महादेवी वर्मा : विरोध को जीने और प्रतिकार की क्षमता विकसित करने में दक्ष
आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय
जब मैने अपने विद्यार्थी-जीवन में महादेवी वर्मा जी से एक भेंटवार्ता की अवधि में मुक्त भाव से संवाद किया था, तब यह पक्ष उद्घाटित हुआ था कि वे स्वयं को प्रत्येक 'बन्धन' की जकड़न से मुक्त रहकर, आकाश में पंख फैलाकर प्रकृति से बतियाते हुए, उन्मुक्त पंछियों की तरह से उड़ान भरते हुए देखना चाहती थीं।
इलाहाबाद (अब प्रयागराज) आगमन के बाद और क्रॉस्थवेट स्कूल इलाहाबाद में प्रवेश करने के बाद महादेवी जी की साहित्य-साधना अबाध्य गति में चलती रही। 'मां ने सुनी एक करुण कथा' का लगभग सौ छन्दों में वर्णन कर, महादेवी जी ने एक खण्डकाव्य की रचना कर दी थी। सुभद्रा कुमारी चौहान जी से उनकी भेंट उसी विद्यालय में हुई थी। तब महादेवी जी पांचवीं और सुभद्रा जी सातवीं कक्षा में पढ़ती थीं। मिडिल से पूर्व ही महादेवी जी का ध्यान बाह्य जीवन के दु:ख की ओर गया और तभी से उनकी कृति में 'अबला', 'विधवा' आदिक शीर्षक से 'शब्दचित्र' (यहां 'रेखाचित्र' का प्रयोग अनुपयुक्त है।) स्थान पा चुके थे। महादेवी जी छात्रावास में किसी से भी बहुत कम बातें करती थीं। वे गुमसुम बैठीं अपनी रचनाशीलता में लगी रहती थीं। श्रीधर पाठक की पुत्री ललिता पाठक से उनका विशेष लगाव था। स्कूल में उनका जीवन 'बाल भगतिन' जैसा था। वे अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण कवि-सम्मेलनों में अधिक भाग नहीं ले पाती थीं। उनकी विद्यापीठ और घर में बाहरी-भीतरी क्षेत्र की सीमाएं बनी रहीं।
महादेवी वर्मा : एक दृष्टि में
माता :– हेमरानी देवी
पिता :– गोविन्द प्रसाद वर्मा
पति :– स्वरूपनारायण वर्मा
जन्म :– २६ मार्च १९०७ को फर्रुखाबाद में
निधन :– ११ सितम्बर १९८७ को प्रयागराज में
शिक्षा :– क्रॉस्थवेट स्कूल और इलाहाबाद विश्वविद्यालय
भाषा ज्ञान :– हिन्दी और संस्कृत
कृतियां :– नीहार, नीरजा, दीपशिखा, रश्मि, यामा, सांध्यगीत, प्रथम आयाम, सप्तपर्णा, अग्निरेखा, संधिनी (काव्य), अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएं (रेखाचित्र), श्रृंखला की कड़ियां, विवेचनात्मक गद्य, साहित्यकार की आस्था, संकल्पिता, क्षणदा, हिमालय (निबन्ध) इत्यादिक।
पुरस्कार-सम्मान :– ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मभूषण सम्मान, पद्मविभूषण सम्मान, साहित्य एकडेमी की फेलोशिप इत्यादिक।
निवास-स्थान :– 'साहित्यकार संसद्', अशोकनगर, इलाहाबाद।
इलाहाबाद से प्रकाशित क्रान्तिकारी पत्रिका 'चांद' में वर्ष १९३१ से १९३४ तक लिखती रहीं, जिनमें से २१ निबन्धों का संकलन नारी की स्थिति, अधिकार, कार्यक्षेत्र, व्यवसाय, समस्याओं तथा समाज में नारी की स्थिति का अमूल्य दस्तावेज है। आगे चलकर, उन्हें 'चांद' पत्रिका-सम्पादन करने का सुअवसर भी प्राप्त हुआ था। साहित्यिक परिवार में से इलाहाबाद में आने वाले साहित्यकारों के लिए तो उनका निवास 'घर-जैसा' ही था, किन्तु अन्य अतिथियों के लिए उनका द्वार मुक्त रूप से खुला ही रहता था। मैथिलीशरण गुप्त ने कहा था, मेरी प्रयाग यात्रा केवल संगम-स्नान से पूरी नहीं होती। उसको सर्वथा सार्थक बनाने के लिए मुझे सरस्वती (महादेवी) के दर्शन के लिए प्रयाग महिला विद्यापीठ जाना पड़ता है। संगम में कुछ फूल-अक्षत चढ़ाना पड़ता है। सरस्वती मन्दिर में कुछ प्रसाद मिलता है। 'साहित्यकार संसद्' हिन्दी के लिए उन्हीं का प्रसाद है।
