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अमरनाथ यात्रा का संदेशः जीवन का प्रत्येक क्षण शिवमय बन जाए

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अमरनाथ यात्रा का संदेशः जीवन का प्रत्येक क्षण शिवमय बन जाए


-​स्वामी अवधेशानंद गिरि

​“शुभं करोति कल्याणं, शिवः सर्वत्र संस्थितः।” श्री अमरनाथ धाम केवल एक तीर्थ नहीं अपितु सनातन भारत की तपःपरम्परा, वैराग्य, आत्मशुद्धि और शिवतत्त्व की सजीव अनुभूति का दिव्य केन्द्र है। यहाँ पहुँचने वाला प्रत्येक श्रद्धालु केवल हिमालय की ऊँचाइयों की यात्रा नहीं करता बल्कि अपने ही अंतःकरण की गहराइयों की ओर अग्रसर होता है। ​कभी-कभी प्राकृतिक परिस्थितियों के कारण बाबा बर्फानी का हिमलिंग पूर्ण रूप में दिखाई नहीं देता अथवा अंतर्ध्यान हो जाता है। ऐसे समय अनेक श्रद्धालुओं के मन में विषाद उत्पन्न होना स्वाभाविक है। किन्तु क्या शिव केवल हिमलिंग में ही सीमित हैं? क्या अनन्त, अखण्ड, सर्वव्यापक महादेव किसी एक दृश्य रूप के अभाव से अप्रकट हो जाते हैं?

​भगवत्पाद भाष्यकार भगवान् आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त की दृष्टि में परमात्मा नित्य, निराकार, सर्वव्यापक और अखण्ड चैतन्य है। वही परम शिव कभी हिमलिंग के रूप में दर्शन देते हैं तो कभी हिमालय की निःशब्दता में, कभी गुफा की दिव्य शांति में तो कभी श्रद्धालु के निर्मल हृदय में स्वयं प्रकाशित हो जाते हैं।

​शिवमहिम्न स्तोत्र में भगवान् शिव की अनन्त महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया हैः

​असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे

सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी।

लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं

तदपि तव गुणानामीश पारं न याति॥

(यदि नील पर्वत स्याही बन जाए, समुद्र स्याही पात्र बन जाए, कल्पवृक्ष की शाखा लेखनी बन जाए और सम्पूर्ण पृथ्वी कागज़ बन जाए तथा स्वयं सरस्वती अनन्तकाल तक लिखती रहें, तब भी हे महादेव! आपके गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।)

​अतः जो अनन्त है, उसे किसी एक दृश्य रूप तक सीमित नहीं किया जा सकता। हिमलिंग भगवान् की करुणा का एक दिव्य प्रतीक है; परन्तु शिव की सत्ता उससे कहीं अधिक व्यापक, असीम और सनातन है।

​अमरनाथ यात्रा: त्याग से आत्मबोध तक की कल्याणकारी यात्रा

​लोकश्रुति के अनुसार, माता पार्वती को अमरत्व का परम रहस्य सुनाने से पूर्व भगवान् शिव ने मार्ग में अपनी समस्त लौकिक विभूतियों (प्रतीकों) और आसक्तियों का क्रमशः परित्याग किया-

​पहलगाम में नंदी को विराम दिया।

​चंदनवाड़ी में मस्तक के चंद्र का त्याग किया।

​शेषनाग में नागों का विसर्जन किया।

​महागुणस पर्वत पर श्रीगणेश को विराम दिया।

​पंचतरणी में पंचमहाभूतों के प्रतीकात्मक अतिक्रमण द्वारा समस्त देहाभिमान का अतिक्रमण किया।

​यह केवल पौराणिक कथा ही नहीं बल्कि प्रत्येक साधक की आन्तरिक साधना का दिव्य संकेत है। जब तक अहंकार, ममता, देहाभिमान और आसक्ति का त्याग नहीं होता तब तक अमरकथा का वास्तविक श्रवण सम्भव नहीं। अतः अमरनाथ की यात्रा पैरों से कम और अंतःकरण से अधिक की जाती है। जब श्रद्धालु भगवान् अमरनाथ की उस पावन गुफा में प्रवेश करता है, तब वह केवल एक गुफा के सम्मुख नहीं अपितु उस दिव्य तपोभूमि में उपस्थित होता है जहाँ स्वयं देवाधिदेव भगवान् मृत्युंजय महादेव ने आत्मा, ब्रह्म, जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म, मोक्ष और अमरत्व का परम रहस्य प्रकट किया था।

​शिव का वास्तविक पूजन

​भगवत्पाद शंकराचार्य विरचित 'शिवमानसपूजा' हमें बताती है कि भगवान् शिव की सर्वोच्च आराधना बाह्य सामग्री से नहीं बल्कि निर्मल अंतःकरण से होती है-

​“आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं।

पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः॥”

(​हे प्रभु! आप ही मेरे आत्मस्वरूप हैं, मेरी बुद्धि ही पार्वती हैं, प्राण आपके गण हैं, यह शरीर आपका मंदिर है; मेरे समस्त कर्म ही आपकी पूजा हैं) अंत में- “यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम्॥” अर्थात हे शम्भो! मैं जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है। ​

यही अमरनाथ यात्रा का वास्तविक संदेश है- जीवन का प्रत्येक क्षण शिवमय बन जाए।

​हिमलिंग अंतर्ध्यान हो सकता है, शिव नहीं। यदि हिमलिंग पूर्ण रूप में न भी दिखाई दे तो श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। जिसने उस दिव्यधाम तक पहुँचने का सौभाग्य पाया, जिसने कठिन मार्ग की तपस्या की, जिसने “हर-हर महादेव” का उद्घोष करते हुए अपने भीतर के अहंकार को पिघलाया, वास्तव में वही शिवकृपा और उनके असीम अनुग्रह का अधिकारी है।

​शिव केवल हिमलिंग में नहीं; वे हिमालय की प्रत्येक शिला में हैं, गुफा की प्रत्येक शीतल श्वास में हैं, यात्रियों के प्रत्येक कदम में हैं, प्रत्येक मंत्र में हैं, प्रत्येक अश्रु में हैं, भक्ति के प्रत्येक भाव में हैं और प्रत्येक हृदय में विराजमान हैं। हिमलिंग के दर्शन महादेव का प्रसाद हैं किन्तु अमरनाथ की यात्रा स्वयं महादेव की कृपा का साक्षात् अनुभव है। ​अतः स्मरण रहे कि हिमलिंग अंतर्ध्यान हो सकता है, शिव कभी नहीं। वे नित्य हैं, शाश्वत हैं, सर्वव्यापक हैं और श्रद्धा से परिपूर्ण प्रत्येक हृदय में सदैव प्रकाशित हैं।

(लेखक, जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश