विवेकानंद शिला स्मारक के शिल्पी– एकनाथ रानाडे
मुकुल कानिटकर
भारत के दक्षिणी छोर पर तीनों सागरों के संगमस्थल कन्याकुमारी में स्थित श्रीपाद शिला केवल एक शिला नहीं है। वह स्वामी विवेकानंद के जीवन की उस निर्णायक साधना की साक्षी है, जब परिव्राजक के रूप में संपूर्ण भारत का भ्रमण करने के बाद वे तीन दिन और तीन रात उस शिला पर ध्यानस्थ रहे। मानो भारतमाता के चरणों में बैठकर उन्हें अपने आगामी जीवन की दिशा और कार्ययोजना का साक्षात्कार हुआ।
स्वामी विवेकानंद की जन्मशताब्दी के अवसर पर इसी पावन शिला पर उनका स्मारक बनाने का विचार सामने आया।
विचार सरल था, किंतु उसकी राह अत्यंत कठिन। स्थानीय स्तर पर विरोध आरंभ हुआ। कुछ लोगों ने शिला को सेंट थॉमस से जोड़ते हुए वहां क्रॉस स्थापित करने का प्रयास किया। राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियाँ भी अनुकूल नहीं थीं। ऐसे समय इस कार्य का दायित्व जिस व्यक्ति के कंधों पर आया, वह थे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह एकनाथ रानाडे।
एकनाथ जी केवल स्मारक के निर्माता नहीं थे; वे मूलतः समन्वय के साधक थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जिसमें वैचारिक दृढ़ता और व्यवहार की सहजता अद्भुत रूप से साथ-साथ चलती थी। मध्य भारत में प्रचारक के रूप में कार्य करते हुए उनका संपर्क समाज के विविध वर्गों से रहा। कलकत्ता में रामकृष्ण मिशन के संन्यासियों से उनकी आत्मीयता थी तो ज्योति बसु जैसे वामपंथी नेताओं से भी उनके सहज संबंध थे। असम में भी उन्होंने विभिन्न विचारधाराओं और सामाजिक समूहों के बीच संवाद और सहयोग का अनुभव प्राप्त किया था।
संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के समय संविधान निर्माण और सरकार से संवाद की कठिन प्रक्रिया में भी एकनाथ जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्व से उनके संवाद में भी यही विशेषता दिखाई देती थी- विचारों में दृढ़ता, लेकिन व्यवहार में आत्मीयता।
एक प्रसंग में सरदार पटेल ने उनके विषय में कहा था कि लोग उन्हें लौह पुरुष कहते हैं, किंतु एकनाथ तो साक्षात् फौलाद हैं। यह फौलाद उनकी कठोरता में नहीं, बल्कि अपने ध्येय के प्रति अडिग रहते हुए असहमति रखने वाले व्यक्ति को भी साथ लेने की क्षमता में था।
विवेकानंद शिलास्मारक के निर्माण की पूरी कहानी इसी समन्वय-कौशल की कहानी है।
सबसे पहले केंद्रीय संस्कृति मंत्री हुमायूं कबीर की आपत्ति सामने आई। एकनाथ जी ने विरोध का प्रत्यक्ष उत्तर देने के बजाय एक ऐसी रणनीति अपनाई जिसमें जिम्मेदारी का बोध जगाया गया। उन्होंने कोलकाता में प्रेस के माध्यम से यह वातावरण बनाया कि बंगाल के महान सपूत स्वामी विवेकानंद का स्मारक तमिलनाडु के कन्याकुमारी में बन रहा है और उसकी अनुमति की निर्णायक कुंजी बंगाल के ही एक सांसद—केंद्रीय संस्कृति मंत्री—के हाथ में है।
वातावरण बनने के बाद वे मंत्री से मिले। परिणाम सामने था- आपत्ति दूर हो गई। अब अगली चुनौती तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सहमति थी।