उनकी काव्यगंगा प्रवहमान बनी रहे। परिणामस्वरूप 'प्रथम आयाम', 'आत्मिका', 'परिक्रमा', 'संधिनी', 'यामा', 'दीपगीत', 'नीलाम्बरा', 'गीतपर्व' इत्यादिक कृतियां अजस्र गीतधारा के रूप में संलक्षित होती रहीं। जिस भांति भक्तिकालीन मीराबाई ने अपनी भक्ति और अपने समर्पणयुक्त रचनाधर्मिता से हिन्दी-साहित्य में श्रीवृद्धि की थी, उसी भांति महीयसी महादेवी वर्मा ने छायावाद को समृद्ध करने में अपना अमूल्य अवदान किया था। प्राय: यह प्रश्न किया जाता है – महादेवी वर्मा को 'आधुनिक मीराबाई' क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर है– चूंकि महादेवी वर्मा की कृतियों में मीराबाई-सदृश भक्ति, प्रेम, समर्पण, आत्मिक पीड़ा, त्याग और साधना का दर्शन होता है। अत: उन्हें 'आधुनिक मीराबाई' कहा जाता है। उन्हें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानन्दन पन्त और सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' के क्रम में छायावाद के चतुर्थ स्तम्भ के रूप में साहित्यिक मान्यता प्राप्त है, जिसके मूल में प्रणय एवं वेदनाभूति, स्थावर-जंगम का एकात्म रूप-भाव, मूल्यचेतना एवं रहस्य से ओतप्रोत उनकी काव्यवस्तु रही है। यदि कोई अध्येता उनकी काव्यकृतियों का परिशीलन करे तो उसे बोध होगा कि महादेवी वर्मा की कृतियों में शब्दनिरूपण, वर्णविन्यास, संगीत-सौन्दर्य एवं उक्ति-भास्वरता का बहुविध निरूपण है। वे चाक्षुष, श्रव्य और स्पर्शिक बिम्बों का वितान तानने मे कुशल हैं। इसलिए उनकी रचनाओं में अप्रस्तुत रचना-विधान के माध्यम से प्रस्तुत की साम्यधर्मिता का सम्यक् परिचय प्राप्त होता है। वस्तुत: महादेवी और छायावाद एक-दूसरे के सम्पूरक हैं, क्योंकि उनका रचना-विधान इस तथ्य का साक्षी है– छायावाद ने महादेवी को जन्म दिया था और महादेवी ने छायावाद को जीवन।
महादेवी जी विविध आयोजनों में जीवनपक्ष, सामाजिक पक्ष, सामाजिक प्रतिक्रिया, सामाजिक मूल्यों आदि पर विशद और विस्तृत चर्चा करती थीं। यह एक अलग विषय है कि वे अन्तर्मुखी थीं। वे विरोध को जीती थीं और प्रतिकार करने की क्षमता भी विकसित कर लेती थीं। ऐसा नहीं देखा गया कि वे समकालीन साहित्यकारों में इतनी घुली-मिली रही हों अथवा घुल-मिल जाती रही हों। हां, वे सबका सम्मान करती थीं। यही कारण है कि जब भी कोई बाहर का साहित्यकार प्रयागराज (इलाहाबाद) आता था, वह महादेवी जी से मिलने की अभिलाषा को प्राथमिकता देता था।
इलाहाबाद के सभी प्रसिद्ध साहित्यकार उनसे भेंटकर, तत्कालीन काव्य-परिदृश्य पर संवाद अवश्य करते थे। उनसे दिशा-निर्देश की चाह रखते हुए मिलने वाले साहित्यकार-लेखक, कवि-कवयित्री, पत्रकार, समीक्षक आदि उनकी ओर से कभी निराश नहीं होते थे। यही कारण है कि उनका निवास 'साहित्यकार-संसद्' के रूप में विश्रुत और विख्यात रहा।
वे भी निराला जी की भांति किसी साहित्यकार का अपमान 'स्वयं' का अपमान समझती थीं। आर्थिक परिस्थिति से विक्षिप्त निराला जी को महल में रखने का उनका स्वप्न 'साहित्यकार-संसद्' निर्माण से पूर्ण हुआ था। यह अलग बात है कि 'साहित्यकार-संसद्' वर्तमान में 'विवाद' का विषय बना हुआ है और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसका निर्माण कराया गया था, वह अब पूरी तरह से प्रयागराज (इलाहाबाद) और बाहर के साहित्यकारों को अंगूठा दिखा रहा है।
बहरहाल, महीयसी महादेवी वर्मा जी ने अपनी सारस्वत लेखनी से प्रयागराज सहित शेष भारत को जिस कोटि की शब्दधर्मिता का गुण-धर्म दिया है, वह चिर-कालीन स्मरणीय रहेगा। हम महादेवी जी को प्रणाम करते हैं।
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / वीरेन्द्र सिंह

