भारतीय ऋषियों की वैज्ञानिक दृष्टि का प्रमाण है अधिक मास
- आचार्य ललित मुनि
भारतीय संस्कृति में समय केवल घड़ी की सुइयों या कैलेंडर की तिथियों का क्रम नहीं है। यहां समय को प्रकृति, ऋतु, ग्रहों की गति और मानव जीवन की लय के साथ जोड़कर देखा गया है। सूर्य की ऊर्जा खेतों में अन्न पकाती है, चंद्रमा रातों को शीतलता प्रदान करता है और इन दोनों की गति से ही ऋतुएं, पर्व और मानव जीवन का क्रम निर्धारित होता है। भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले यह समझ लिया था कि यदि समय की गणना केवल सूर्य या केवल चंद्रमा के आधार पर की जाएगी तो धीरे-धीरे ऋतुओं और त्योहारों का संतुलन बिगड़ जाएगा। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए भारतीय कालगणना में अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) की व्यवस्था की गई। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म खगोलीय गणनाओं पर आधारित वैज्ञानिक व्यवस्था है।
भारतीय पंचांग मूलतः लूनिसोलर अर्थात चंद्र और सूर्य दोनों की गति पर आधारित है। चंद्रमा के आधार पर एक चांद्र मास लगभग 29.53 (29 दिन, 12 घंटे, 44 मिनट और 3 सेकंड) दिनों का होता है। इस प्रकार बारह चांद्र मास मिलाकर एक चांद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का बनता है। दूसरी ओर पृथ्वी को सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करने में लगभग 365.24 दिन लगते हैं, जिसे सौर वर्ष कहा जाता है। इस प्रकार दोनों वर्षों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर उत्पन्न हो जाता है। यह अंतर हर वर्ष बढ़ता रहता है और लगभग तीन वर्षों में यह लगभग 32 दिनों तक पहुंच जाता है, जो लगभग एक पूर्ण चांद्र मास के बराबर होता है। इसी अंतर को संतुलित करने के लिए भारतीय कालगणना में एक अतिरिक्त मास जोड़ा जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।
इस माह में बैशाख एवं जेठ का संधिकाल है, पंचांग में इसे पुरुषोत्तम मास के रुप में माना जाता है। यदि पंचाग में यह अतिरिक्त मास न जोड़ा जाए तो धीरे-धीरे ऋतुओं और त्योहारों का संतुलन बिगड़ जाएगा। हो सकता है कि कुछ वर्षों बाद दीपावली गर्मियों में आने लगे और होली शीत ऋतु के स्थान पर वर्षा ऋतु में पड़ने लगे। इससे केवल धार्मिक पर्वों का क्रम ही नहीं बिगड़ेगा, बल्कि कृषि चक्र और सामाजिक जीवन भी प्रभावित होगा। भारतीय ऋषियों ने इस समस्या को बहुत पहले समझ लिया था और उन्होंने प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाए रखने के लिए अधिक मास की व्यवस्था विकसित की।
अधिक मास की गणना भी अत्यंत वैज्ञानिक है। सामान्यतः प्रत्येक चांद्र मास में सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, जिसे संक्रांति कहा जाता है। लेकिन जब किसी चांद्र मास के दौरान सूर्य किसी नई राशि में प्रवेश नहीं करता, तब वह मास अधिक मास कहलाता है। सरल शब्दों में कहें तो जिस मास में कोई संक्रांति नहीं होती, वह अतिरिक्त मास माना जाता है। यह प्रक्रिया लगभग हर 32 महीने 16 दिन बाद घटित होती है।
प्राचीन भारतीय ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। सूर्य सिद्धांत, वेदांग ज्योतिष और ब्रह्म सिद्धांत जैसे ग्रंथ बताते हैं कि भारतीय ज्योतिष और खगोल विज्ञान केवल धार्मिक विश्वासों पर आधारित नहीं थे, बल्कि ग्रहों और नक्षत्रों की सूक्ष्म गति के गहन अध्ययन पर आधारित थे। भारतीय गणितज्ञों और खगोलविदों ने बिना आधुनिक उपकरणों के सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की गतियों का अत्यंत सटीक अध्ययन किया था। आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने इन गणनाओं को और अधिक परिष्कृत किया।
