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होरमुज स्ट्रेट : युद्ध लंबा खिंचा तो तेल व गैस के कीमतों में हाेगी वैश्विक बढ़ाेत्तरी

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होरमुज स्ट्रेट : युद्ध लंबा खिंचा तो तेल व गैस के कीमतों में हाेगी वैश्विक बढ़ाेत्तरी


- अमरेश द्विवेदी

ईरान पर अमेरिका एवं इजराइल के हमले के बाद पश्चिम एशिया में होर्मुज जल डमरूमध्य क्षेत्र एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन गया है। फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ने वाला यह संकरा समुद्री रास्ता दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। किसी भी सैन्य टकराव की स्थिति में यहां मामूली रुकावट भी युद्ध के परिणाम और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गहरा असर डाल सकती है।

होर्मुज जल क्षेत्र दुनिया के सबसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में गिना जाता है। अपने सबसे पतले हिस्से में यह लगभग 34 किलोमीटर चौड़ा है और इसी रास्ते से प्रतिदिन लगभग 20 मिलियन बैरल कच्चा तेल गुजरता है जाे वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का करीब 20–25% यहीं से होता है। यह दुनिया के एलएनजी व्यापार का लगभग 20% इसी मार्ग पर निर्भर है और कुल वैश्विक समुद्री व्यापार का लगभग 11% इस रास्ते से गुजरता है। इसके साथ ही एशिया के सबसे बड़े आयातक- चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया इस मार्ग पर विशेष रूप से निर्भर हैं।

होर्मुज क्षेत्र सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन का केंद्र है। युद्ध की स्थिति में यहां थोड़ी सी बाधा भी तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकती है। यही कारण है कि दुनिया की निगाहें इस संकरे लेकिन निर्णायक जलमार्ग पर टिकी हुई हैं।इस क्षेत्र का उत्तरी तट ईरान के पास है, जबकि दक्षिणी किनारा ओमान के मुसंदम प्रायद्वीप से जुड़ा है। ईरान उत्तरी प्रवेश द्वार और कई रणनीतिक द्वीपों पर नियंत्रण रखता है, जिससे उसे समुद्री गतिविधियों पर प्रभाव डालने की सामरिक क्षमता मिलती है।

साल 1980–88 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान “टैंकर युद्ध” ने इस मार्ग की संवेदनशीलता को उजागर किया था। तेल टैंकरों पर हमलों और समुद्री माइंस बिछाए जाने से वैश्विक ऊर्जा बाजार में घबराहट फैल गई थी और विदेशी नौसैनिक हस्तक्षेप बढ़ा था। हाल के वर्षों में भी प्रतिबंधों और क्षेत्रीय तनाव के दौरान जहाजों की जब्ती और चेतावनियों ने शिपिंग लागत और बीमा प्रीमियम काे बढ़ा दिया हैं।

ईरान पर अमेरिका और इजरायल के हमले के बाद अगर यह युद्ध लंबा खिंचता है तो वैश्विकस्तर पर इसके कई तात्कालिक प्रभाव दिखेंगे। जैसे कि

तेल और गैस की कीमतों में उछाल। सप्लाई चेन में अस्थिरता। यहां जहाजों के रूट बदलने से देरी और बढ़ी हुई लागत वैश्विक व्यापार को प्रभावित करेंगी। आर्थिक दबाव, जाे ऊर्जा आयातक देशों में महंगाई और औद्योगिक लागत बढ़ सकती है। इसके साथ ही सैन्य विस्तार का खतरा बना रहेगा जिससे समुद्री मार्ग की सुरक्षा के नाम पर बाहरी शक्तियों की मौजूदगी बढ़ जाएंगी और इससे टकराव और गहरा हाे जाएगा।

इसके अलावा कुछ पाइपलाइन विकल्प मौजूद हैं, लेकिन वे होर्मुज से गुजरने वाले समुद्री तेल और गैस सप्लाई के लिए विकल्प के रूप में नहीं देख सकते हैं। इसलिए यह गलियारा वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बना हुआ है।

