीं है।

वास्तव में बिहार की नई कहानी सहयोग की कहानी है- केंद्र और राज्य के सहयोग की, योजनाओं और क्रियान्वयन के समन्वय की और सबसे बढ़कर उस किसान की मेहनत की जिसने हर कठिन परिस्थिति में उत्पादन और आशा दोनों को जीवित रखा। बिहार का भविष्य केवल महानगरों में नहीं लिखा जाएगा। वह खेतों की मेड़ों, ग्रामीण सड़कों, सिंचाई नहरों, किसान उत्पादक समूहों और गाँवों की नई आकांक्षाओं में लिखा जाएगा। यदि केंद्र और राज्य का यह सहयोग इसी प्रकार जारी रहता है और कृषि को विकास की धुरी बनाया जाता है तो आने वाले वर्षों में बिहार केवल विकास के आँकड़ों में नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि के मॉडल के रूप में भी देश के सामने खड़ा हो सकता है। बिहार की सबसे बड़ी ताकत उसकी जनसंख्या नहीं, उसकी जीवंत ग्रामीण ऊर्जा है। जब सरकार की नीतियाँ उस ऊर्जा के साथ जुड़ती हैं, तब विकास केवल रिपोर्टों में नहीं, लोगों के जीवन में दिखाई देता है।

(लेखिका, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश