जब नौकरशाही खुद कटघरे में खड़ी हो जाए
- डॉ. सत्यवान सौरभ
हरियाणा की प्रशासनिक व्यवस्था इन दिनों ऐसे दौर से गुजर रही है जिसने भारतीय नौकरशाही की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और आंतरिक एकजुटता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। सामान्यतः भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अधिकारियों को शासन व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे राजनीतिक परिवर्तन के बावजूद प्रशासनिक निष्पक्षता, संवैधानिक मूल्यों और जनहित को सर्वोपरि रखें। किंतु जब स्वयं उसी सेवा के अधिकारी एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगें, जांच एजेंसियों के समक्ष एक-दूसरे की भूमिका पर प्रश्न उठाने लगें और प्रशासनिक तंत्र के भीतर अविश्वास का वातावरण बन जाए तब यह केवल कुछ व्यक्तियों का मामला नहीं रह जाता बल्कि पूरी शासन व्यवस्था की साख पर प्रभाव डालता है। हाल के घटनाक्रम में हरियाणा के कई आईएएस अधिकारियों की गिरफ्तारी, अन्य अधिकारियों के विरुद्ध अभियोजन स्वीकृति तथा आपसी आरोप-प्रत्यारोप ने यही संकेत दिया है कि मामला व्यक्तिगत दायित्व से आगे बढ़कर संस्थागत संकट का रूप ले रहा है।
बताया गया है कि बैंकिंग और सरकारी धन से जुड़े बड़े वित्तीय अनियमितता प्रकरण में कई वरिष्ठ अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई हुई है। कुछ अधिकारी गिरफ्तार हुए, जबकि अन्य के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत अभियोजन की स्वीकृति दी गई। सबसे अधिक चर्चा इस बात की रही कि इस बार प्रशासनिक सेवा के भीतर वह परंपरागत एकजुटता दिखाई नहीं दी, जिसकी अपेक्षा अक्सर ऐसे मामलों में की जाती रही है। इसके विपरीत विभिन्न अधिकारियों द्वारा अपने बचाव में दूसरे अधिकारियों की भूमिका पर प्रश्न उठाए गए, फाइल नोटिंग, मौखिक निर्देश और निर्णय प्रक्रिया को लेकर नए विवाद सामने आए। इससे यह धारणा बनी कि प्रशासनिक सेवा के भीतर विश्वास का ताना-बाना कमजोर हो रहा है।
यह स्थिति केवल हरियाणा तक सीमित नहीं मानी जानी चाहिए। पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न राज्यों में नौकरशाही और राजनीति के संबंधों, प्रशासनिक जवाबदेही, जांच एजेंसियों की भूमिका तथा निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर लगातार बहस होती रही है। किंतु हरियाणा का मामला इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विवाद केवल सरकार और अधिकारियों के बीच नहीं बल्कि अधिकारियों के बीच ही खुलकर सामने आया है। इससे प्रशासनिक सेवा की उस सामूहिक छवि को आघात पहुंचा है जो निष्पक्षता, गोपनीयता और संस्थागत अनुशासन पर आधारित मानी जाती है।
लोकतांत्रिक शासन में किसी भी अधिकारी का कानून से ऊपर होना स्वीकार्य नहीं है। यदि किसी अधिकारी ने भ्रष्टाचार किया है, सरकारी धन के दुरुपयोग में भूमिका निभाई है अथवा अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया है तो उसके विरुद्ध निष्पक्ष जांच और विधि सम्मत कार्रवाई अनिवार्य है। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी, निष्पक्ष और राजनीतिक प्रभाव से मुक्त दिखाई दे। केवल न्याय होना पर्याप्त नहीं, न्याय होते हुए दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि अधिकारियों के बीच असहजता दिखाई दी कि राज्य की जांच एजेंसी द्वारा कार्रवाई के बाद मामला केंद्रीय जांच एजेंसी तक कैसे पहुंचा। कुछ अधिकारियों ने इस निर्णय पर भी प्रश्न उठाए हैं। हालांकि किसी भी मामले की जांच किस एजेंसी द्वारा होगी, यह संबंधित परिस्थितियों और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करता है लेकिन ऐसी स्थितियां प्रशासनिक मनोबल को प्रभावित करती हैं और सेवा के भीतर असुरक्षा की भावना पैदा कर सकती हैं।
प्रशासनिक सेवा का मूल आधार केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व है। प्रत्येक फाइल, प्रत्येक वित्तीय स्वीकृति और प्रत्येक प्रशासनिक निर्णय सामूहिक प्रक्रिया का हिस्सा होता है। इसलिए यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो केवल अंतिम हस्ताक्षर करने वाले अधिकारी को दोषी मान लेना भी उचित नहीं होगा और केवल यह कहकर जिम्मेदारी से बच निकलना भी उचित नहीं कि निर्णय सामूहिक था। जांच का उद्देश्य व्यक्तिगत दायित्व निर्धारित करना होना चाहिए, न कि केवल कुछ नामों को चिन्हित कर देना।
यह भी विचारणीय है कि क्या हमारी प्रशासनिक प्रणाली में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर्याप्त रूप से प्रलेखित होती है। आज भी अनेक महत्वपूर्ण निर्णय मौखिक निर्देशों, अनौपचारिक बैठकों और फोन पर हुई चर्चाओं के आधार पर आगे बढ़ जाते हैं। जब तक सब कुछ सामान्य चलता है, तब तक यह व्यवस्था सुविधाजनक लगती है लेकिन जैसे ही कोई विवाद सामने आता है, वही मौखिक निर्देश सबसे बड़ा विवाद बन जाते हैं। इसलिए शासन व्यवस्था में प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय का लिखित रिकॉर्ड, डिजिटल ट्रैकिंग और स्पष्ट उत्तरदायित्व तय होना चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पक्ष नौकरशाही के मनोबल से जुड़ा है। ईमानदार अधिकारियों के मन में यह आशंका पैदा हो सकती है कि यदि भविष्य में किसी सामूहिक निर्णय पर विवाद हुआ तो कहीं उन्हें भी बिना पर्याप्त सुरक्षा के कठघरे में न खड़ा कर दिया जाए। दूसरी ओर यदि भ्रष्टाचार के मामलों में कठोर कार्रवाई नहीं होगी तो जनता का विश्वास समाप्त होगा। इसलिए संतुलन अत्यंत आवश्यक है। ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत सुरक्षा और भ्रष्ट अधिकारियों को कठोर दंड- दोनों समान रूप से आवश्यक हैं।
हरियाणा का यह प्रकरण प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। भारत में लंबे समय से सिविल सेवा सुधारों पर चर्चा होती रही है। फाइलों का पूर्ण डिजिटलीकरण, निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता, समयबद्ध ऑडिट, स्वतंत्र सतर्कता तंत्र तथा उत्तरदायित्व आधारित प्रशासन आज की आवश्यकता हैं। यदि प्रत्येक वित्तीय निर्णय का डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध होगा तो बाद में जिम्मेदारी तय करना अपेक्षाकृत सरल होगा और अनावश्यक विवाद भी कम होंगे।
यह भी आवश्यक है कि राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के संबंध स्पष्ट संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहें। लोकतंत्र में नीति निर्माण निर्वाचित सरकार का अधिकार है, जबकि उसका निष्पक्ष क्रियान्वयन प्रशासनिक सेवा की जिम्मेदारी है। यदि दोनों के बीच संतुलन बिगड़ता है तो प्रशासनिक निष्पक्षता प्रभावित होती है। इसलिए संस्थागत स्वतंत्रता और जवाबदेही दोनों का समान महत्व है।
इस पूरे प्रकरण से एक सामाजिक संदेश भी निकलता है। आम नागरिक अक्सर यह मानता है कि उच्च पदों पर बैठे लोग कानून से ऊपर होते हैं। यदि किसी भी स्तर पर निष्पक्ष जांच होती है और दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई होती है तो इससे कानून के शासन की भावना मजबूत होती है। लेकिन यदि जांच चयनात्मक दिखाई देती है या राजनीतिक प्रभाव का संदेह उत्पन्न होता है तो जनता का विश्वास कमजोर पड़ता है। इसलिए जांच एजेंसियों की निष्पक्षता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
भारतीय प्रशासनिक सेवा जैसी प्रतिष्ठित संस्था ने दशकों तक देश के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। आपदा प्रबंधन, विकास योजनाओं के क्रियान्वयन, चुनाव संचालन, कानून-व्यवस्था और जनकल्याणकारी योजनाओं में आईएएस अधिकारियों की भूमिका निर्विवाद रही है। कुछ मामलों के आधार पर पूरी सेवा की छवि पर प्रश्न उठाना उचित नहीं होगा। किंतु यह भी सत्य है कि कुछ गंभीर प्रकरण पूरी संस्था की प्रतिष्ठा को प्रभावित कर देते हैं। इसलिए आत्ममंथन की आवश्यकता स्वयं प्रशासनिक सेवा को भी है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हरियाणा का यह विवाद केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रहे बल्कि इससे प्रशासनिक सुधारों की दिशा में ठोस पहल हो। निर्णय प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाया जाए, डिजिटल उत्तरदायित्व प्रणाली विकसित की जाए, भ्रष्टाचार के मामलों में त्वरित और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जाए तथा ईमानदार अधिकारियों को संस्थागत संरक्षण दिया जाए। इससे जनता का विश्वास भी बढ़ेगा और प्रशासनिक सेवा का मनोबल भी मजबूत होगा।
अंततः किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल राजनीतिक नेतृत्व पर निर्भर नहीं करती बल्कि उसकी प्रशासनिक व्यवस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर भी आधारित होती है। यदि नौकरशाही के भीतर ही अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप और संस्थागत अस्थिरता बढ़ने लगे तो उसका सीधा प्रभाव शासन की गुणवत्ता पर पड़ता है।
हरियाणा की हालिया घटनाएं एक चेतावनी हैं कि प्रशासनिक संस्थाओं की साख बनाए रखने के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और विधि का समान शासन ही सबसे प्रभावी उपाय है। दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसके विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए; वहीं निर्दोष अधिकारी को भयमुक्त वातावरण और न्यायपूर्ण प्रक्रिया का भरोसा भी मिलना चाहिए। यही संतुलन लोकतांत्रिक शासन की सबसे बड़ी शक्ति है और यही प्रशासनिक व्यवस्था की वास्तविक विश्वसनीयता का आधार भी।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
---------------
हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश

