अडानी प्रकरण भारतीय उद्योग जगत की छवि खराब करने का षड्यंत्र!
डॉ. मयंक चतुर्वेदी
वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रतिस्पर्धा आज महत्वपूर्ण हथियार बन चुकी है। ऐसे समय में यदि किसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था के सबसे बड़े औद्योगिक समूह पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोप लगाए जाते हैं, तो उसका प्रभाव उस कंपनी के साथ ही उस देश पर भी पड़ता है, जहां से उस कंपनी का सीधा संबंध रहता है। ऐसे में पूरे देश की निवेश छवि, वित्तीय विश्वसनीयता और औद्योगिक प्रतिष्ठा पर पड़ता है।
वस्तुत: अडानी समूह से जुड़ा अमेरिकन विवाद भी इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए, क्योंकि हाल के घटनाक्रमों में अमेरिकी न्याय विभाग (डीओजे) द्वारा स्वयं अपने मुकदमे के कानूनी आधार, अधिकार-क्षेत्र और साक्ष्यों पर पुनर्विचार करते हुए उसे आगे न बढ़ाने की दलील देना इस बहस को नई दिशा देता है। यह संदेह पैदा होता है कि कहीं यह पूरा प्रकरण सिर्फ इसलिए तो तैयार नहीं किया गया, ताकि भारत की तेजी से उभरती आर्थिक शक्ति की वैश्विक छवि को प्रभावित किया जा सके।
आज भारत विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। किंतु यह अनायास नहीं है, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य हो, आत्मनिर्भर भारत का संकल्प हो या वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में बढ़ते कदम, गहरायी से देखें तो इन सभी के पीछे देश के बड़े औद्योगिक समूहों का असाधारण योगदान है। ये उद्योग समूह भारत की आर्थिक शक्ति, रोजगार, नवाचार, निर्यात और आधारभूत संरचना के सबसे मजबूत स्तंभ हैं।
रिलायंस इंडस्ट्रीज ने वित्तीय वर्ष 2025-26 में लगभग 11.75 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड वार्षिक कारोबार दर्ज किया है। अडानी समूह का समेकित कारोबार लगभग 2.92 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। आदित्य बिड़ला समूह का वैश्विक कारोबार 65 अरब डॉलर से अधिक है। एचसीएल टेक्नोलॉजीज का वार्षिक राजस्व एक लाख करोड़ रुपये से ऊपर है, जबकि टाटा समूह का वैश्विक कारोबार अनेक लाख करोड़ रुपये तक फैला हुआ है। ओ.पी. जिंदल समूह इस्पात, ऊर्जा और अवसंरचना क्षेत्रों में देश की औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा रहा है।
इस तरह से अनेक भारतीय कंपनियों के आंकड़े दिए जा सकते हैं। वस्तुत: ये आंकड़े कॉरपोरेट सफलता के प्रतीक होने के साथ ही भारत के लिए उस आर्थिक सामर्थ्य का प्रमाण हैं जिसने उसे विश्व अर्थव्यवस्था में नई पहचान दिलाई है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद जिस प्रकार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अडानी समूह को लेकर माहौल बनाया गया, उससे भारतीय शेयर बाजार में अस्थायी अस्थिरता आई और वैश्विक निवेशकों के बीच अनेक आशंकाएं पैदा हुईं। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुई चर्चाओं ने अडानी समूह के बाजार मूल्य को प्रभावित किया।करोड़ों निवेशकों की पूंजी प्रभावित हुई और भारत के कॉरपोरेट गवर्नेंस पर भी सवाल उठाने का प्रयास किया गया, लेकिन बाद के घटनाक्रमों ने तस्वीर का दूसरा पक्ष भी सामने रखा।
भारतीय नियामक संस्थाओं की जांच, उच्चतम न्यायालय की निगरानी में हुई प्रक्रिया और अब अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा अपने ही मुकदमे के आधार पर गंभीर कानूनी प्रश्न उठाना यह संकेत देता है कि प्रारंभिक आरोपों को जिस प्रकार वैश्विक विमर्श का विषय बनाया गया, वह पूरी तरह निर्विवाद नहीं था। जब स्वयं अभियोजन पक्ष अपने मामले की कानूनी मजबूती पर पुनर्विचार करने लगे, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या शुरुआती नैरेटिव ने भारत की औद्योगिक छवि को आवश्यकता से अधिक नुकसान पहुंचाया?
यहां हम सभी को यह भी समझना होगा कि भारत के बड़े उद्योगपति सिर्फ लाभ अर्जित करने वाले कारोबारी नहीं हैं। वे देश के सबसे बड़े रोजगार सृजक, करदाता और निवेशक भी हैं। रिलायंस, टाटा, अडानी, बिड़ला, जिंदल और एचसीएल जैसे समूह प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से लाखों लोगों की आजीविका का आधार बने हुए हैं। यही कंपनियां हर वर्ष सरकार को हजारों करोड़ रुपये का कर देती हैं, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, आधारभूत संरचना और सामाजिक कल्याण योजनाओं को गति मिलती है।
देश के बंदरगाह, हवाई अड्डे, राजमार्ग, मेट्रो नेटवर्क, ऊर्जा परियोजनाएं, डिजिटल कनेक्टिविटी, दूरसंचार, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सेमीकंडक्टर जैसे भविष्य के क्षेत्रों में भी सबसे बड़ा निवेश इन्हीं उद्योग समूहों द्वारा किया जा रहा है। यदि भारत आज वैश्विक सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण केंद्र बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो उसके पीछे इन उद्योगपतियों की दीर्घकालिक निवेश क्षमता और जोखिम उठाने का साहस बहुत अधिक मायने रखता है।
वैश्विक निवेशक किसी एक कंपनी को अलग-थलग करके नहीं देखते। वे पूरे देश की नीतियों, नियामक व्यवस्था और कारोबारी वातावरण का आकलन करते हैं। ऐसे में यदि भारत के सबसे बड़े औद्योगिक समूहों में से किसी एक के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक माहौल बनाया जाता है, तो उसका असर विदेशी निवेश, शेयर बाजार, पूंजी प्रवाह और भारत की आर्थिक विश्वसनीयता पर पड़ना स्वभाविक है।
भारत आज केवल एक विशाल उपभोक्ता बाजार होने के साथ ही विश्व का उभरता हुआ उत्पादन, नवाचार और निवेश केंद्र बन चुका है। हरित ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रक्षा निर्माण, सेमीकंडक्टर, लॉजिस्टिक्स और आधुनिक अवसंरचना जैसे क्षेत्रों में भारतीय उद्योग समूह वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। यही कारण है कि आज भारतीय कंपनियां दुनिया के अनेक देशों में निवेश कर रही हैं और भारत को वैश्विक आर्थिक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ा रही हैं।
ऐसे समय में किसी भी भारतीय उद्योग समूह पर लगने वाले आरोपों का मूल्यांकन तथ्यों, कानून और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए, न कि पूर्वाग्रहों या अंतरराष्ट्रीय प्रचार के आधार पर। यदि किसी मामले में बाद में स्वयं जांच एजेंसियां अपने शुरुआती रुख पर पुनर्विचार करती दिखाई दें, तो यह आवश्यक हो जाता है कि पूरे घटनाक्रम का मूल्यांकन भी नए तथ्यों के आलोक में किया जाए।
क्योंकि किसी एक उद्योग समूह की प्रतिष्ठा पर लगने वाला आघात सिर्फ एक कॉरपोरेट विवाद तक सीमित न रहकर दूरगामी असर छोड़ता है। स्वभाविक तौर पर ऐसे प्रकरणों में इसका प्रभाव भारत की आर्थिक छवि, वैश्विक निवेश वातावरण और विकसित भारत के सपने तक महसूस किया जाता है। यही कारण है कि देश के वेल्थ क्रिएटर्स का निष्पक्ष मूल्यांकन तथ्यों, पारदर्शिता और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए, क्योंकि भारतीय संदर्भों में उनकी सफलता में ही भारत की आर्थिक शक्ति, वैश्विक प्रतिष्ठा और भविष्य की समृद्धि का एक महत्वपूर्ण आधार है।
अब जब अमेरिकी न्याय विभाग द्वारा अपने मुकदमे के कानूनी आधार और अधिकार-क्षेत्र पर पुनर्विचार करने की बात स्वीकार कर ली गई है, तब हर भारतीय को चाहिए कि वह अपने स्तर पर इससे जुड़ी सभी सच्चाई लोगों के सामने लेकर आएं, क्योंकि बात यहां सिर्फ अडानी संस्थान की नहीं है, वास्तव में भारत के उद्योग जगत की छवि खराब करने का यह वैश्विक षड्यंत्र था! यह स्थापित किया जाना भविष्य में भारत को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की दिशा में अत्यधिक आवश्यक है।
(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध है।)
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

