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36 भाषाओं के जानकार ने की थी, 8वीं तक की पढ़ाई!

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36 भाषाओं के जानकार ने की थी, 8वीं तक की पढ़ाई!


-आचार्य पं. पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कितना आश्चर्य होता है, जब यह तथ्य उद्घाटित होता है कि एकमात्र ऐसा व्यक्ति, जिसने मात्र आठवीं तक की पढ़ाई की हो; परन्तु छत्तीस भाषाओं का ज्ञाता हो। उन दिनों स्वाध्याय को प्राथमिकता दी जाती थी; डिग्री-डिप्लोमा की कोई विशेष उपयोगिता नहीं होती थी; समाज में अनुभव सम्पन्न व्यक्तित्व की गणना होती थी। यहाँ हमारा संकेत उस शब्दजीवी से है, जिसने अपने पाण्डित्य और पुरुषार्थ के समक्ष विश्व को नतमस्तक कर दिया था और प्रबुद्ध-समाज ने उसे हाथोँ-हाथ लेकर 'महापण्डित' की उपाधि से समलंकृत किया था; क्योंकि उसने हिन्दी-साहित्य से सम्बन्धित शताधिक कृतियों का प्रणयन किया था। उसकी यायावरी वृत्ति इतनी चर्चित रही है कि उस शब्द निष्णात शिल्पी को 'हिन्दीयात्रा-साहित्य का पितामह' के रूप मे मान्यता दी गयी है।

साहित्य-जगत् के 'महापण्डित' का नाम-स्मरण आते ही, जिस सारस्वत हस्ताक्षर का चित्र उभरता है, वह है- राहुल सांकृत्यायन। उन्हें मध्य-एशिया के इतिहास लिखने वाले प्रथम भारतीय के रूप में भी जाना जाता है। १९२३ ई० से राहुल सांकृत्यायन की देशान्तर मे भ्रमण करने की उत्कट इच्छा हुई थी, जिसके परिणामस्वरूप वे उसी वर्ष नेपाल गये थे। श्रीलंका गये थे, जहाँ वे डेढ़ माह तक रहे। वह जगह इतनी रास आयी थी कि वे वहाँ तीन बार गये थे। दूसरी और तीसरी बार क्रमश: १९३६ और १९५३ ई० में। वे श्रीलंका में भी गये थे :– १९२७ और १९६० ई० में। अपनी पहली श्रीलंका-यात्रा मे उन्होंने १९ माह तक अध्यापन-कार्य किया था और दूसरी यात्रा में वहाँ कुछ समय रहकर अनेक ग्रन्थों का प्रणयन भी किया था। वे चीन और तिब्बत भी गये थे। उन्होंने १९३२ ई० में यूरोप; १९३५ ई० में जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत लैण्ड और ईरान; १९३८ ई० में अफग़ानिस्तान; १९४५ ई० में पुन: ईरान में प्रवास किये थे। वे तीन वर्ष (१९४५ से १९४७ ई०) तक रूस में रहे, जहाँ उनकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर उनसे लेनिनग्राद युनिवर्सिटी में प्राध्यापन करने का आग्रह किया गया था, जिसे स्वीकार कर लिया था।

तत्त्वान्वेषी और घुमक्कड़ी प्रवृत्ति के लिए सर्वाधिक प्रसिद्ध राहुल सांकृत्यायन ने अपने ऐतिहासिक अन्वेषण के क्षेत्र में जितनी श्रद्धा, निष्ठा और लगन दिखायी थी, वह अन्यत्र दुर्लभ है; क्योंकि जब गमनागमन के लिए द्रुत गतिवाले साधन प्रचलन में नहीं होते थे तब वे लंका, तिब्बत, पर्वत, पहाड़, खाई, जंगल आदिक से हज़ारों मील दूर तक भटकते हुए श्रीलंका, तिब्बत, बर्मा इत्यादिक क्षेत्रों से गहन पड़ताल करते हुए, बिखरी हुई पाण्डुलिपियोँ को खच्चर पर लादकर लाते हुए, भारत की सीमा में प्रवेश कर जाते थे। यही कारण था कि उन्होंने अपने अध्यवसाय और परिश्रम के बल पर इत:-तत: बिखरी और उपेक्षित पड़ी बहुभाषी पाण्डुलिपियोँ का उद्धार किया था।

