विदेशी धरती पर भारतीयों की हत्या, सिर्फ विरोध नहीं, निर्णायक कार्रवाई की जरूरत
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
ब्रिटेन के लंदन स्थित साउथॉल क्षेत्र में 26 वर्षीय भारतीय मूल के युवक गुरभेज सिंह की चाकू मारकर हत्या ने एक बार फिर विदेशों में रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। इस हमले के बाद ब्रिटिश पुलिस ने जांच शुरू कर दी है, कुछ लोगों को हिरासत में भी लिया गया, लेकिन अधिकांश को बाद में छोड़ दिया गया। यह स्थिति वास्वत में उस बढ़ती चिंता का हिस्सा है जिसमें विदेशों में भारतीय मूल के लोगों पर नस्लीय, सांप्रदायिक और हिंसक हमलों की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
पिछले कुछ वर्षों में कनाडा, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अन्य देशों में भारतीयों के खिलाफ हिंसा और नस्लीय हमलों के अनेक मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं का एक बड़ा हिस्सा ऐसा है जिसमें पीड़ितों को न्याय नहीं मिल पाया या फिर आरोपी आसानी से कानून के शिकंजे से बाहर निकल गए। इससे विदेशों में बसे भारतीय समुदाय के भीतर असुरक्षा की भावना और अधिक गहरी हुई है।
भारतीय संसद में प्रस्तुत आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच केवल कनाडा में 17 भारतीय छात्रों की हिंसक घटनाओं में मृत्यु हुई। संयुक्त राज्य अमेरिका में ऐसे नौ मामले दर्ज हुए। इसके अतिरिक्त ऑस्ट्रेलिया, किर्गिस्तान, ब्रिटेन, जर्मनी, चीन, डेनमार्क और ग्रेनाडा जैसे देशों में भी भारतीय नागरिक हिंसा का शिकार बने। वर्ष 2014 से 2025 के बीच विदेशों में भारतीयों पर नस्लीय हमलों के कुल 90 मामले दर्ज किए गए, जिनमें सर्वाधिक 40 मामले कनाडा से सामने आए। अमेरिका और जर्मनी भी इस सूची में प्रमुख स्थान रखते हैं।
यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाए तो स्थिति और भी गंभीर प्रतीत होती है। वर्ष 2021 से 2023 के बीच विदेशों में 28 हजार से अधिक भारतीयों की मृत्यु हुई, जिनमें 136 मौतें सीधे हिंसक घटनाओं से जुड़ी थीं। वर्ष 2023 में भारतीयों पर 86 हमले दर्ज किए गए, जबकि 2022 में यह संख्या 57 और 2021 में 29 थी। वर्ष 2025 के मध्य तक यह आंकड़ा 100 के पार पहुंच चुका था। यह वृद्धि देखा जाए तो एक ऐसे संकट का संकेत है जो भारतीय समुदाय की वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।
विदेशों में भारतीयों के साथ आज सिर्फ हिंसा ही नहीं हो रही, बल्कि श्रमिक शोषण की घटनाएं भी भयावह स्तर पर पहुंच चुकी हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच भारतीय दूतावासों और मिशनों को शोषण, दुर्व्यवहार और रोजगार संबंधी 80,985 शिकायतें प्राप्त हुईं। संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ओमान और सऊदी अरब से सबसे अधिक शिकायतें दर्ज की गईं। इन शिकायतों में वेतन न मिलना, पासपोर्ट जब्त कर लेना, अत्यधिक काम करवाना, ओवरटाइम का भुगतान न करना, छुट्टियां न देना, कंपनियों का अचानक बंद हो जाना और श्रमिकों को स्वदेश लौटने के लिए आवश्यक अनुमति तक न देना जैसी गंभीर समस्याएं शामिल हैं।
ब्रिटेन में ही कुछ समय पहले दो बुजुर्ग सिख टैक्सी चालकों सतनाम सिंह और जसबीर सांघा पर नस्लीय हमला हुआ था। हमलावरों ने उन्हें गालियां दीं, जमीन पर गिराया और मारपीट की। सतनाम सिंह की पगड़ी तक उतार दी गई, जिसे उन्होंने अपनी अस्मिता पर गहरा आघात बताया। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया के जिलॉन्ग शहर में हरमनप्रीत सिंह को नस्लीय टिप्पणी का सामना करना पड़ा और बाद में उन पर शारीरिक हमला किया गया, जिससे उनकी नाक की हड्डी टूट गई।
