अमानत में खयानत ! आगे की राह क्या हो ?
-गिरीश्वर मिश्र
पुण्य नगरी अयोध्या में प्रभु श्रीराम के नवनिर्मित भव्य मंदिर में चढ़ावे और दान के हिसाब-किताब की व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं और व्यवस्था में कई खामियाँ नजर आ रही हैं। पवित्र सरयू नदी के तट स्थित यह अवधपुरी विगत दिनों से कई तरह के आरोप-प्रत्यारोप के बीच चर्चा में बनी हुई है। हम सबको याद है कि लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मंदिर निर्माण का रास्ता साफ हुआ था। विगत वर्षों में अयोध्या धाम के जीर्णोद्धार के बाद वहाँ देश के विभिन्न भागों से अपार संख्या में श्रद्धालुओं और भक्तों का आना-जाना शुरू हुआ और वहाँ लोगों का जमावड़ा लगातार बना रहता है। विश्व के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं की इतनी संख्या में आना कीर्तिमान बना रहा है। इन सबके बीच अयोध्या का परिवेश निश्चित ही बदल रहा है और वहाँ की व्यवस्था में सुधार भी हो रहा है। आज पर्यटन और धार्मिक स्थलों पर आयोजनों के साथ अयोध्या के पूरे क्षेत्र की भौगोलिक और सामाजिक पारिस्थितिकी नया रूप ले रही है। ऐसे में पौराणिक नगरी अयोध्या राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर नई पहचान बनाने को उद्यत है।
यह क्षेत्र निश्चित ही अब देश में आर्थिक, आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के कार्यकलापों के अभिनव केंद्र के रूप में उभर रहा है। ऐसे में यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना है कि राममंदिर की देखरेख की प्रबंध व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। उसे लेकर ताजा घटनाक्रम रामभक्तों के लिए चिंताजनक हो रहे हैं। साथ ही उसे लेकर सियासी पारा भी गर्म हो रहा है। राममंदिर की व्यवस्था को लेकर लगा आरोप न केवल बेहद संगीन है बल्कि सबके लिए शर्मनाक भी। आरोप में कहा गया है कि मंदिर में आने वाले भक्तों द्वारा जो चढ़ावा प्रभु के श्रीचरणों में श्रद्धा भाव से अर्पित होता रहा है, उसे संभालने वाले ट्रस्ट द्वारा नियुक्त कर्मी आवश्यक ईमानदारी से अपना काम नहीं कर रहे थे। वे चढ़ावे को न सुरक्षित रख पा रहे थे बल्कि उसमें अपनी मर्जी से लगातार हेराफेरी भी करते आ रहे थे। इन लोगों पर चढ़ावे में आने वाली एकत्रित धनराशि को व्यवस्थित करने यानी गिनने, रखने आदि के बीच मौजूद राशि में से कुछ राशि गायब कर देने का आरोप भी लगा है। चढ़ावे में मिली नगदी की गिनती और उसकी निगरानी व्यवस्था बहुत लचर थी और उसमें खामियां पाई गईं। दान आने के बाद जो धनराशि की गिनती करते थे उनके मंदिर प्रवेश और मंदिर से बाहर जाने पर कोई सघन निगरानी की व्यवस्था नहीं थी।
इन लोगों के इस काम के लिए पात्रता और चयन प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। साथ ही भक्तों द्वारा भगवान की सेवा में अर्पित सोने-चाँदी के आभूषण आदि तथा अन्य बहुमूल्य भेंट को भी गायब करने के आरोप लग रहे हैं। बेईमानी और घूसखोरी के किस्से कई पुलिस और कोर्ट-कचहरी जैसे सरकारी जगहों और महकमों में चलते आ रहे हैं। आम आदमी उनसे सुपरिचित हैं। परंतु देवस्थान बड़े पवित्र होते हैं, उनकी मर्यादा होती है और बहुत से लोग लाचार होकर ईश्वर की शरण में आते हैं। वे अपना प्रणाम निवेदित कराते हैं और यथाशक्ति दान-दक्षिणा अर्पित करते हैं। उनकी आस्था और श्रद्धा के साथ इस तरह से खिलवाड़ अमानवीय अपराध है। राममंदिर के बही-खाते और लेनदेन की पारदर्शिता मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था और सरकार दोनों की साख को सुरक्षित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आश्चर्य की बात यह है कि अयोध्या के राममंदिर परिसर से जुड़ी इस तरह की खबर पहले भी यदाकदा आती थी परंतु उस पर किसी ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया और सारी व्यवस्था ज्यों-कि-त्यों चलती रही। ट्रस्ट के प्रबंधन पर सबका भरोसा था पर वास्तविकता कुछ और थी। जो मानक पद्धति या एसओपी तय थी, उसका पालन नहीं हो रहा था, न ही उसकी उपयुक्तता सुनिश्चित की गई थी। जो लोग काम पर लगे थे वे प्रशिक्षित न होकर कुछ लोगों की संस्तुति पर लगे थे। वहाँ प्रचलित व्यवस्था में कोई सुधार नहीं किया गया और सबकुछ ज्यों-का-त्यों पूर्ववत चलता रहा। तूल पड़ने पर इस