पाल महापंचायत : सामाजिक सुधार की अच्छी शुरुआत, लेकिन मंजिल अभी दूर
डॉ. शिव सिंह रावत
छह सितंबर को हरियाणा के पलवल जिले के मंडकौला में आयोजित 52 पाल महापंचायत ने विवाह में फिजूलखर्ची, दिखावे, शराब-नशे और अन्य सामाजिक बुराइयों के खिलाफ एक स्वागतयोग्य संदेश दिया। सामाजिक सुधार की शुरुआत अक्सर छोटे कदमों से होती है, लेकिन उसकी वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वे कदम हमें कितनी दूर तक ले जाते हैं। असल सवाल यह है कि यदि हम विवाह का खर्च कम कर दें, लेकिन दहेज, घरेलू हिंसा, नशाखोरी, बेटियों के साथ भेदभाव और सामाजिक प्रभाव के दुरुपयोग को सहन करते रहें, तो क्या हम वास्तव में सामाजिक रूप से सुधारवादी समाज कह सकते हैं? मेरी दृष्टि में इस महापंचायत को किसी सुधार प्रक्रिया का निचोड़ नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत के रूप में देखा जाना चाहिए।भारतीय समाज में विवाह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि परिवार, रिश्तों और खुशियों का महत्वपूर्ण उत्सव है। समस्या उत्सव मनाने में नहीं, बल्कि उसके साथ जुड़ी अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा, दिखावे और आर्थिक दबाव में है। महंगे समारोह, बड़ी बारातें, भोजन की अत्यधिक विविधता और आभूषणों को लेकर प्रतिस्पर्धा गरीब तथा मध्यमवर्गीय परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ डाल सकती है। इसलिए संदेश स्पष्ट होना चाहिए-संस्कृति को नहीं, सामाजिक बुराइयों को रोकें। उत्सव को नहीं, दिखावे को समाप्त करें। दहेज के मामले में भी यही स्पष्टता जरूरी है। सवाल यह नहीं होना चाहिए कि दहेज की कोई स्वीकार्य सीमा कितनी हो। दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के तहत दहेज देना, लेना या मांगना अपराध है। इसलिए सामाजिक संदेश होना चाहिए- दहेज की सीमा नहीं, दहेज पर जीरो टॉलरेंस। साथ ही, विवाह में दिए जाने वाले हर उपहार को स्वतः दहेज कहना भी उचित नहीं है। स्वेच्छा से दिए गए उपहार और विवाह के संबंध में मांग या अपेक्षा के आधार पर दिए गए धन, संपत्ति या मूल्यवान वस्तुओं के बीच अंतर को लागू कानूनी प्रावधानों के संदर्भ में समझना आवश्यक है।
बेटियों को दहेज नहीं, अधिकार दें -
बेटी का भविष्य आभूषण, वाहन या घरेलू सामान देकर सुरक्षित नहीं किया जा सकता। उसका भविष्य शिक्षा, कौशल, आर्थिक आत्मनिर्भरता और कानूनी अधिकारों से सुरक्षित होता है। हिंदू उत्तराधिकार कानून में 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को पैतृक संपत्ति में बेटों के समान अधिकार प्राप्त हैं। अब अगली चुनौती है - परिवार यह सुनिश्चित करें कि बेटियां अपने अधिकारों को जानें और उनका इस्तेमाल करने के लिए सशक्त भी हों। परंपरागत शब्द कन्यादान पर भी पर भी संवेदनशील संवाद जरूरी है। परंपराओं का सम्मान होना चाहिए, लेकिन बेटी किसी की संपत्ति नहीं है। इसलिए कन्या दान नहीं, कन्या सम्मान हो।
आखिर विवाह क्यों टूट रहे हैं?