चूँकि उन्हें संस्कृत, हिन्दी, तमिल कन्नड़, पालि, तिब्बती, अँगरेज़ी, रसन, फ्रेंच, जैपेनीज़ अरबी, फ़ारसी इत्यादिक ३६ भाषाओं का बोध था अत: पाण्डुलिपियोँ मे किस प्रकार का कहाँ-कहाँ ज्ञान भरा हुआ था और उसका साहित्य-संवर्द्धन करने में कितना महत्त्व था, इसे बहुविध समझ जाते थे। यही कारण था कि उन्होंने तिब्बत से लेकर श्रीलंका तथा मध्य-एशिया और काकेशस तक का भ्रमण किया था और वहाँ के वातावरण से प्रभावित होकर अपने यात्रावृत्त का लेखन भी किया था, जिसने यात्रा संस्मरण के एक अनुभव सम्पन्न अध्याय का प्रारम्भ भी किया था, जिसे प्रमाणित करती हैं– लद्दाख-यात्रा, लंका-यात्रा, तिब्बत में सवा वर्ष, यात्रा के पन्ने, कुमायूँ, किन्नर देश की ओर, दार्ज़िलिंग परिचय, एशिया के दुर्गम भूखण्डोँ में, यूरोप-यात्रा इत्यादिक ज्ञानप्रधान कृतियाँ।

उनकी यायावरी वृत्ति का परिणाम था कि उन्होंने कोश, यात्रा-साहित्य, अध्यात्म, संस्कृति, धर्म, दर्शन, इतिहास, राजनीति, जीवनी, लोकसाहित्य इत्यादिक विषयों पर पाण्डुलिपि लेखन किया था। चूँकि उन्होंने देश-देशान्तर की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्राकृतिक सम्पदा, सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक जीवनदशा इत्यादिक का समीप से गहनतापूर्वक परिशीलन किया था अत: उनकी कृतियाँ अनुभवजन्य प्रतीत होती हैँ। उनकी मान्यता रही है :– ''घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ, अपने क्षितिज-विस्तार का भी साधन है।'' उन्होंने आह्वान किया था :– ''कमर बाँध लो भावी घुमक्कड़ों! संसार तुम्हारे स्वागत के लिए बेकरार है।''

उनका जीवन अन्तर्विरोध से भरा हुआ था। वे परिवार-स्तर पर 'वैष्णव-मत' से सम्बद्ध रहे; आगे चलकर, आर्य समाज और बौद्ध धर्म से होते हुए, वामपन्थ से आ जुड़े, जो अन्तिम गन्तव्य रहा। इस प्रकार उन्होंने आजीवन बौद्ध मत और मार्क्सवाद के साथ सामंजस्य स्थापित किया था; क्योंकि इसके पीछे अनात्मवाद, जनतन्त्र के प्रति विश्वास एवं वैयक्तिक सम्पत्ति-विरोध रहा था; क्योंकि वे बातें दोनों में समान रूप से दिखायी देती हैं। जब उन्होंने वेदान्त का अनुशीलन किया था तब उनकी दृष्टि उन्मीलित हुई और वे सत्य-ज्ञान की तलाश मे निकल पड़े। जब भी सत्य पर प्रहार किया जाता था तब वे विद्रोही की मुद्रा में दिखते थे। इसे समझने के लिए उनकी पुस्तक 'बाईसवीं सदी' का अध्ययन किया जा सकता है। उन्होंने मन्दिरों में बलिदान प्रथा के प्रति सार्वजनिक रूप से अपने मुखर विचार को प्रकट किया था तब अपने धन्धे को मन्दा पड़ता देखकर, अयोध्या के तथाकथित सनातनी लाठी लेकर उन पर पिल पड़े थे। उन्हें हिन्दू धर्म के पाखण्ड के प्रति इतनी वितृष्णा हो गयी थी कि उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया; परन्तु वहाँ भी वे पुनर्जन्म की व्यवस्था के विरुद्ध थे। उन्हें 'वामपन्थ' के प्रति आकर्षण था। उससे जुड़ने के बाद भी उन्होंने सोवियत संघ के साम्यवादी दल में सम्मिलित सत्तालोलुप और सुविधापरस्त नेताओं की भर्त्सना की थी।