अमेरिका में भी भारतीयों के खिलाफ हिंसा के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। हैदराबाद के युवा छात्र अंशुल कुंचा की हत्या इसका एक दर्दनाक उदाहरण है। पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए पिज्जा डिलीवरी का कार्य कर रहे अंशुल को कथित रूप से एक सुनियोजित साजिश के तहत सुनसान स्थान पर बुलाया गया और सिर में गोलियां मारकर हत्या कर दी गई। उनके परिवार का आरोप है कि यह सामान्य अपराध नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित हमला था।
इन घटनाओं के बीच ओमान तट और होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में हुए सैन्य तनाव में तीन भारतीय नाविकों की मृत्यु ने भी भारत की चिंता बढ़ा दी है। चाहे कारण अलग-अलग हों, लेकिन हर घटना में जान गंवाने वाला भारतीय नागरिक ही है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि विश्व के विभिन्न देशों में भारतीयों की सुरक्षा को लेकर भारत की कूटनीतिक रणनीति कितनी प्रभावी है और उसे और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
भारत आज विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। उसके नागरिक शिक्षा, व्यापार, तकनीक, चिकित्सा और श्रम के क्षेत्र में दुनिया के लगभग हर हिस्से में अपनी प्रतिभा का योगदान दे रहे हैं। विदेशों में रहने वाले करोड़ों भारतीय भारत की आर्थिक, सांस्कृतिक और वैश्विक शक्ति के महत्वपूर्ण प्रतिनिधि हैं। ऐसे में उनकी सुरक्षा राष्ट्रीय सम्मान और प्रतिष्ठा का भी प्रश्न है।
हालांकि यह सच है कि भारत सरकार और विदेश मंत्रालय समय-समय पर इन घटनाओं पर चिंता व्यक्त करते हैं, संबंधित देशों से संवाद करते हैं और पीड़ित परिवारों को सहायता उपलब्ध कराते हैं, किंतु अब परिस्थितियां औपचारिक विरोध या संवेदना प्रकट करने से आगे बढ़ चुकी हैं। आवश्यकता इस बात की है कि भारत उन देशों के साथ उच्चस्तरीय और परिणामोन्मुख वार्ता करे, जहां भारतीयों पर हमलों की घटनाएं बढ़ रही हैं। ऐसे मामलों की त्वरित जांच, दोषियों को कठोर दंड और पीड़ित परिवारों को न्याय सुनिश्चित करने के लिए ठोस तंत्र विकसित किया जाना चाहिए।
भारत को अपने सभी प्रमुख द्विपक्षीय संबंधों में प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा को एक महत्वपूर्ण एजेंडा बनाना होगा। भारतीय दूतावासों को और अधिक सक्रिय, सशक्त तथा जवाबदेह बनाया जाना चाहिए ताकि संकट की स्थिति में भारतीय नागरिकों को तुरंत सहायता मिल सके। साथ ही, नस्लीय घृणा और भारतीयों के विरुद्ध हिंसा के मामलों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी प्रभावी ढंग से उठाने की आवश्यकता है।
आज करोड़ों भारतीयों की अपेक्षा केंद्र की मोदी सरकार से यही है कि वह विदेशों में रह रहे अपने नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। जिन देशों में भारतीय लगातार हमलों का शिकार हो रहे हैं, वहां चिंता व्यक्त करने के बजाय ठोस कूटनीतिक दबाव बनाया जाए। दोषियों को दंडित कराने, पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए हर संभव कदम उठाया जाए, क्योंकि किसी भी राष्ट्र की शक्ति दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे उसके नागरिकों की सुरक्षा और सम्मान से भी मापी जाती है।
जैसा कि सभी के सामने है-ओमान के तट और होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के बीच हुए मिसाइल हमलों में 3 भारतीय नाविकों की मौत अमेरिकी बलों द्वारा वाणिज्यिक जहाजों पर की गई कार्रवाई के दौरान हुई। भारत ने अमेरिकी हमलों को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। इस पर अमेरिका की बेशर्मी देखिए कि कह रहा है, वॉशिंगटन स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में लागू अमेरिकी नाकेबंदी के किसी भी उल्लंघन को बर्दाश्त नहीं करेगा। वह व्यवसायिक जहाजों तक को नहीं छोड़ रहा! ऐसे में अब समय आ गया है कि भारत इस दिशा में और अधिक दृढ़, स्पष्ट तथा प्रभावशाली पहल करे, ताकि हर भारतीय की विदेशी धरती पर सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