मामले में करोड़ों का घोटाला करने के आरोपों में प्रथम दृष्टया सच्चाई भांप कर तत्काल कानूनी कारवाई करने और अपराधियों को दंडित करने के लिए राज्य सरकार ने जाँच बिठाने का निर्णय लिया। इस सिलसिले में उच्चस्तरीय एसआईटी गठित की गई है और उसकी आरंभिक जांच रिपोर्ट अब मिल चुकी है। एसआईटी ने मंदिर से जुड़े कर्मियों से बातचीत की, जानकारी एकत्र की और अपनी प्राथमिक रिपोर्ट सरकार को दी है। रिपोर्ट लेकर सरकार ने प्राप्त तथ्यों का संज्ञान लेकर कानून के आलोक में चढ़ावे की व्यवस्था से सीधे-सीधे जुड़े आठ मन्दिर कर्मियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दायर कर आगे की क़ानूनी कार्यवाही शुरू कर दी है। इन लोगों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।
ख़बर है कि इन संदिग्ध कर्मियों के पास से अच्छी ख़ासी रकम और जेवरात की भी बरामदगी हुई है। अब खबर आई है कि मंदिर ट्रस्ट से जुड़े दो शीर्षस्थ पदाधिकारियों ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है। इस क्रम में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव श्री चंपत राय और एक न्यासी डा. अनिल मिश्र ने अपने को मंदिर ट्रस्ट से अलग कर लिया है। कहते हैं कि एसआईटी के शक़ के घेरे में बहुत से लोग हैं जिनमें उच्च अधिकारी भी शामिल हैं। आरोप यह भी लग रहा है कि मंदिर के लिए सस्ती जमीन महंगे भाव पर खरीदी गई और अवैध कमाई की गई। जाँच के दायरे में सबकुछ है और उसके परिणाम के बाद ही कुछ आधिकारिक रूप से कहा जा सकता है। मामले की पुलिसिया जांच जारी है और अभी तक मंदिर ट्रस्ट से उसके हिसाब-किताब को लेकर कोई ब्योरा या जानकारी आधिकारिक रूप से किसी द्वारा सार्वजनिक नहीं की गई है। यह खेद का विषय है कि मंदिर ट्रस्ट अभी भी इस मामले में यथोचित रूप से गंभीर नहीं दिख रहा है। सोशल मीडिया में ट्रस्ट की और से सिर्फ़ यही कहा जा रहा है कि भविष्य में ऐसा फिर न होने का उपाय किया जाएगा।
सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण अयोध्या भारतवासियों के मन में अत्यंत पावन केंद्र के रूप में बसी हुई है। लोक स्मृति में राम की जन्मभूमि एक मोक्षदायी तीर्थस्थल है और अयोध्या में श्रीराम मंदिर का होना सबके मन में संजोई आकांक्षा रही है जो बड़े संघर्षों और बलिदानों के बाद फलीभूत हुई। सदियों की लंबी प्रतीक्षा के बाद यह मंदिर आज के भव्य रूप में आकार पा सका। अनेक विघ्न-बाधाओं को पार कर बड़ी जबरदस्त इच्छाशक्ति के साथ इस मंदिर का पुनर्निर्माण हो सका। कहना न होगा कि बड़ी रुचि और समर्पण के साथ निर्माण कार्य हुआ और प्रभु श्रीराम की भव्य मूर्ति को इसमें स्थापित किया गया।
यह संयोग ही है कि इस राममंदिर का निर्माण जितना धार्मिक आस्था का विषय रहा है उतना ही तीव्र राजनैतिक गतिविधि से भी जुड़ा रहा है। राजनैतिक दलों द्वारा चढ़ावे में गड़बड़ी होने के मुद्दे को लेकर कई तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। जो भी हो यह तो निश्चित है कि वर्तमान व्यवस्था में अनेक छिद्र हैं और उनको ठीक करने पर तत्काल ध्यान देना होगा। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के अयोध्या-धाम की प्रतिष्ठा को बचाए और बनाये रखना सबका दायित्व बनता है। मंदिर ट्रस्ट को यह सोचना होगा कि मंदिर की व्यवस्था के लिए सुयोग्य कार्यपालन अधिकारी हों जो प्रोफेशनल और तकनीकी ढंग से चाक-चौबंद और निरापद व्यवस्था को अंजाम दे सकें।
भारत में अनेक मंदिर और देव स्थान हैं जहाँ पहुंचने के लिए भक्त जनों का ताँता लगा रहता है। तिरुपति बालाजी, वैष्णो देवी, जगन्नाथ पुरी, बदरी केदार धाम, काशी विश्वनाथ मंदिर, महाकाल मंदिर उज्जैन, वैद्यनाथधाम, शिरडी साईं स्थान आदि अनेक स्थल भक्तजनों को निरंतर आकर्षित करते हैं। ऐसे स्थलों पर चढ़ावे की प्रचुर मात्रा की व्यवस्था, रखरखाव और सदुपयोग के लिए व्यापक विचार-विमर्श कर नीति बनाना जरूरी है। अच्छा हो आराधना स्थली की आवश्यकताओं को पूरा कर विभिन्न क्षेत्रों में स्वास्थ्य और शिक्षा की सुविधाओं को सुधारने में चढ़ावे की धनराशि का उपयोग किया जाय। कुछ स्थलों पर ऐसा हो भी रहा है किंतु अभी भी चढ़ावे की धनराशि का सदुपयोग सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है।
(लेखक, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