१९४७ ई० में अखिल भारतीय साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप मे उन्हें जो आलेख भाषण के रूप मे पढ़ने के लिए दिया गया था, उन्होंने उसे हटाकर अपना मौलिक भाषण किया था, जो साम्यवादी दल की नीतियों के विरुद्ध था; क्योंकि उन्होंने उसमें अल्पसंख्यक संस्कृति, सभ्यता, परम्परा एवं भाषिक प्रश्न किये थे। यद्यपि उन्हें दल की सदस्यता से वंचित रखा गया था तथापि उनकी मुखरता कुन्द नहीं हुई। इस सम्बन्ध में उनके तर्क और तथ्य को समझने के लिए उनकी वैचारिक कृतियों :– 'वैज्ञानिक भौतिकवाद' और 'दर्शन-दिग्दर्शन' का अध्ययन करना होगा।

राहुल के जीवन का एक अन्य पक्ष अत्यन्त रोचक रहा; क्योंकि एक राहुल में जाने कितने नामकरण की सम्भावना बनी रही, जो फलीभूत भी होती रही। बचपन में केदारनाथ पाण्डेय आगे चलकर दामोदर स्वामी बन बैठे; राहुल सांकृत्यायन तो कहलाये ही, त्रिपिटिकाचार्य के नाम से जाने गये।

मनुष्य के जीवन में शब्दशक्ति का कितना और कैसा प्रभाव पड़ता है, इसे समझने के लिए राहुल की बाल्यावस्था के साथ साक्षात् करना होगा; क्योंकि राहुल का बचपन केदारनाथ पाण्डेय के नाम से दूसरी कक्षा से तीसरी कक्षा में पहुँचा था तब उन्होंने उर्दू की पाठ्य पुस्तक में एक शे'र पढ़ा था, जिसने उन्हें 'अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा' के रूप मे ला खड़ा किया था :–

सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, ज़िन्दगानी फिर कहाँ?

ज़िन्दगी ग़र कुछ रही तो, ये जवानी फिर कहाँ?''

राहुल ने लिखा भी है :– इस शेर ने मेरे मन और भविष्य के जीवन पर बहुत प्रभाव डाला।

प्रभाव घातक भी था। उनके परिवार में उनकी ११ वर्ष की अवस्था में विवाह करने की बात उठी तब वे विद्रोही हो बैठे। यायावरी और विद्रोह की प्रवृत्ति उनके मन-मस्तिष्क की जड़ों तक ऐसी पहुँची कि पन्दहा गाँव, आज़मगढ़ में ९ अप्रैल, १८९३ ई० को जन्मा बालक केदारनाथ मात्र १६ वर्ष की अवस्था में घर से भागकर कलकत्ता पहुँचा, जहाँ वह ४ माह तक रहा; वहाँ से भागकर काशी पहुँचा, जहाँ वह संस्कृत, हिन्दी और अँगरेज़ी भाषाओं का अध्ययन करने लगा; आगरा पहुँच कर अरबी-फ़ारसी के अध्ययन में संलग्न हो गया। इसी क्रम में वैराग्य उत्पन्न हो गया, तब अवस्था मात्र १७ वर्ष की थी। फिर क्या था! मन विचलित भी होता रहा। वह सारस्वत योगी पैदल ही अयोध्या, हरिद्वार, हिमालय, देवप्रयाग, जमुनोत्री, केदारनाथ-बदरीनाथ की ओर चल पड़ा था। अब वह बालक वय-वार्द्धक्य के साथ राहुल सांकृत्यायन के नाम से प्रतिष्ठा अर्जित कर चुका था।