होर्मुज सिर्फ एक समुद्री रास्ता या ऊर्जा आपूर्ति का मार्ग नहीं है, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संतुलन का केंद्र है। युद्ध की स्थिति में यहां थोड़ी सी बाधा भी तेल बाजार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा बदल सकती है। यही कारण है कि दुनिया की निगाहें इस संकरे लेकिन निर्णायक जलमार्ग पर टिकी हुई हैं। साथ ही यह भू-राजनीतितक शक्ति प्रदर्शन का केंद्र भी है। युद्ध की स्थिति में इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

इस क्षेत्र में ईरान की नौसैनिक रणनीति होर्मुज को अपने निरोधक सिद्धांत का मुख्य हिस्सा मानती है। ईरान ने इस समुद्री मार्ग पर तेज गश्ती नौकाएं, एंटी-शिप मिसाइलें, समुद्री माइंस और ड्रोन और तटीय रडार सिस्टम लगा रखे हैं। इन साधनों के जरिए ईरान पारंपरिक नौसैनिक ताकतों को चुनौती दे सकता है। यह असिमेट्रिक वॉरफेयर यानी असममित युद्ध मॉडल काे दिखाता है जहां बड़े युद्धपोतों के खिलाफ छोटे लेकिन तेज और घातक हमलों पर आधारित है।

दूसरी तरफ, संयुक्त राज्य अमेरिका लंबे समय से खाड़ी क्षेत्र में नौसैनिक मौजूदगी बनाए हुए है। अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट बहरीन में तैनात है और उसका मुख्य उद्देश्य समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इन तनाव के बीच यदि गलियारे पर दबाव बढ़ता है ताे मुमकिन है कि अमेरिका यहां अंतरराष्ट्रीय एस्कॉर्ट मिशन भी शुरू हो सकते हैं। इसके साथ ही मल्टीनेशनल टास्क फोर्स का गठन, ड्रोन और निगरानी गतिविधियां तेज़ हाेने के साथ ही इस टकराव का दायरा क्षेत्रीय से वैश्विक बन सकता है।

होर्मुज में बाधा का असर केवल तेल तक सीमित नहीं रहता। कच्चे तेल की कीमतों में अचानक उछाल, एलएनजी आपूर्ति में कमी से यूरोप और एशिया में ऊर्जा संकट, शेयर बाजारों में गिरावट, महंगाई दर में वृद्धि, शिपिंग और बीमा लागत में भारी बढ़ोतरी और ऊर्जा कीमतें बढ़ने से विकासशील देशों पर सबसे अधिक दबाव पड़ेगा।

इन सबके बीच एशियाई देश चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए खाड़ी पर काफी निर्भर हैं। चिंता का विषय यह है कि इससे यदि आपूर्ति बाधित होती है ताे रणनीतिक तेल भंडार का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। वैकल्पिक स्रोत तलाशना हाेगा, साथ ही ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक नीतिगत बदलाव करने पड़ेंगे।

अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत होर्मुज को अंतरराष्ट्रीय स्ट्रेट माना जाता है। वैसे ताे किसी भी देश को इसे पूरी तरह बंद करने का अधिकार नहीं है लेकिन वर्तमान हालात पर नजर डालें ताे सुरक्षा कारणों से प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं, जहाजों की तलाशी या रोक-टोक बढ़ सकती है तथा गलत आकलन से बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है।

होर्मुज क्षेत्र केवल एक भौगोलिक मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का संवेदनशील बिंदु है। यहां की अस्थिरता युद्ध को केवल सैन्य टकराव नहीं रहने देती, बल्कि उसे आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक स्तर पर बहुआयामी संघर्ष में बदल देगी।

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबंद्ध हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / अमरेश द्विवेदी