विश्व की अन्य सभ्यताओं में भी समय संतुलन के लिए अतिरिक्त मास की व्यवस्था रही है। बेबीलोनियन और यहूदी कैलेंडर में भी इंटरकैलरी मास जोड़ा जाता है। किन्तु भारतीय प्रणाली की विशेषता यह है कि यहां केवल दिनों की गणना नहीं की गई, बल्कि ऋतु, तिथि, नक्षत्र, योग और प्रकृति के अनेक आयामों को एक साथ जोड़कर समय का निर्धारण किया गया।
अधिक मास का धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रारंभ में इसे “मलमास” कहा जाता था और शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब अन्य मासों ने इसका तिरस्कार किया, तब भगवान विष्णु ने इसे अपना नाम देकर “पुरुषोत्तम मास” बना दिया। इसके बाद यह मास विशेष रूप से भगवान विष्णु की उपासना, जप, तप, दान और आत्मचिंतन के लिए महत्वपूर्ण माना जाने लगा।
इस कथा का मानवीय संदेश भी अत्यंत गहरा है। जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जिन्हें लोग महत्वहीन या व्यर्थ मान लेते हैं, लेकिन वही समय आत्ममंथन और आत्मविकास का अवसर बन सकता है। पुरुषोत्तम मास हमें यह सिखाता है कि जीवन की भागदौड़ से कुछ समय निकालकर स्वयं को समझना भी आवश्यक है। आधुनिक समय में जब तनाव, प्रतिस्पर्धा और मानसिक अशांति बढ़ रही है, तब यह परंपरा मनुष्य को ठहरकर आत्मिक संतुलन खोजने की प्रेरणा देती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी भारतीय कालगणना अत्यंत परिष्कृत है। आधुनिक खगोल विज्ञान यह स्वीकार करता है कि चांद्र और सौर वर्षों के बीच अंतर स्वाभाविक है और उसे संतुलित करने के लिए अतिरिक्त समय जोड़ना आवश्यक होता है। आज पूरी दुनिया में प्रयुक्त ग्रेगोरियन कैलेंडर में भी लीप वर्ष की व्यवस्था इसी सिद्धांत पर आधारित है। भारतीय पंचांग में अधिक मास उसी वैज्ञानिक सोच का अधिक विकसित और प्रकृति-सम्मत रूप है।
वर्ष 2026 में अधिक मास ज्येष्ठ मास के दौरान पड़ रहा है। इस अवधि में देशभर में विशेष पूजा-पाठ, भागवत कथा, दान और धार्मिक अनुष्ठान किए जाएंगे। लेकिन इसका वास्तविक महत्व केवल धार्मिक कर्मकांड तक सीमित नहीं है। यह भारतीय ज्ञान परंपरा की वैज्ञानिक दृष्टि, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और समय की सूक्ष्म समझ का जीवंत उदाहरण है।
वास्तव में पुरुषोत्तम मास भारतीय सभ्यता की उस दूरदृष्टि का प्रतीक है, जिसमें विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक माने गए हैं। भारतीय ऋषियों ने समय को केवल गणना का विषय नहीं माना, बल्कि जीवन और प्रकृति के संतुलन का आधार समझा। यही कारण है कि हजारों वर्षों बाद भी भारतीय कालगणना आज प्रासंगिक और वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दिखाई देती है।
पुरुषोत्तम मास हमें यह भी स्मरण कराता है कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की गतियां केवल आकाशीय घटनाएं नहीं, बल्कि हमारे जीवन, संस्कृति और चेतना से जुड़ी हुई हैं। अधिक मास इसी ब्रह्मांडीय संतुलन का उत्सव है, जो हमें समय, प्रकृति और आत्मा के साथ सामंजस्य स्थापित करने की प्रेरणा देता है।
(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के जानकार हैं।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