राहुल सांकृत्यायन एक कर्मयोद्धा थे। भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में उनकी महती भूमिका रही है। वे १९४० ई० में बिहार के कृषक आन्दोलन में सामन्तवादी ज़मीदारों के शोषण के विरुद्ध सक्रिय भूमिका-निर्वहण करते हुए, कृषक-सत्याग्रहियों के साथ हँसिया लेकर खेतों में उतर कर गन्ना की फ़सल काटने लगे, जिसके विरोध मे ज़मीदारों के गुण्डों ने उनके सिर पर लाठी से प्रहार कर दिये थे, जिससे उनका सिर फट गया था, फिर भी उन्होंने कोई चिन्ता नहीं की। किसानों के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलन्द करते रहने के कारण उन्हें एक वर्ष का कारावास दण्ड दिया गया था, जिसका उन्होंने रचना स्तर पर सदुपयोग किया था और कारावास जीवन जीते हुए 'दर्शन-दिग्दर्शन' का प्रणयन कर लिया था। वे किसानों के पक्ष में अँगरेज़-प्रशासन से लोहा लेते रहे। वे अँगरेज़ों के अत्याचार के विरुद्ध लड़ते रहे।

राहुल सांकृत्यायन एक सुयोग्य पत्रकार थे और स्वाभिमानी भी, जिसे एक घटना-प्रसंग से समझा जा सकता है। राहुल सांकृत्यायन को ''भारत छोड़ो'' आन्दोलन के समय बन्दी बना लिया गया था। जब उन्हें मुक्त किया गया था तब उन्हें कृषक आन्दोलन के चर्चित नेता सहजानन्द ने अपने हिन्दी साप्ताहिक समाचार पत्र 'हुंकार' का सम्पादक मनोनीत किया था। गोरी सरकार बहुत शातिर थी। उसने फूट डालो और राज करो'' के आधार पर जो ग़ैर-काँग्रेसी समाचार पत्र-पत्रिकाएँ थीं, उनके लिए उसने चार अंकों के लिए एक विज्ञापन प्रसारित किया था, जिसका शीर्षक था– 'गुण्डों से लड़िए।' उस विज्ञापन की विशेषता यह थी कि उसमें एक व्यक्ति को गांधी टोपी और जवाहर बण्डी पहने आग लगाते हुए प्रदर्शित किया गया था। 'हुंकार' के स्वामी सहजानन्द ने विज्ञापन की बड़ी धनराशि देखकर उस विज्ञापन को प्रकाशित करने के लिए राहुल सांकृत्यायन के पास भेजा था, जिसे देखते ही राहुल ने उसे मुद्रित कराने से इन्कार करते हुए, अपने को उस समाचार पत्र से अलग कर लिया था; क्योंकि वे महात्मा गांधी और पं० जवाहरलाल नेहरू का सम्मान भारत का सम्मान मानते थे।

उनका जीवन और मरण घुमक्कड़ी के सिद्धान्त और व्यवहार में एकरूप बना रहा। राहुल सांकृत्यायन के जीवन की अन्तिम अवधि में उनका स्मृतिलोप अत्यन्त दु:खदाई रहा; उपचार के लिए मॉस्को ले जाया गया। वे वर्ष १९६३ मे मॉस्को से दिल्ली आ गये थे। अन्तत:, १४ अप्रैल, १९६३ ई० को ७० वर्ष की आयु में उनका दार्ज़िलिंग में निधन हो गया था; बावजूद घुमक्कड़ी शास्त्र का महापण्डित हमारे मन-मस्तिष्क में जीवन्त बना हुआ है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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हिन्दुस्थान समाचार / संजीव पाश