यहीं एकनाथ जी के जनसंपर्क और संवाद-कौशल का असाधारण परिचय मिलता है। लाल बहादुर शास्त्री के माध्यम से प्रधानमंत्री तक पहुंचने की योजना बनी। सुझाव था कि कुछ सांसदों का ज्ञापन प्रधानमंत्री के सामने रखा जाए। अनुमान था कि 10-20 सांसदों के हस्ताक्षर पर्याप्त होंगे, लेकिन एकनाथ जी ने संसद के गलियारों में संवाद का ऐसा अभियान चलाया कि विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं के 323 सांसदों ने कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद के स्मारक के समर्थन में ज्ञापन पर हस्ताक्षर कर दिए।
यह संख्या उस समय के राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए और भी महत्वपूर्ण थी। जनसंघ के केवल चार सांसद थे, किंतु कांग्रेस, स्वतंत्र दल, समाजवादी और साम्यवादी दलों के सांसद भी इस अभियान में साथ आए। इतने व्यापक राजनीतिक मतैक्य का निर्माण किसी एक व्यक्ति के लिए असंभव-सा लगता है, किंतु एकनाथ जी ने इसे संभव कर दिखाया। उन्होंने किसी से अपनी विचारधारा स्वीकार करने को नहीं कहा; उन्होंने केवल एक ऐसे राष्ट्रीय विषय पर सहमति खोजी, जो सभी को जोड़ सकता था।
जब लाल बहादुर शास्त्री ने सांसदों के हस्ताक्षरों को देखा और उनकी सत्यता की पुष्टि की, तो उन्होंने कहा कि अब नेहरू जी को मनाना उनका काम है।
अंततः प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कन्याकुमारी की विवेकानंद शिला पर भव्य स्मारक बनाए जाने की घोषणा कर दी,
लेकिन संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भक्तवत्सलम पहले शिला पर किसी भी प्रकार के निर्माण के प्रबल विरोधी रह चुके थे। एकनाथ जी ने उनसे बार-बार मिलकर संवाद का मार्ग खुला रखा। धीरे-धीरे विरोध की तीव्रता कम हुई और स्मारक के पक्ष में सहमति बनने लगी। प्रारंभिक अनुमति एक छोटे से मंदिर और छोटी मूर्ति के लिए तैयार हुई। एकनाथ जी ने तत्काल कोई टकराव खड़ा नहीं किया। उन्होंने कहा कि स्थापत्य और आकार विशेषज्ञों का विषय है और कुछ डिजाइन तैयार कराकर वे पुनः मुख्यमंत्री के सामने रखेंगे।
यहीं एकनाथ जी की रणनीतिक सूझबूझ और संवाद की गहराई दिखाई देती है।
विभिन्न स्थापत्यविदों से रेखाचित्र तैयार कराए गए। रामकृष्ण मठ के अध्यक्ष स्वामी माधवानंद और द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी की स्वीकृति के बाद कांची परमाचार्य चंद्रशेखरेन्द्र सरस्वती जी से भी अनुमोदन प्राप्त किया गया। मुख्यमंत्री के सामने कई चित्र रखे गए। अंत में वह चित्र प्रस्तुत किया गया, जिसे कांची परमाचार्य का अनुमोदन प्राप्त था। अपने गुरु के हस्ताक्षर देखकर भक्तवत्सलम प्रभावित हुए और उसी मानचित्र को स्वीकार कर लिया।
तब एकनाथ जी ने सहजता से ध्यान दिलाया कि यह आकार तो मुख्यमंत्री द्वारा पूर्व में निर्धारित सीमा से कई गुना बड़ा है। अब मुख्यमंत्री के पास मुस्कुराते हुए यह कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था कि- ठीक है, यही बनेगा।
यह प्रसंग केवल चतुर रणनीति का उदाहरण नहीं है बल्कि यह बताता है कि एकनाथ जी विरोधी व्यक्ति को परास्त करने की अपेक्षा उसे सहभागी बनाने में विश्वास रखते थे। उन्होंने मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा को चुनौती नहीं दी; बल्कि उन्हें ही इस ऐतिहासिक कार्य का नेतृत्वकर्ता बना दिया। मतभेद रहते हुए भी संबंध बनाए रखना और संबंधों के माध्यम से सहमति का मार्ग खोलना- यही उनका समन्वय था।
शिलास्मारक के निर्माण में एक और अद्भुत अध्याय राष्ट्रव्यापी निधि-संग्रह का है। एक रुपये के कूपन के माध्यम से 35 लाख परिवारों से 84 लाख रुपये का संग्रह हुआ। यह केवल धन-संग्रह नहीं था; यह देश के सामान्य नागरिक को स्मारक के निर्माण से जोड़ने का अभियान था। विभिन्न राज्य सरकारों ने योगदान दिया। बंगाल में ज्योति बसु की पत्नी कमला बसु निधि-संग्रह समिति की संरक्षक बनीं। केरल में प्रखर साम्यवादी और संघ-विरोधी ईएमएस नंबूदरीपाद मुख्यमंत्री थे। स्वामी विवेकानंद के ‘दरिद्र देवो भव’ के संदेश को उनके सामने रखा गया और उन्हें भी इस राष्ट्रीय कार्य से जोड़ने का प्रयास किया गया।
नगालैंड से लेकर जम्मू-कश्मीर तक, देश के अलग-अलग हिस्सों से आए योगदान ने इस स्मारक को वास्तव में राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। शिला पर खड़ा हुआ स्मारक केवल पत्थर, स्थापत्य और मूर्ति का परिणाम नहीं था; उसके भीतर करोड़ों भारतीयों की भावनाओं, सहभागिता और विश्वास की ऊर्जा समाहित थी।
आज कन्याकुमारी में समुद्र के बीच स्थित विवेकानंद शिलास्मारक को देखते हुए उसके भव्य स्थापत्य से सहज ही प्रभावित हुआ जा सकता है। किंतु उसके पीछे छिपी सबसे बड़ी रचना शायद पत्थर की नहीं, सहमति की थी। राजनीतिक विरोध के बीच राजनीतिक सहमति, वैचारिक मतभेदों के बीच सामाजिक सहयोग और स्थानीय आपत्तियों के बीच राष्ट्रीय समर्थन जुटाना किसी साधारण संगठनात्मक क्षमता का परिणाम नहीं था।
एकनाथ रानाडे ने स्मारक के लिए केवल धन नहीं जुटाया, उन्होंने विश्वास जुटाया। उन्होंने केवल अनुमति नहीं प्राप्त की, उन्होंने सहमति निर्मित की। उन्होंने विरोधियों को हराने के बजाय उन्हें साथ खड़ा किया। यही कारण है कि विवेकानंद शिलास्मारक की कहानी केवल एक स्मारक के निर्माण की कहानी नहीं है; यह भारत की लोकतांत्रिक और सामाजिक शक्ति के समन्वय की कहानी भी है।
जिस श्रीपाद शिला पर स्वामी विवेकानंद को भारत के लिए अपने जीवन की योजना प्राप्त हुई थी, उसी शिला पर एकनाथ रानाडे ने अपने जीवन की साधना का प्रत्यक्ष रूप खड़ा कर दिया। स्वामीजी ने जिस भारत की कल्पना की थी, उसके निर्माण में विविधता को संघर्ष का कारण नहीं, समन्वय की शक्ति बनाने का संदेश निहित था।
इस अर्थ में एकनाथ रानाडे वास्तव में उस शिलास्मारक के केवल शिल्पी नहीं थे। वे उसके समन्वय-ऋषि थे- जिन्होंने विचारों की दृढ़ता को संबंधों की आत्मीयता से जोड़ा और असहमति के बीच सहमति का सेतु बनाया।
कन्याकुमारी की वह शिला आज भी समुद्र की लहरों के बीच अडिग खड़ी है। वह स्वामी विवेकानंद के ध्यान की साक्षी है, किंतु उसके ऊपर खड़ा स्मारक एकनाथ रानाडे की उस साधना का भी स्मरण कराता है, जिसमें राष्ट्र के लिए सबसे कठिन काम था- सबको साथ लेकर चलना।
(लेखक, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रचार टोली के सदस्य हैं।)
हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुलकर्णी