हर वैवाहिक टूटन का दोष नई पीढ़ी पर डाल देना आसान है। यह कहना भी आसान है कि आज के युवाओं में रिश्ते निभाने की क्षमता नहीं रही, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। दहेज की मांग, शराब, घरेलू हिंसा, आर्थिक तनाव, आपसी अविश्वास और संवाद की कमी-ये सभी वैवाहिक संबंधों में दरार पैदा कर सकते हैं। जहां समझौते और पुनर्मिलन की संभावना हो, वहां परिवार का सहयोग, परामर्श और मध्यस्थता उपयोगी हो सकती है, लेकिन जहां हिंसा या गंभीर उत्पीड़न हो, वहां पीड़ित की सुरक्षा और कानून को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। वैवाहिक विवादों में बच्चों को भी मूक पीड़ित नहीं बनने देना चाहिए। उनकी मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा को सामाजिक सुधार के एजेंडे में उचित स्थान मिलना चाहिए।
सुधार की दिशा युवा तय करें -
सामाजिक सुधार केवल इस आधार पर सफल नहीं हो सकता कि युवा पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के फैसलों को चुपचाप स्वीकार करती रहे। जेन जी और जेनअल्फा पीढ़ी को भी इस सामाजिक संवाद में सार्थक भागीदारी होनी चाहिए। युवा स्थापित परंपराओं और मान्यताओं पर सवाल उठाते हैं। इन सवालों को परंपरा के लिए खतरा मानने के बजाय संवाद के माध्यम से उनका उत्तर खोजा जाना चाहिए। प्रेम विवाह और विशेष रूप से समान गोत्र विवाह जैसे सामाजिक प्रश्नों पर भी परिपक्व चर्चा की आवश्यकता है। परिवारों और समुदायों की चिंताओं को सुना जा सकता है, लेकिन वयस्कों की कानूनी स्वतंत्रता, सहमति और गरिमा का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। परंपरा और आधुनिकता का समाधान संघर्ष नहीं -संवाद है।
नशामुक्ति की असली परीक्षा -
विवाह समारोहों में शराब पर रोक एक अच्छी शुरुआत है, लेकिन नशामुक्त समाज की असली परीक्षा रोजमर्रा के जीवन में होगी। यदि हम चाहते हैं कि युवा नशे से दूर रहें, तो समाज को उनके सामने आकर्षक और सकारात्मक विकल्प भी रखने होंगे- खेल मैदान, पुस्तकालय, युवा केंद्र, डिजिटल शिक्षा और कौशल विकास के अवसर। यही नैतिक कसौटी चुनावों पर भी लागू होनी चाहिए। मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए शराब या नशीले पदार्थ बांटना गलत है, चुनावों में नशीले पदार्थों के इस्तेमाल के खिलाफ भी समाज को उतनी ही मजबूती से आवाज उठानी चाहिए।
प्रतिष्ठा की परिभाषा बदलनी होगी -
कोई भी समाज स्वस्थ भविष्य का निर्माण नहीं कर सकता, यदि हथियार, हिंसा, महंगी गाड़ियां और सोशल मीडिया पर शक्ति-प्रदर्शन प्रतिष्ठा के प्रतीक बन जाएं। युवाओं पर अश्लील गीतों तथा नृत्यों के बढ़ते प्रभाव पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। वास्तविक प्रतिष्ठा शिक्षा, चरित्र, उपलब्धि, सेवा और समाज के प्रति योगदान से मिलनी चाहिए - धन या शक्ति के प्रदर्शन से नहीं।
बुजुर्ग और परिवार भी एजेंडे में हों -
सामाजिक सुधार की चर्चा केवल विवाह और युवाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। तेजी से बदलते समाज में बुजुर्गों की देखभाल और सम्मान हमारी महत्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी बनी रहनी चाहिए। मृत्युभोज पर अनावश्यक खर्च कम करना स्वागतयोग्य कदम है। ऐसे खर्च को छात्रवृत्ति, पुस्तकालय, पौधरोपण, खेल सुविधाओं या जल संरक्षण जैसे सामाजिक कार्यों में लगाया जा सकता है। इस तरह व्यक्तिगत शोक को स्थायी सामाजिक विरासत में बदला जा सकता है।
सामाजिक नेतृत्व भी जवाबदेह हो -
पाल पंचायतों की शक्ति सामाजिक विश्वास और सामूहिक भागीदारी से आती है। यह विश्वास अपने साथ बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आता है। आज का समाज संविधान, कानून, न्यायपालिका और निर्वाचित संस्थाओं की व्यवस्था के भीतर संचालित होता है। कोई भी सामाजिक संस्था स्वयं को कानून से ऊपर नहीं है। इसलिए सामाजिक निर्णयों को चार कसौटियों पर परखा जाना चाहिए-नीयत, कानून, निष्पक्षता और परिणाम। महिलाओं और युवाओं की सार्थक भागीदारी हो, कमजोर परिवारों की आवाज सुनी जाए और व्यक्तिगत या राजनीतिक हित सामाजिक मंच पर हावी न हों। सामाजिक दबाव मनमाने दंड या सामाजिक बहिष्कार का आधार नहीं बनना चाहिए। जिस नैतिकता की अपेक्षा आम नागरिकों से की जाती है, वही कसौटी नेताओं, राजनेताओं और प्रभावशाली लोगों पर भी समान रूप से लागू होनी चाहिए।
महापंचायत से महाअभियान आंदोलन की ओर -
52 पाल महापंचायत ने एक महत्वपूर्ण शुरुआत की है। दहेज मुक्त विवाह, नशा मुक्त समाज, बेटियों की शिक्षा और अधिकार, घरेलू हिंसा के खिलाफ जागरूकता, वैवाहिक परामर्श, युवाओं के लिए खेल और कौशल विकास, बुजुर्गों की देखभाल तथा सामाजिक नेतृत्व में पारदर्शिता ऐसे क्षेत्र हैं जो समाज को बेहतर भविष्य की ओर ले जा सकते हैं। परंपराएं तभी जीवित रहती हैं, जब वे बदलते समय के साथ संवाद करती रहें, लेकिन असली चुनौती इस शुरुआत को निरंतर और व्यापक सामाजिक सुधार अभियान में बदलने की है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी

